चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५६६ चरकसंहिता [अ० ८ इनमें प्रतिवादी तीन प्रकार का होता है—(१) प्रवर (उत्तम), (२) प्रत्यवर (हीन) और (३) सम (समान)। ये भेद श्रुत, विज्ञान आदि गुणों के परिमाण से होते हैं, कुल, शील आदि भेद से नहीं ॥ १८॥ परिषत्तु खलु द्विविधा,-ज्ञानवती, मूढपरिषद्व; सेव द्विविधा सती त्रिविधा पुनरनेन कारणविभागेन-सुहृत्परिषद्, उदासीनपरिषद, प्रति- निविष्टपरिषद्चेति ॥ १६ ॥ परिषद् अर्थात् सभा दो प्रकार की होती है, ज्ञानवती और मूढ। यही दो प्रकार की परिषद् शत्रु, मित्र और उदासीन कारण से तीन प्रकार की हो जाती है। (१) सुहृत्परिषद्, (२) उदासीन-परिषद्, (३) प्रतिकूल-निविष्टपरिषत् (विरोधियों की परिषद्) ॥ १६ ॥ तत्र प्रतिनिविष्टायां परिषदि ज्ञान-विज्ञान-वचन-प्रतिवचन शक्तिसंप- न्नायामपि मूढायां वा न कथंचित्केनचित्सह जल्पो विधीयते, मूढायां तु सुहृत्परिषदि उदासीनायां वा ज्ञान-विज्ञान-वचन-प्रतिवचन-शक्तिमन्त- रेणाप्यदीप्रयशसा महाजनद्विष्टेन सह जल्पो विधीयते, तद्दिष्टेन च सह कथयता आविद्धदीर्घसूत्रसंकुलैर्वाक्यदण्डकैः कथयितव्यं, अतिहृष्टं मुहु- र्मुहुरुपहसता परं, निरूपयता च परिषदमाकारैः, ब्रुवता चास्य वाक्यावका- शो न देयः। कष्टशब्दं च ब्रुवता वक्तव्यो 'नोच्यते' इति, अथवा पुनः 'हीना ते प्रतिज्ञा'इति, पुनश्चाऽऽहूयमानः प्रतिवक्तव्यः-‘परिसंवत्सरो भव, शिक्ष- स्व तावत्, पर्याप्तमेतावत्ते', सकृदपि हि परिक्षेप्तिकं निहतं निहतमाहु- रिति नास्य योगः कर्तव्यः कथंचित्; अप्येवं श्रेयसा सह विगृह्य वक्तव्य- मित्याहुरेके; न त्वेवं ज्यायसा सह विग्रहं प्रशंसन्ति कुशलाः ॥ २० ॥ इनमें से शत्रु-परिषद् अथवा मूढ़-परिषत् में ज्ञान-विज्ञान, वचन-प्रतिवचन की शक्ति होने पर भी किसी उत्तम, हीन वा समान व्यक्ति के साथ किसी भी प्रकार से जल्प (विवाद) नहीं करना चाहिये। मूढ़परिषद् में, वा मित्रपरि- षद् में, या उदासीन-परिषद् में ज्ञान-विज्ञान और वचन-प्रतिवचन शक्ति के बिना भी, प्रज्वलित कीर्ति से रहित और अनेक जनों के द्वेषपात्र (जिसका पक्ष कोई नहीं करे) ऐसे पुरुष के साथ जल्प किया जा सकता है। इस प्रकार के पुरुष के साथ संभाषण करते हुए, टेढ़ेमेढ़े लम्बे सूत्रों से युक्त लम्बे २ वाक्यों से भाषण करना चाहिये। खूब प्रसन्न होते हुए, प्रतिवादी की बार-बार हंसी करते हुए, आकार-चेष्टा आदि से परिषद् का ध्यान खींचते हुए और बोलने को उद्यत हुए प्रतिवादी को बोलने का अवसर नहीं देना चाहिये। दुर्बोध अर्थ या