चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 590, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें५७२ चरकसंहिता [अ० ८ वर्णयति, यथा-अग्निरुष्णो द्रवमुदकं स्थिरा पृथिवी आदित्यः प्रकाशक इति, यथा वाऽऽदित्यः प्रकाशकस्तथा सांख्यवचनं प्रकाशकमिति ॥३६॥ दृष्टान्त—जिसमें विद्वान् अविद्वान् दोनों की बुद्धि समान हो, उसका नाम दृष्टान्त है ॐ । जिस वस्तु का वर्णन करना होता है, उसका उसी प्रकार की वस्तु से वर्णन करते हैं । यथा-अग्नि उष्ण है, जल द्रव है, पृथिवी स्थिर है, सूर्य प्रकाशक है, इन बातों को मूर्ख भी उसी प्रकार समझता है, जिस प्रकार एक विद्वान् समझता है । जिस प्रकार सूर्य प्रकाशक है, उसी प्रकार सांख्य ज्ञान भी प्रकाशक है । यहां पर सांख्य ज्ञान साध्य 'वर्ण्य' है । इसको आदित्य के दृष्टान्त से सिद्ध करते हैं ॥३६॥ अथ सिद्धान्तः—सिद्धान्तो नाम यः परीक्षकैर्बहुविधं परीक्ष्य हे- तुभिः साधयित्वा स्थाप्यते निर्णयः स सिद्धान्तः, स चोक्तश्चतुर्विधः,— सर्वतन्त्रसिद्धान्तः, प्रतितन्त्रसिद्धान्तः, अधिकरणसिद्धान्तोऽभ्युपगम- सिद्धान्त इति । सिद्धान्त—जिस को परीक्षकों ने बहुत प्रकार से परीक्षा कर हेतुओं द्वारा सिद्ध कर निर्णय रूप से स्थापित कर दिया है वह निर्णय 'सिद्धान्त' है। यह सिद्धान्त चार प्रकार का है । (१) सर्वतन्त्र सिद्धान्त, (२) प्रतितंत्र सिद्धान्त, (३) अधिकरण सिद्धान्त और (४) अभ्युपगम सिद्धान्त । तत्र सर्वतन्त्रसिद्धान्तो नाम—सर्वतन्त्रेषु यत्प्रसिद्धम् । सन्ति व्याधयः सन्ति सिद्धयुपायाः साध्यानामिति । (१) सर्वतन्त्र सिद्धान्त—सब तंत्रों (शास्त्रों) में (उस सम्बन्ध के) जो सिद्धान्त प्रसिद्ध हों, उनका नाम सर्वतंत्र सिद्धान्त है। यथा—निदान हैं, साध्य रोग हैं, रोगों को दूर करने के भी उपाय हैं, ये बातें सब तंत्रों में प्रसिद्ध हैं । प्रतितन्त्रसिद्धान्तो नाम तस्मिंस्तस्मिंस्तन्त्रे तत्तत्प्रसिद्धं, यथा— अन्यत्राष्टौ रसाः षडत्र, पञ्चेन्द्रियाणि यथाऽन्यत्रान्यत्र षडिन्द्रियाणि । वातादिकृताः सर्वविकारा यथाऽन्यत्र वातादिकृता भूतकृताश्च प्रसिद्धाः। (२) प्रतितंत्र सिद्धान्त—उसी विशेष तंत्र में जो तत्त्व प्रसिद्ध हों और तंत्रों में अप्रसिद्ध हों, उसका नाम प्रतितंत्र सिद्धान्त है। यथा—एक तंत्र में रस आठ प्रकार के हैं, और इस तंत्र में रस छः प्रकार के हैं। एक तंत्र में पांच इन्द्रियां हैं, अन्य तंत्र में छः इन्द्रियां मानी हैं (मन को भी इन्द्रिय गिनते हैं) अन्य तंत्रों में सब रोग बात आदि दोषजन्य ही माने गये हैं। एक तंत्र में रोगों ॐ लौकिकपरीक्षकाणां यस्मिन्नर्थे बुद्धिसाम्यं सद्दृष्टान्तः ॥ न्याय० १। १। २५॥