भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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के होने पर शब्द आदि विषयों का ग्रहण होता है । इन वाक्यों का अर्थ यहां प्रत्यक्ष होता है, देखा जाता है । स दृष्टार्थः पुनः—अस्ति प्रेत्यभावोऽस्ति मोक्ष इति । ( २ ) अदृष्टार्थ—जैसे प्रेत्यभाव अर्थात् ( पुनर्जन्म ) है और मोक्ष है, यह अदृष्ट अर्थ है । सत्यो नाम यथार्थभूतः—सन्त्यायुर्वेदोपदेशाः, सन्त्युपायाः साध्या- नां, सन्त्यारम्भफलानीति, सत्यविपर्ययाच्चानृतः ॥ ३८ ॥ सत्य—यथार्थ जैसा हो वैसा कहना सत्य है । यथा आयुर्वेद का उपदेश है, साध्य रोगों की चिकित्सा के उपाय हैं। आरम्भ फल अर्थात् कर्मों के फल होते हैं। सत्य से विपरीत अनृत ( मिथ्या ) है ॥ ३८ ॥ अथ प्रत्यक्षं—प्रत्यक्षं नाम तद्यदात्मना पञ्चेन्द्रियैश्च स्वयमुपल- भ्यते । तत्राऽऽत्मप्रत्यक्षाः सुखदुःखेच्छाद्वेषादयः, शब्दादयस्त्विन्द्रिय- प्रत्यक्षाः ॥ ३६ ॥ प्रत्यक्ष—आत्मा और इन्द्रियों द्वारा जो ज्ञान स्वयं प्राप्त किया जाता है, उसका नाम प्रत्यक्ष¹ है, इनसे सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष आदि आत्मा द्वारा प्रत्यक्ष होते हैं, शब्द आदि विषय श्रोत्र आदि इन्द्रियों द्वारा प्रत्यक्ष होते हैं॥३६॥ अथानुमानं—अनुमानं नाम तर्को युक्त्यपेक्षः । यथोक्तम्—अग्निं जरणशक्त्या, बलं व्यायामशक्त्या, श्रोत्रादीनि शब्दादिग्रहणेनेत्ये- वमादि ॥ ४० ॥ अनुमान—युक्ति की अपेक्षा करने वाला तर्क अनुमान है । कार्यकारण भाव के ज्ञान से अविज्ञात अर्थ को जानना तर्क है । यथा—जीर्ण करने की शक्ति से अग्नि का, व्यायाम शक्ति से बल का, शब्दादि के ग्रहण करने से श्रोत्रादि इन्द्रियों का अनुमान किया जाता है ॥ ४० ॥ अथैतिह्यं—ऐतिह्यं नामाऽऽप्तोपदेशो वेदादिः ॥ ४१ ॥ ऐतिह्य—ऐसा वृद्ध पुरुषों ने कहा था यह 'ऐतिह्य' है। आप्त-वचन का नाम ऐतिह्य है। यथा आप्त-वचन वेद आदि ॥ ४१ ॥ अथौपम्यं—औपम्यं नाम यदन्येनान्यस्य सादृश्यमधिकृत्य प्रका- शनं, यथा—दण्डेन दण्डकस्य, धनुषा धनुष्टम्भस्य, इष्वासिना आ- रोग्यदस्येति ॥ ४२ ॥


१ इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमव्यपदेश्यमव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्य- क्षम् । न्याय० १ । १ । ४ ।