भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 588

५७० चरकसंहिता [ अ० ८ पक्ष और प्रतिपक्ष का आश्रय करके जो वाद किया जाता है, उसका नाम ‘जल्प’ है। इससे विपरीत ‘वितण्डा’ है। जैसे एक व्यक्ति का पक्ष है कि पुनर्जन्म होता है, और दूसरे का पक्ष है कि पुनर्जन्म नहीं होता है। ये दोनों नाना हेतुओं से अपने अपने पक्ष की स्थापना करते हैं और प्रतिबाधक प्रमाणों से दूसरे के पक्ष का निराकरण करते हैं। इसका नाम ‘जल्प’ है। जल्प से विपरीत वितण्डा है, परपक्ष में केवल दोष दिखाना ‘वितण्डा’ होता है † ॥२८॥ द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायाः स्वलक्षणैः श्लोकस्थाने पूर्वमुक्ताः ॥ २६ ॥ द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय इनमें से प्रत्येक का लक्षण सूत्रस्थान में कह आये हैं ॥ २६ ॥ अथ प्रतिज्ञा । प्रतिज्ञा नाम साध्यवचनम् । यथा नित्यः पुरुष इति ॥ ३० ॥ प्रतिज्ञा—साध्य वचन का नाम ‘प्रतिज्ञा’ ✤ है। जैसे पुरुष नित्य है ॥३०॥ अथ स्थापना । स्थापना नाम तस्या एव प्रतिज्ञाया हेतुदृष्टान्तो- पनयनिगमनैः स्थापना । पूर्वं हि प्रतिज्ञा पश्चात्स्थापना, किं ह्यप्रतिज्ञातं स्थापयिष्यति । यथा नित्यः पुरुष इति प्रतिज्ञा । हेतुः—अकृतकत्वा- दिति । दृष्टान्तः-अकृतकमाकाशं तच्च नित्यम् । उपनयो यथा-चाकृत- कमाकाशं तथा पुरुषः । निगमनं-तस्मान्नित्य इति ॥ ३१ ॥ स्थापना—इसी प्रतिज्ञा के हेतु, दृष्टान्त, उपनय, और निगमन द्वारा सिद्ध करने का नाम ‘स्थापना’ है। प्रथम प्रतिज्ञा होती है, फिर उसकी स्थापना की जाती है। बिना प्रतिज्ञा के किस वस्तु को स्थापना करेगा। जैसे पुरुष नित्य है यह प्रतिज्ञा है। इसमें हेतु—उत्पत्ति न होने से। दृष्टान्त-आकाश, जिसे किसीने उत्पन्न नहीं किया और वह नित्य है। उपनय—जिस प्रकार अनुत्पन्न आकाश है इसी प्रकार पुरुष है। निगमन-इसलिये पुरुष भी नित्य है ॥३१॥ अथ प्रतिष्ठापना—प्रतिष्ठापना नाम या परप्रतिज्ञाया विपरीतार्थ- स्थापना, यथा—अनित्यः पुरुष इति प्रतिज्ञा । हेतुः-ऐन्द्रियकत्वात्, दृष्टान्तः—घट ऐन्द्रियकः, स चानित्यः, उपनयो-यथा घटस्तथा पुरुषः । निगमनं—तस्मादनित्य इति ॥ ३२ ॥ † ‘यथोक्तोपपन्नश्छलजातिनिग्रहस्थानसाधनोपालम्भो जल्पः । स प्रतिपक्ष- स्थापनाहीनो वितण्डा । न्याय द० १ । २ । ४१ । ४४ । ✤ साध्यस्य वचनं प्रतिज्ञा । न्याय द० १ । १ । ३२ ।