चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 580, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें१६२ चरकसंहिता [ अ० ८ स्मृतिमान् होना चाहिये। ज्ञान और अभ्युदय के उपकरणों को प्राप्त करने में सदा यत्नवान् रहना चाहिये। राजा जिनसे द्वेष करता है, अथवा जो राजा से द्वेष करते हैं, महाजन (बड़े आदमी), जिनसे द्वेष करते हैं, अथवा जो महाजनों से द्वेष करते हैं, उनकी चिकित्सा नहीं करनी चाहिये। इसी प्रकार जिनके शील (स्वभाव) और आचार अत्यन्त निकृष्ट और दुष्ट हों, अल्पवाद, प्रतिकार, धनरहित (जनपदोद्ध्वंस में कहे हुए) लोगों की तथा मरणोन्मुख रोगियों की चिकित्सा नहीं करनी चाहिये। इसी प्रकार जिन स्त्रियों का पति अथवा संरक्षक पास में न हो, उन की भी चिकित्सा नहीं करनी चाहिये। स्त्रियों से दिये धन को पति या संरक्षक के पूछे बिना कभी भी ग्रहण नहीं करना चाहिये, (उनकी आज्ञा से ही ग्रहण करना चाहिये)। रोगी के घर जाते समय चेतावनी देकर, आज्ञा मिलने पर दूसरे पुरुष के साथ उत्तम विनम्र वेश को पहिने हुए शिर को नीचे किये जाना चाहिये। जाते समय स्मृतिमान्, स्थिर मन से भली प्रकार-सोच विचार कर जो कुछ करना हो, भली प्रकार से घर में पहुंच कर करना चाहिये। घर में जा कर रोगी के उपकार के सिवाय रोगी से सम्बन्धित अथवा चिकित्सा से अतिरिक्त अन्य स्थानों में वाणी, मन, बुद्धि और इन्द्रियों को नहीं लगाना चाहिये। रोगी के घर के रहस्यों को बाहर नहीं करना चाहिये। जहाँ पर कहने से किसी अन्य प्राणी के मरने की सम्भावना हो, वहाँ पर मरणोन्मुख लक्षणों से रोगी की आयु का क्षय जानने पर भी नहीं कहना चाहिये। ज्ञानवान् होने पर भी अपने ज्ञान की प्रशंसा नहीं करनी चाहिये, क्योकि सत्यभाषी, आप्त, विद्वान् होकर भी अपने मुख से अपनी प्रशंसा करने वाले से अनेक लोग बहुत उद्विग्न हो जाते हैं ॥ १३ ॥ न चैव ह्यस्ति सुतरमायुर्वेदस्य पारं, तस्मादप्रमत्तः शश्वदभियो- गमस्मिन् गच्छेत्। एतच्च कार्यं, एवं भूयश्च वृत्तसौष्ठवमनसूयता परेभ्योऽप्यागमयितव्यं, कृत्स्नो हि लोको बुद्धिमतामाचार्यः। शत्रुश्चा- बुद्धिमताम्, अतश्चाभिसमीक्ष्य बुद्धिमताऽमित्रस्यापि धन्यं यशस्यमा- युष्यं पौष्टिकं लोकमभ्युपदिशतो वचः श्रोतव्यमनुविधातव्यं चेति।१४। आयुर्वेद ज्ञान की कहीं पर समाप्ति नहीं है। इसलिये इस आयुर्वेद के ज्ञान उपलब्ध करने में सदा प्रमादरहित होकर निरन्तर मनोयोग देवे। यहाँ कहे हुए कार्य सम्पूर्ण रूप से करने चाहिये। इस प्रकार करते हुए निन्दारहित होकर दूसरे लोगों से भी (शास्त्र के सिवाय) अन्य ज्ञान प्राप्त करना चाहिये। क्योंकि बुद्धिमानों का सम्पूर्ण संसार आचार्यवत् है और मूर्खों का वह शत्रु है। अतः