चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 58, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें४० चरकसंहिता [ अ० ३ इस योग में पानी को मिलाना नहीं चाहिये, अपितु आक के दूध में ही सब बनाना चाहिये । दसवां योग— तुत्थं विडङ्गं मरिचानि कुष्ठं लोध्रं च तद्वन् समनःशिलं स्यात् ॥ १२ ॥ तुत्थ ( नीला थोथा ), विडंग (वायविडंग), मरिच (काली मरिच), कुष्ठ ( कूट ), लोध्र (पटानी लोध्र ), मनःशिला (मनसिल) इनके चूर्ण को पूर्व की भांति आक के दूध में मिलाकर लगाना चाहिये ॥१२॥ ग्यारहवां लेप— रसाञ्जनं सप्रपुनाडबीजं युक्तः कपित्थस्य रसेन लेपः । रसाञ्जन ( रसौंत ), प्रपुनाडबीज ( पनवाड़ के बीज ), इन को कैथ के पत्तों के रस में मिलाकर लगाने से कुष्ठ रोग नष्ट होता है । पानी का उपयोग नहीं करना चाहिये । बारहवां योग— करञ्जबीजैडगजं सकुष्ठं गोमूत्रपिष्टं च परः प्रदेहः ॥ १३ ॥ करंज ( नाटा करंज बीज ), ऐडगज ( चक्रमर्द ) और कुष्ठ ( कूट ), इनको गोमूत्र में पीस कर लेप करने से कुष्ठ नष्ट होता है ॥ १३ ॥ तेरहवां योग— उभे हरिद्रे कुटजस्य बीजं करञ्जबीजं सुमनःप्रवालान् । त्वचं समध्यां हयमारकस्य लेपं तिलक्षारयुतं विदध्यात् ॥ १४ ॥ दोनों प्रकार की हल्दी ( साधारण हल्दी और दारू हल्दी ), कुटज बीज (इन्द्रजौ), करंज बीज ( करंजुए का बीज ), सुमनःप्रवाल ( चमेली के कोमल नये पत्ते ), हयमारक ( कनेर ) की अन्दर की त्वचा, और तिल क्षार (तिलकी नाल का क्षार भस्म) इनका लेप बनाकर लगाने से कुष्ठ रोग मिटता है ॥१४॥ चौदहवां योग— मनःशिला त्वक्कुटजात्सकुष्ठात् सलोमशः सैडगजः करञ्जः । ग्रन्थिश्च भौर्जः करवीरमूलं चूर्णानि साध्यानि तुषोदकेन ॥१५॥ पलाशक्षारोदकरसेन चापि सर्पोद्धृतान्याढकसंमितेन । दर्वीप्रलेपं प्रवदन्ति लेपमेतत्परं कुष्ठनिषूदनाय ॥ १६ ॥ मनःसिल, कुटजत्वक् ( कूड़े की छाल ), कुष्ठ ( कूट ) लोमश, ( जटा- मांसी ), ऐडगज ( चक्रमर्द ), करंज, ( करंजुआ ), भौर्ज ( भोजपत्र की गांठें ), करवीर (कनेर की जड़), ये आठो द्रव्य प्रत्येक एक एक कर्ष ( दो २