भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 571

मवलोकयन्नजस्रं मृद्वग्निना साधयेद्दर्व्या सतत मवघट्टयन् । स यदा जानीयाद्विरमति शब्दः, प्रशाम्यति च फेनः, प्रसादमापद्यते स्नेहो यथास्वं गन्धवर्णरसोत्पत्तिः, संवर्तते च भेषजमंगुलिभ्यां मृद्यमानमति- मृदुनतिदारुणमनंगुलिप्राद्दि चेति, स कालस्तस्यावतारणाय । ततस्तम- वतीर्णशीतीभूत महतेन वाससा परिपूय शुचौ दृढे कलशे समासिच्य पिधानेन पिधाय शुक्लेन बद्धपट्टेनावच्छाद्य सूत्रेण सुबद्धं सुनिगुप्तं निधापयेत् । ततोऽस्मै मात्रां प्रयच्छेत्पानाय, तेन साधु विरिच्यते, सम्यगपहृतदोषस्य चास्याऽऽनुपूर्वी यथोक्ता । ततश्चैनमनुवासयेदनु- वासनकाले ।

फिर वैद्य आगे कहे पदार्थ लाने को कहे—तिल्वक और उद्दालक ये दो बिल्व भर (पल भर, ४ तोला) लेकर विडंग कषाय के साथ खूब बारीक पीस ले । इनसे आधी मात्रा (२ तोला) श्यामा (काली निशोथ) और त्रिवृत् (सफेद निशोथ), इन से आधी (१ तोला) दन्ती और द्रवन्ती, इनसे आधे (½ तोला) चव्य और चित्रक इन सबको अर्धाढक (दो प्रस्थ) विडंग कषाय, में तथा एक प्रस्थ पूर्वोक्त तिलों से तैयार किये तैल के साथ मिलाकर एक बड़े कड़ाहे में रख कर आग पर रख कर आराम से बैठ कर, चारों ओर स्नेह को देखते हुए कि गिरे नहीं, निरन्तर मृदु अग्नि से पकावे । और पकाते समय कड़छी द्वारा बराबर हिलाता रहे। जिस समय शब्द होना बन्द हो जाय, झाग उठना भी रुक जाय, तथा स्नेह (तैल) भी स्वच्छ हो जावे, एवं तैल में उचित गन्ध, वर्ण और रस की उत्पत्ति हो जाय तब समझे कि तैल बन गया । औषध (कल्क) अंगुली से मलने पर न तो बहुत कोमल और न बहुत कठोर हो तथा अंगुली पर चिपटे नहीं, (कल्क की बत्ती बन जावे)। तब समझ ले कि तैल सिद्ध हो गया यह समय है, तैल उतारने का; अब इसको उतार कर ठण्डा होने पर बड़े भारी वस्त्र से छान कर एक शुद्ध, मजबूत पात्र में डाल कर, ढक्कन से टांप कर, सफेद वस्त्र से बांध कर तागे से कस कर, गुप्त (सुरक्षित) स्थान पर रख देवे । इस तैल की मात्रा को रोग के अनुसार पीने के लिये (कृमि-रोगी को) देवे। इससे भली प्रकार विरेचन होता है। दोषों के भली प्रकार निकल जाने पर पहिले कही विधि करनी चाहिये। अनुवासन योग्य समय में उस तैल से अनुवासन देना चाहिये ।

एतेनैव च पाकविधिना सर्षपातसी-करञ्ज-कोषातकी-स्नेहानुपकल्प्य पाययेत्सर्वविशेषानवेक्ष्यमाणः। तेनागदो भवतीति ॥ २७ ॥