चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५६४ चरकसंहिता [ अ० ८ जानने वाले के साथ संभाषण करने से ज्ञान और हर्ष को प्राप्त करता है, ज्ञान की चतुरता उत्पन्न करता है, बोलने की शक्ति पैदा करता है, यश को बढ़ाता है, अध्ययन काल में पहिले सुने शब्द या अर्थ में जरा संदेह होता है, उसको मिटाता है । और संदेह रहित वस्तु में और भी अधिक दृढ़ निश्चय कर लेता है अध्ययन काल में गुरुमुख से न सुना हुआ भी कुछ विषय यहां पर सुनने में आता है और आचार्य की सेवा करने वाले शिष्य के लिये जो गोपनीय वस्तु ( अर्थ ) प्रसन्न होकर गुरु बताता है, उस गोपनीय बात को यह दूसरे के साथ शास्त्रार्थ करते हुए अपनी विद्वत्ता दिखाने के लिये, जीतने की इच्छा से सार रूप में प्रसन्नतापूर्वक प्रकट कर देता है । इसलिये बुद्धिमान् लोग उस विद्या में निपुण विद्वान् से संभाषण करने की प्रशंसा करते हैं ॥ १४ ॥ द्विविधा तु खलु तद्विद्यसंभाषा भवति—संधाय संभाषा, विगृह्य सम्भाषा चेति ॥ १५ ॥ 'तद्विद्य-संभाषण' अर्थात् उस विद्या के वेत्ता पुरुष से भाषण दो प्रकार का है । ( १ ) संधाय संभाषा—संधि अर्थात् परस्पर मेल करके प्रेमपूर्वक संभाषण करना, अनुलोम संभाषण है । ( २ ) विगृह्य संभाषा—विग्रह करके, दूसरे को पराजित करने के अभिप्राय से संभाषण करना प्रतिलोम-संभा- षण है ॥ १५ ॥ तत्र ज्ञान-विज्ञान-वचन-प्रतिवचन-शक्ति-संपन्नेनाकोपनेनोपस्कृतवि- द्येनानसूयकेनानुनेयेनानुनेयकोविदेन क्लेशक्षमेण प्रियसम्भाषणेन च सह संधाय संभाषा विधीयते । तथाविधेन सह कथयन्विस्त्रब्धः कथयेत्, पृच्छेद्धि च विस्रब्धः, पृच्छते चास्मै विस्रब्धाय विशदमर्थं ब्रूयात्, न च निग्रहभयादुद्विजेत, निगृह्य चैनं न हृष्येन्न च परेषु विकत्थेत्, नच मोहादेकान्तग्राही स्यात्, न चाविदितमर्थं तमनुवर्णयेत्; सम्यक् चानुन- येनानु नयेच्च, अनुनये तत्र चावहितः स्यादित्यनुलोमसंभाषा- विधिः ॥ १६ ॥ अनुलोम संभाषण की विधि— ज्ञान ( शास्त्रज्ञान ), विज्ञान, वचन ( पूर्व- पक्ष ), प्रतिवचन ( उत्तरपक्ष ) कहने में समर्थ, क्रोध से रहित, अविकृत विद्या वाले, अनिन्दक, अनुनय के योग्य, अनुनय को जानने वाले, क्लेशसहिष्णु, प्रिय बोलने वाले पुरुष के साथ सन्धि करके संभाषण करते हुए विश्वासपूर्वक ( बिना संकोच या भय के ) बातचीत करे और जो कुछ पूछना हो वह विश्वा- सपूर्वक पूछे । इस प्रकार के पुरुष के आगे पराजय के भय से न घबराए और