भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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अ० ८ ] विमानस्थानम् ५७३

का कारण वात आदि दोष तथा पंच महाभूत व सूक्ष्म कीट-प्राणियों को भी माना है। अधिकरणसिद्धान्तो नाम यस्मिन् यस्मिन्नधिकरणे संस्तूयमाने सिद्धान्यन्यान्यधिकरणानि भवन्ति, यथा-न मुक्तः कर्मानुबन्धिकं कुरुते; निस्पृहत्वादिति प्रस्तुते सिद्धाः कर्मफलमोक्षपुरुषप्रेत्यभावा भवन्ति । (३) अधिकरण सिद्धान्त—जिस जिस अधिकरण के उपस्थित करने पर अन्य न कहे हुए अधिकरण भी अपने आप सिद्ध हो जाते हैं, उसका नाम अधिकरण सिद्धान्त है । यथा—मुक्त पुरुष निःस्पृह होने से फलजनक कर्म नहीं कर सकता । इस अवस्था में कर्मफल, मोक्ष, पुरुष और प्रेत्यभाव से प्रक- रण भी स्वयं सिद्ध होते हैं । क्योंकि यदि कर्मफल न हो तो मुमुक्षु भी कर्म करें। कर्मफल से उद्विग्न होकर ही वे कर्म नहीं करते । यदि मोक्ष हो तो मुक्त ऐसा नाम हो । यदि पुरुष न हो तो बन्ध और मोक्ष किसका । अभ्युपगमसिद्धान्तो नाम—यमर्थमसिद्धमपरीक्षितमनुपदिष्टमहे- तुकं वा वादकालेऽभ्युपगच्छन्ति भिषजः। तद्यथा—द्रव्यं न प्रधानमिति कृत्वा वक्ष्यामः, गुणाः प्रधाना इति कृत्वा वक्ष्यामः, इत्येवमादिश्च- तुर्विधः सिद्धान्तः ॥ ३७ ॥ (४) अभ्युपगम सिद्धान्त—जिसको बिना सिद्ध किये, बिना परीक्षा किये और बिना हेतु आदि बतलाये ही विवादकाल में वैद्य लोग स्वीकार कर लेते हैं, वह अभ्युपगम सिद्धान्त है । यथा—द्रव्य को प्रधान न मानकर सिद्धान्त रूप से स्वीकार करके आगे विवाद करें । इसी प्रकार गुण को प्रधान मान कर, कर्म को प्रधान मानकर वाद आरम्भ करे । ये चारों प्रकार के सिद्धान्त कह दिये हैं ।३७। अथ शब्दः—शब्दो नाम वर्णसमाम्नायः, स चतुर्विधः-दृष्टार्थश्चा- दृष्टार्थश्च सत्यश्चानृतश्चेति । शब्द—वर्णों के समाम्नाय (समूह) का नाम शब्द है । यह चार प्रकार का है । यथा (१) दृष्टार्थ, (२) अदृष्टार्थ (३) सत्य और (४) अनृत । तत्र दृष्टार्थः—त्रिभिर्हेतुभिर्दोषाः प्रकुप्यन्ति षड्भिरुपक्रमैश्च प्रशा- म्यन्ति, श्रोत्रादिसद्भावे शब्दादिग्रहणमिति । ( १ ) दृष्टार्थ—तीन कारणों (असात्म्येन्द्रियार्थसंयोग, प्रज्ञापराध और परि- णाम ) से वात आदि दोष कुपित होते हैं । वे छः उपक्रमों ( बृंहण, लंघन, स्नेहन, रूक्षण, स्वेदन और स्तम्भन ) से शान्त होते हैं । श्रोत्र आदि इन्द्रियों