चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४२ चरकसंहिता [ अ० ३ अठारहवां योग— घी, तैल, वसा और मज्जा इन चार स्नेहों को दशमूल के साथ मिला कर अथवा चारों स्नेहों को ज्वर अधिकार में कही चन्दन आदि सुगन्धित औषधियों के साथ मिलाकर लेप करने से वातविकार नष्ट होते हैं । यहां पर न कहने पर भी पानी मिलाना चाहिये ॥ १६ ॥ उन्नीसवां योग— तक्रेण युक्तं यवचूर्णमुष्णं सक्षारमार्तिं जठरे निहन्यात् । जौ के आटे को यवक्षार के साथ छाछ में पीसकर पेट पर लगाने से पीड़ा को नष्ट करता है । बीसवां योग— कुष्ठं शताह्वां सवचां यवानां चूर्णं सतैलाम्लमुशन्ति वाते ॥ २० ॥ कुष्ठ (कूट), शताह्वा (सौंफ), वचा (वच), जौ के आटे को तिल के तैल और अम्ल (कांजी) में मिलाकर लगाने से वातविकार नष्ट होते हैं ॥२०॥ इक्कीसवां योग— उभे शताह्वे मधुकं मधूकं बलां प्रियालं च कसेरुकं च । घृतं विदारीं च सितोपलां च कुर्यात्प्रदेहं पवने सरक्ते ॥२१॥ सौंफ और सोया, मधुक (मुलैहठी), मधूक (महुवा) बला (खरैंटी), प्रियाल (प्याल, पकने पर यह काला फल होता है, जिसमें से चिरौंजी निकलती है), कशेरू, घृत (गाय का) विदारी कन्द, सितोपला (मिश्री, खड़ी शकर), इनका पानी के साथ लेप वातरक्त रोग में लाभदायक है ॥ २१ ॥ बाईसवां योग— रास्नां गुडूचीं मधुकं बले द्वे सजीवकं सर्षभकं पयश्च । घृतं च सिद्धं मधुशेषयुक्तं रक्तानिलात्तिं प्रणुदेत्प्रदेहः ॥२२॥ रास्ना, गुडूची (गिलोय), मधुक (मुलहठी), दोनों प्रकार की बलाएं (खरैंटी और अतिबला—सफेद और पीले फूल की खरैंटी), जीवक, ऋषभक, गाय का दूध; गाय का घी, मधुशेष (मोम) इनसे सिद्ध घी रूप लेप वातरक्त रोग को नष्ट करता है । इस योग से घृत सिद्ध किया जाता है १ ॥ २२ ॥ १. रास्ना से लेकर ऋषभक तक सब ओषधियों का कल्क बनाना चाहिये । यह कल्क घी, स्नेह से चतुर्थांश होना चाहिये । और दूध घो स्नेह से दूना होना चाहिये । इससे घी सिद्ध करना चाहिये । घी सिद्ध होने पर वस्त्र में से छान कर उष्णावस्था में ही इसमें मोम मिला देनी चाहिये । मोम की मात्रा स्नेह से चतुर्थांश अर्थात् कल्क के बराबर होनी चाहिये ।