भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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अ० ३ ] सूत्रस्थानम् ४१ तोला) लेकर तुषोदक (यव-काञ्जिक) एक आढक तथा 'पलाश-निर्दाह रस' अर्थात् ढाक के वृक्ष को जलाने से उत्पन्न रस¹ एक आढक परिमाण (८ सेर) लेकर पाक करना चाहिये । पाक इतना करना चाहिये कि वह कड़छी पर चिप- टने लगे। यह प्रलेप कुष्ट रोग को नष्ट करने के लिये श्रेष्ठ है ॥१५-१६॥ पन्द्रहवां योग— पर्णानि पिष्ट्वा चतुरङ्गुलस्य तक्रेण पर्णान्यथ काकमाच्याः । तैलाक्तगात्रस्य नरस्य कुष्ठान्युद्वर्तयेदश्वहनच्छदैश्च ॥ १७ ॥ अमलतास के पत्तों, मकोय के पत्तों का और अश्वहनच्छद (कनेर) के पत्तों को छाछ के साथ पीसकर शरीर पर तैल का मालिश करके कुष्टरोग में मले । कई विद्वान् 'काकमाच्याः पर्णानि' शब्द से एक अन्य योग की कल्पना करते हैं । इसी प्रकार 'अश्वहनच्छदैश्च' इन से तीसरा योग मानते हैं ॥ १७ ॥ सोलहवां योग— कोलं कुलत्थाः सुरदारु रास्ना माषातसीतैलफलानि कुष्ठम् । वचा शताह्वा यवचूर्णमम्लमुष्णानि वातामयिनां प्रदेहः ॥ १८ ॥ कोल (झाड़ी के बेर), कुलत्थ (कुलथी), सुरदारु (देवदारु), रास्ना उड़द, अतसी (अलसी), तैलफल (एरण्ड के बीज), कुष्ठ (कूट), वचा (वच) शताह्वा (सौंफ), और यवचूर्ण (यवक्षार) इनको 'अम्ल' (कांजी) के साथ पीसकर प्रलेप बनाकर गरम करके वातरोगी के लिये प्रयुक्त करे । इससे वातरोग नष्ट होते हैं ॥१८॥ सत्रहवां योग— आनूपमत्स्यामिषवेसवारैरुष्णैः प्रदेहः पवनापहः स्यात् । स्नेहैश्चतुर्भिर्दशमूलमिश्रैर्गन्धौषधैश्चानिलजित्प्रदेहः ॥ १६ ॥ आनूपामिष (जलप्राय देश में चरने वाले पशुओं का मांस) मत्स्यामिष (मछलियों का मांस) इनसे बनाये हुए बेसवार (अस्थि रहित मांस को भाप से स्विन्न करके शिला पर पीस लेना चाहिये, फिर इसमें गुड़, घी, पिप्पली, मरिच मिलाने से बेसवार बनता है) । इस को गरम करके लेप करने से वायु का नाश होता है । —————————————————————————————————————————— १—ढाक के वृक्ष की प्रधान मुख्यजड़ को काट कर इस के नीचे एक मिट्टी का घड़ा रख देना चाहिये । और ऊपर के भाग को जलाना चाहिये । जलाने पर जो रस निकलता है, उस रस को लेना चाहिये । आज कल खैर या शीशम का तैल पाताल यन्त्र से निकालते हैं ।