भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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अ० ८ ] विमानस्थानम् ५७१ प्रतिष्ठापना--दूसरे वादी की प्रतिज्ञा के विपरीत अर्थ की स्थापना करना प्रतिष्ठापना कहलाता है । पुरुष अनित्य है, यह विपरीतार्थ प्रतिज्ञा है । इसमें हेतु—इन्द्रियग्राह्य होने से । दृष्टान्त—घड़ा इन्द्रियग्राह्य है, वह अनित्य है । उपनय-जिस प्रकार घड़ा है उसी प्रकार पुरुष भी अनित्य है । निगमन—इस- लिये पुरुष अनित्य है ॥ ३२ ॥ अथ हेतुः—हेतुर्नामोपलब्धिकारणं, तत्प्रत्यक्षमनुमानमैतिह्यमौपम्य- मिति । एभिर्हेतुभिर्यदुपलभ्यते, तत्तत्त्वम् ॥ ३३ ॥ हेतु-साध्य के उपलब्धि अर्थात् ज्ञान का कारण हेतु है ☸ । प्रत्यक्ष, अनु- मान, ऐतिह्य और उपमान ये भी उपलब्धि ( ज्ञान ) के साधन हैं । इन हेतुओं ( प्रमाणों ) से जो ज्ञान उपलब्ध होता है, वह तत्त्व अर्थात् ज्ञान है ॥ ३३ ॥ उपनयो निगमनं चोक्तं स्थापनाप्रतिष्ठापनाव्याख्यायाम् ॥ ३४ ॥ उपनय और निगमन को स्थापना और प्रतिष्ठापना की व्याख्या में कह दिया है ॥ ३४ ॥ अथोत्तरं—उत्तरं नाम साधर्म्योपदिष्टे वा हेतौ वैधर्म्यवचनं,वैधर्म्यो- पदिष्टे वा साधर्म्यवचनं । यथा-हेतुसधर्माणो विकाराः, शीतकस्य हि व्याधे- र्हेतुसाधर्म्यवचनं-हिमशिशिरवातसंस्पर्शा इति ब्रुवतः परो ब्रूयात्-हेतु- विधर्माणो विकाराः, यथा शरीरावयवानां दाहोष्ण्यकोथप्रपचने हेतु- वैधर्म्यं हिमशिशिरवातसंस्पर्शो इति; एतत्सविपर्ययमुत्त रम् ॥ ३५ ॥ उत्तर—हेतु में साधर्म्य दिखाने पर वैधर्म्य दिखाना अथवा हेतु में वैधर्म्य दिखाने पर साधर्म्य दिखाना 'उत्तर' है । कोई कहे—विकार ( रोग ) हेतु ( कारण ) के समान धर्म ( तुल्य धर्म ) वाले होते हैं । यथा शीतजन्य रोगों में कारण के तुल्य धर्म हेमन्त शिशिर की वायु का शीत संस्पर्श हो इस पर प्रतिपक्षी कहे कि रोग हेतु के विरुद्धधर्म ( अतुल्य धर्म ) वाले होते हैं । जैसे-शरीरावयवों के जलने में, गरम होने में, सड़ने में, पकने में हेतु ( कारण ) से असमान धर्म वाले हेमन्त, शिशिर की वायु का स्पर्श है । यह विपरीत उत्तर है ॥ ३५ ॥ अथ दृष्टान्तः—दृष्टान्तो नाम यत्र मूर्खविदुषां बुद्धिसाम्यं, यो वर्ण्यं ☸ 'उदाहरणसाधर्म्यात् साध्यसाधनं हेतुः । तथा वैधर्म्यात् । न्याय० १। १ । ३४-३५ ।