भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 579, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 579

अ० ८ ] ३६ विमानस्थानम् ५६१

सुसंवीतेनावाक्शिरसा स्मृतिमतो स्तिमितेनावेक्ष्यावेक्ष्य मनसा सर्व- माचरता बुद्ध्या सम्यगनुप्रवेष्टव्यं, अनुप्रविश्य च वाङ्मनोबुद्धीन्द्रि- याणि न क्वचित्प्रणिधातव्यान्यन्यत्राऽऽतुरादातुरोपकारार्थाद्वाऽऽतुरगतेष्व- न्येषु वा भावेषु, न चाऽऽतुरकुलप्रवृत्तयो बहिर्निश्चारयितव्याः, हसितं चाऽऽयुषः प्रमाणमातुरस्य न वर्णयितव्यं जानताऽपि तत्र यत्रोच्यमा- नमातुरस्यान्यस्य वाऽप्युपघाताय संपद्यते, विज्ञानवताऽपि च नात्यर्थ- मात्मानो ज्ञाने विकत्थितव्यं, आप्तादपि हि विकत्थमानादित्यर्थमुद्वि- जन्त्यनेके ॥ ११ ॥

आचार्य का शिष्य को उपदेश—इसके अनन्तर आचार्य उस शिष्य को अग्नि, ब्राह्मण और वैद्यों के समक्ष (इनके साक्षि रूप में) निम्न उपदेश देवे । तुझको ब्रह्मचारी, श्मश्रुधारी, सत्यवादी, पवित्रभोजी, मात्सर्यरहित, निरामिष- भोजी, निःशस्त्र होकर रहना चाहिये। तुझको मेरी आज्ञा से ही सब कुछ करना चाहिये, परन्तु राजविरुद्ध, प्राणनाशक, बहुत बड़ा अधर्म या अनर्थ का काम हो तो वह काम मेरी आज्ञा से भी नहीं करना चाहिये। तुझको मुझको अर्पण करके, मेरी प्रधानता से, मेरे अधीन रह कर, मेरे प्रिय और मेरे हितकारी रह कर सदा बरतना चाहिये। पुत्र पिता की, भृत्य स्वामी को, अर्थी धनी की जिस प्रकार से सेवा करते हैं, वैसे तुझे मेरी सेवा करनी चाहिये। उत्सुकता- रहित, दत्तचित्त, सावधान, एकाग्र मन से, नम्र होकर, बार २ देख कर कार्य करना चाहिये। तुझे निन्दा से रहित और मेरी आज्ञा से विचरना-घूमना चाहिये। मेरी आज्ञा से या बिना मेरी आज्ञा के घूमने पर भी तुझे प्रथम मुझ गुरु के लिये अर्थ (धन) लाने का प्रयत्न करना चाहिये। चिकित्सा कर्म में सफलता, धनप्राप्ति, यश-लाभ और परलोक में स्वर्ग की कामना से तुझे गो- ब्राह्मण का प्रथम संस्कार कर अन्य सब प्राणियों की मंगल कामना करना चाहिये। प्रति दिन उठते-बैठते, जागते सब अवस्थाओ में, सब समय में, सम्पूर्णरूप से रोगियों के कल्याण के लिये यत्नवान् रहना चाहिये (रोगी को दुःखित करके जीविका नहीं कमानी चाहिये)। मन से भी पर स्त्री की चाह न करनी चाहिये। इसी प्रकार दूसरे के धन को मन से भी नहीं चाहना चाहिये। विनीत (नम्र वेश) वस्त्रों वाला होना चाहिये (उद्धत वेश नहीं पहिनना चाहिये)। प्रमाद रहित, स्वयं पापरहित, तथा पापकर्म में साथी नहीं होना चाहिये। कोमल, निर्दोष, धर्मानुकूल, सुखकारक, सत्य, हितकारी, परिमित वाणी बोलने वाला तथा, देशकाल को विचार कर काम करने वाला,