चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 583, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ८ ] विमानस्थानम् ५६५ स्वयं भी प्रतिवादी का पराजय करके प्रसन्न न हो। दूसरों के आगे अपनी डींग न करे, अपनी प्रशंसा नहीं करे। मोहवश केवल लेने वाला ही न बने। न जाने हुए विषय का वर्णन नहीं करे। प्रतिवादी से किये अनुनय के सामने विनीत होवे। दूसरे के अनुनय में सावधान रहे। यह 'अनुलोम-संभाषण विधि' है ॥ १६ ॥ अत ऊर्ध्वमितरेण सह विगृह्य संभाषायां जल्पेत् श्रेयसा योगमा- त्मनः पश्यन्; प्रागेव च जल्पाज्जल्पान्तरं परावरान्तरं परिषद्विशेषांश्च सम्यक्परीक्षेत। सम्यक् परीक्षा हि बुद्धिमतां कार्यप्रवृत्तिनिवृत्तिकालौ शंसति, तस्मात्परीक्षामभिप्रशंसन्ति कुशलाः। परीक्षमाणस्तु खलु परा- वरान्तरमिमाञ्जल्पकगुणान् श्रेयस्करान् दोषवतश्च परीक्षेत सम्यक्। तद्यथा—श्रुतं विज्ञानं धारणं प्रतिभानं वचनशक्तिरित्येतान् गुणान् श्रेयस्करानाहुः। इमान्पुनर्दोषवतः, तद्यथा-कोपस्तमवैशारद्यं भीरु- त्वमधारणत्वमनवहितत्वमिति। एतान्द्वयानपि गुणान् गुरुलाघवतः परस्य चैवाऽऽत्मनश्च तोलयेत् ॥ १७ ॥ विगृह्य-संभाषा—इसके अनन्तर 'विगृह्य संभाषा' का वर्णन करते हैं। पुरुष अपना श्रेय (विद्योत्कर्ष आदि) योग देखता हुआ प्रतिवादी के साथ 'विगृह्य संभाषण' करे। इसमें जल्प (वाद-विवाद) से पूर्व ही जल्प के लक्षण, जल्प के गुण दोष, प्रतिवादी और अपने गुण दोष, और परिषद् के गुण दोषों को भली प्रकार से देख लेवे। क्योंकि भली प्रकार की हुई परीक्षा बुद्धिमानों को कार्य में प्रवृत्त होने और निवृत्त होने का काल बता देती है। इसलिये कुशल लोग परीक्षा की प्रशंसा करते हैं। अपने और प्रतिवादी के गुण-दोषों की परीक्षा करने में, इन श्रेयस्कर और अश्रेयस्कर जल्पगुणों की परीक्षा करनी चाहिये। जैसे—गुरुमुख से शास्त्र का श्रवण, विज्ञान, (अवबोध), धारण (मन से धारण करना), प्रतिभान (प्रतिभा, प्रत्युत्पन्नमति) और बोलने की शक्ति का होना—इन गुणों को श्रेय- स्कर कहते हैं और इन निम्नलिखित गुणों को अश्रेयस्कर अर्थात् दोषयुक्त कहते हैं। जैसे—क्रोध करना, अपाण्डित्य, भीरुता, अन- भ्यास दत्तचित्त न होना, ये दोष हैं। इन दोनों प्रकार के गुणों को अपने में तथा प्रतिवादी में तुलना करके न्यून-अधिक रूप से देखना चाहिये ॥१७॥ तत्र त्रिविधः परः संपद्यते, -प्रवरः प्रत्यवरः समो वा गुणविनिश्चे- पतः, नत्वेव कात्स्न्र्येन ॥ १८ ॥