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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

५७० चरकसंहिता [ अ० ८ पक्ष और प्रतिपक्ष का आश्रय करके जो वाद किया जाता है, उसका नाम ‘जल्प’ है। इससे विपरीत ‘वितण्डा’ है। जैसे एक व्यक्ति का पक्ष है कि पुनर्जन्म होता है, और दूसरे का पक्ष है कि पुनर्जन्म नहीं होता है। ये दोनों नाना हेतुओं से अपने अपने पक्ष की स्थापना करते हैं और प्रतिबाधक प्रमाणों से दूसरे के पक्ष का निराकरण करते हैं। इसका नाम ‘जल्प’ है। जल्प से विपरीत वितण्डा है, परपक्ष में केवल दोष दिखाना ‘वितण्डा’ होता है † ॥२८॥ द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायाः स्वलक्षणैः श्लोकस्थाने पूर्वमुक्ताः ॥ २६ ॥ द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय इनमें से प्रत्येक का लक्षण सूत्रस्थान में कह आये हैं ॥ २६ ॥ अथ प्रतिज्ञा । प्रतिज्ञा नाम साध्यवचनम् । यथा नित्यः पुरुष इति ॥ ३० ॥ प्रतिज्ञा—साध्य वचन का नाम ‘प्रतिज्ञा’ ✤ है। जैसे पुरुष नित्य है ॥३०॥ अथ स्थापना । स्थापना नाम तस्या एव प्रतिज्ञाया हेतुदृष्टान्तो- पनयनिगमनैः स्थापना । पूर्वं हि प्रतिज्ञा पश्चात्स्थापना, किं ह्यप्रतिज्ञातं स्थापयिष्यति । यथा नित्यः पुरुष इति प्रतिज्ञा । हेतुः—अकृतकत्वा- दिति । दृष्टान्तः-अकृतकमाकाशं तच्च नित्यम् । उपनयो यथा-चाकृत- कमाकाशं तथा पुरुषः । निगमनं-तस्मान्नित्य इति ॥ ३१ ॥ स्थापना—इसी प्रतिज्ञा के हेतु, दृष्टान्त, उपनय, और निगमन द्वारा सिद्ध करने का नाम ‘स्थापना’ है। प्रथम प्रतिज्ञा होती है, फिर उसकी स्थापना की जाती है। बिना प्रतिज्ञा के किस वस्तु को स्थापना करेगा। जैसे पुरुष नित्य है यह प्रतिज्ञा है। इसमें हेतु—उत्पत्ति न होने से। दृष्टान्त-आकाश, जिसे किसीने उत्पन्न नहीं किया और वह नित्य है। उपनय—जिस प्रकार अनुत्पन्न आकाश है इसी प्रकार पुरुष है। निगमन-इसलिये पुरुष भी नित्य है ॥३१॥ अथ प्रतिष्ठापना—प्रतिष्ठापना नाम या परप्रतिज्ञाया विपरीतार्थ- स्थापना, यथा—अनित्यः पुरुष इति प्रतिज्ञा । हेतुः-ऐन्द्रियकत्वात्, दृष्टान्तः—घट ऐन्द्रियकः, स चानित्यः, उपनयो-यथा घटस्तथा पुरुषः । निगमनं—तस्मादनित्य इति ॥ ३२ ॥ † ‘यथोक्तोपपन्नश्छलजातिनिग्रहस्थानसाधनोपालम्भो जल्पः । स प्रतिपक्ष- स्थापनाहीनो वितण्डा । न्याय द० १ । २ । ४१ । ४४ । ✤ साध्यस्य वचनं प्रतिज्ञा । न्याय द० १ । १ । ३२ ।

अ० ८ ] विमानस्थानम् ५७१

अ० ८ ] विमानस्थानम् ५७१ प्रतिष्ठापना--दूसरे वादी की प्रतिज्ञा के विपरीत अर्थ की स्थापना करना प्रतिष्ठापना कहलाता है । पुरुष अनित्य है, यह विपरीतार्थ प्रतिज्ञा है । इसमें हेतु—इन्द्रियग्राह्य होने से । दृष्टान्त—घड़ा इन्द्रियग्राह्य है, वह अनित्य है । उपनय-जिस प्रकार घड़ा है उसी प्रकार पुरुष भी अनित्य है । निगमन—इस- लिये पुरुष अनित्य है ॥ ३२ ॥ अथ हेतुः—हेतुर्नामोपलब्धिकारणं, तत्प्रत्यक्षमनुमानमैतिह्यमौपम्य- मिति । एभिर्हेतुभिर्यदुपलभ्यते, तत्तत्त्वम् ॥ ३३ ॥ हेतु-साध्य के उपलब्धि अर्थात् ज्ञान का कारण हेतु है ☸ । प्रत्यक्ष, अनु- मान, ऐतिह्य और उपमान ये भी उपलब्धि ( ज्ञान ) के साधन हैं । इन हेतुओं ( प्रमाणों ) से जो ज्ञान उपलब्ध होता है, वह तत्त्व अर्थात् ज्ञान है ॥ ३३ ॥ उपनयो निगमनं चोक्तं स्थापनाप्रतिष्ठापनाव्याख्यायाम् ॥ ३४ ॥ उपनय और निगमन को स्थापना और प्रतिष्ठापना की व्याख्या में कह दिया है ॥ ३४ ॥ अथोत्तरं—उत्तरं नाम साधर्म्योपदिष्टे वा हेतौ वैधर्म्यवचनं,वैधर्म्यो- पदिष्टे वा साधर्म्यवचनं । यथा-हेतुसधर्माणो विकाराः, शीतकस्य हि व्याधे- र्हेतुसाधर्म्यवचनं-हिमशिशिरवातसंस्पर्शा इति ब्रुवतः परो ब्रूयात्-हेतु- विधर्माणो विकाराः, यथा शरीरावयवानां दाहोष्ण्यकोथप्रपचने हेतु- वैधर्म्यं हिमशिशिरवातसंस्पर्शो इति; एतत्सविपर्ययमुत्त रम् ॥ ३५ ॥ उत्तर—हेतु में साधर्म्य दिखाने पर वैधर्म्य दिखाना अथवा हेतु में वैधर्म्य दिखाने पर साधर्म्य दिखाना 'उत्तर' है । कोई कहे—विकार ( रोग ) हेतु ( कारण ) के समान धर्म ( तुल्य धर्म ) वाले होते हैं । यथा शीतजन्य रोगों में कारण के तुल्य धर्म हेमन्त शिशिर की वायु का शीत संस्पर्श हो इस पर प्रतिपक्षी कहे कि रोग हेतु के विरुद्धधर्म ( अतुल्य धर्म ) वाले होते हैं । जैसे-शरीरावयवों के जलने में, गरम होने में, सड़ने में, पकने में हेतु ( कारण ) से असमान धर्म वाले हेमन्त, शिशिर की वायु का स्पर्श है । यह विपरीत उत्तर है ॥ ३५ ॥ अथ दृष्टान्तः—दृष्टान्तो नाम यत्र मूर्खविदुषां बुद्धिसाम्यं, यो वर्ण्यं ☸ 'उदाहरणसाधर्म्यात् साध्यसाधनं हेतुः । तथा वैधर्म्यात् । न्याय० १। १ । ३४-३५ ।

५७२ चरकसंहिता [अ० ८ वर्णयति, यथा-अग्निरुष्णो द्रवमुदकं स्थिरा पृथिवी आदित्यः प्रकाशक इति, यथा वाऽऽदित्यः प्रकाशकस्तथा सांख्यवचनं प्रकाशकमिति ॥३६॥ दृष्टान्त—जिसमें विद्वान् अविद्वान् दोनों की बुद्धि समान हो, उसका नाम दृष्टान्त है ॐ । जिस वस्तु का वर्णन करना होता है, उसका उसी प्रकार की वस्तु से वर्णन करते हैं । यथा-अग्नि उष्ण है, जल द्रव है, पृथिवी स्थिर है, सूर्य प्रकाशक है, इन बातों को मूर्ख भी उसी प्रकार समझता है, जिस प्रकार एक विद्वान् समझता है । जिस प्रकार सूर्य प्रकाशक है, उसी प्रकार सांख्य ज्ञान भी प्रकाशक है । यहां पर सांख्य ज्ञान साध्य 'वर्ण्य' है । इसको आदित्य के दृष्टान्त से सिद्ध करते हैं ॥३६॥ अथ सिद्धान्तः—सिद्धान्तो नाम यः परीक्षकैर्बहुविधं परीक्ष्य हे- तुभिः साधयित्वा स्थाप्यते निर्णयः स सिद्धान्तः, स चोक्तश्चतुर्विधः,— सर्वतन्त्रसिद्धान्तः, प्रतितन्त्रसिद्धान्तः, अधिकरणसिद्धान्तोऽभ्युपगम- सिद्धान्त इति । सिद्धान्त—जिस को परीक्षकों ने बहुत प्रकार से परीक्षा कर हेतुओं द्वारा सिद्ध कर निर्णय रूप से स्थापित कर दिया है वह निर्णय 'सिद्धान्त' है। यह सिद्धान्त चार प्रकार का है । (१) सर्वतन्त्र सिद्धान्त, (२) प्रतितंत्र सिद्धान्त, (३) अधिकरण सिद्धान्त और (४) अभ्युपगम सिद्धान्त । तत्र सर्वतन्त्रसिद्धान्तो नाम—सर्वतन्त्रेषु यत्प्रसिद्धम् । सन्ति व्याधयः सन्ति सिद्धयुपायाः साध्यानामिति । (१) सर्वतन्त्र सिद्धान्त—सब तंत्रों (शास्त्रों) में (उस सम्बन्ध के) जो सिद्धान्त प्रसिद्ध हों, उनका नाम सर्वतंत्र सिद्धान्त है। यथा—निदान हैं, साध्य रोग हैं, रोगों को दूर करने के भी उपाय हैं, ये बातें सब तंत्रों में प्रसिद्ध हैं । प्रतितन्त्रसिद्धान्तो नाम तस्मिंस्तस्मिंस्तन्त्रे तत्तत्प्रसिद्धं, यथा— अन्यत्राष्टौ रसाः षडत्र, पञ्चेन्द्रियाणि यथाऽन्यत्रान्यत्र षडिन्द्रियाणि । वातादिकृताः सर्वविकारा यथाऽन्यत्र वातादिकृता भूतकृताश्च प्रसिद्धाः। (२) प्रतितंत्र सिद्धान्त—उसी विशेष तंत्र में जो तत्त्व प्रसिद्ध हों और तंत्रों में अप्रसिद्ध हों, उसका नाम प्रतितंत्र सिद्धान्त है। यथा—एक तंत्र में रस आठ प्रकार के हैं, और इस तंत्र में रस छः प्रकार के हैं। एक तंत्र में पांच इन्द्रियां हैं, अन्य तंत्र में छः इन्द्रियां मानी हैं (मन को भी इन्द्रिय गिनते हैं) अन्य तंत्रों में सब रोग बात आदि दोषजन्य ही माने गये हैं। एक तंत्र में रोगों ॐ लौकिकपरीक्षकाणां यस्मिन्नर्थे बुद्धिसाम्यं सद्दृष्टान्तः ॥ न्याय० १। १। २५॥

अ० ८ ] विमानस्थानम् ५७३

अ० ८ ] विमानस्थानम् ५७३

का कारण वात आदि दोष तथा पंच महाभूत व सूक्ष्म कीट-प्राणियों को भी माना है। अधिकरणसिद्धान्तो नाम यस्मिन् यस्मिन्नधिकरणे संस्तूयमाने सिद्धान्यन्यान्यधिकरणानि भवन्ति, यथा-न मुक्तः कर्मानुबन्धिकं कुरुते; निस्पृहत्वादिति प्रस्तुते सिद्धाः कर्मफलमोक्षपुरुषप्रेत्यभावा भवन्ति । (३) अधिकरण सिद्धान्त—जिस जिस अधिकरण के उपस्थित करने पर अन्य न कहे हुए अधिकरण भी अपने आप सिद्ध हो जाते हैं, उसका नाम अधिकरण सिद्धान्त है । यथा—मुक्त पुरुष निःस्पृह होने से फलजनक कर्म नहीं कर सकता । इस अवस्था में कर्मफल, मोक्ष, पुरुष और प्रेत्यभाव से प्रक- रण भी स्वयं सिद्ध होते हैं । क्योंकि यदि कर्मफल न हो तो मुमुक्षु भी कर्म करें। कर्मफल से उद्विग्न होकर ही वे कर्म नहीं करते । यदि मोक्ष हो तो मुक्त ऐसा नाम हो । यदि पुरुष न हो तो बन्ध और मोक्ष किसका । अभ्युपगमसिद्धान्तो नाम—यमर्थमसिद्धमपरीक्षितमनुपदिष्टमहे- तुकं वा वादकालेऽभ्युपगच्छन्ति भिषजः। तद्यथा—द्रव्यं न प्रधानमिति कृत्वा वक्ष्यामः, गुणाः प्रधाना इति कृत्वा वक्ष्यामः, इत्येवमादिश्च- तुर्विधः सिद्धान्तः ॥ ३७ ॥ (४) अभ्युपगम सिद्धान्त—जिसको बिना सिद्ध किये, बिना परीक्षा किये और बिना हेतु आदि बतलाये ही विवादकाल में वैद्य लोग स्वीकार कर लेते हैं, वह अभ्युपगम सिद्धान्त है । यथा—द्रव्य को प्रधान न मानकर सिद्धान्त रूप से स्वीकार करके आगे विवाद करें । इसी प्रकार गुण को प्रधान मान कर, कर्म को प्रधान मानकर वाद आरम्भ करे । ये चारों प्रकार के सिद्धान्त कह दिये हैं ।३७। अथ शब्दः—शब्दो नाम वर्णसमाम्नायः, स चतुर्विधः-दृष्टार्थश्चा- दृष्टार्थश्च सत्यश्चानृतश्चेति । शब्द—वर्णों के समाम्नाय (समूह) का नाम शब्द है । यह चार प्रकार का है । यथा (१) दृष्टार्थ, (२) अदृष्टार्थ (३) सत्य और (४) अनृत । तत्र दृष्टार्थः—त्रिभिर्हेतुभिर्दोषाः प्रकुप्यन्ति षड्भिरुपक्रमैश्च प्रशा- म्यन्ति, श्रोत्रादिसद्भावे शब्दादिग्रहणमिति । ( १ ) दृष्टार्थ—तीन कारणों (असात्म्येन्द्रियार्थसंयोग, प्रज्ञापराध और परि- णाम ) से वात आदि दोष कुपित होते हैं । वे छः उपक्रमों ( बृंहण, लंघन, स्नेहन, रूक्षण, स्वेदन और स्तम्भन ) से शान्त होते हैं । श्रोत्र आदि इन्द्रियों

के होने पर शब्द आदि विषयों का ग्रहण होता है । इन वाक्यों का अर्थ यहां प्रत्यक्ष होता है, देखा जाता है । स दृष्टार्थः पुनः—अस्ति प्रेत्यभावोऽस्ति मोक्ष इति । ( २ ) अदृष्टार्थ—जैसे प्रेत्यभाव अर्थात् ( पुनर्जन्म ) है और मोक्ष है, यह अदृष्ट अर्थ है । सत्यो नाम यथार्थभूतः—सन्त्यायुर्वेदोपदेशाः, सन्त्युपायाः साध्या- नां, सन्त्यारम्भफलानीति, सत्यविपर्ययाच्चानृतः ॥ ३८ ॥ सत्य—यथार्थ जैसा हो वैसा कहना सत्य है । यथा आयुर्वेद का उपदेश है, साध्य रोगों की चिकित्सा के उपाय हैं। आरम्भ फल अर्थात् कर्मों के फल होते हैं। सत्य से विपरीत अनृत ( मिथ्या ) है ॥ ३८ ॥ अथ प्रत्यक्षं—प्रत्यक्षं नाम तद्यदात्मना पञ्चेन्द्रियैश्च स्वयमुपल- भ्यते । तत्राऽऽत्मप्रत्यक्षाः सुखदुःखेच्छाद्वेषादयः, शब्दादयस्त्विन्द्रिय- प्रत्यक्षाः ॥ ३६ ॥ प्रत्यक्ष—आत्मा और इन्द्रियों द्वारा जो ज्ञान स्वयं प्राप्त किया जाता है, उसका नाम प्रत्यक्ष¹ है, इनसे सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष आदि आत्मा द्वारा प्रत्यक्ष होते हैं, शब्द आदि विषय श्रोत्र आदि इन्द्रियों द्वारा प्रत्यक्ष होते हैं॥३६॥ अथानुमानं—अनुमानं नाम तर्को युक्त्यपेक्षः । यथोक्तम्—अग्निं जरणशक्त्या, बलं व्यायामशक्त्या, श्रोत्रादीनि शब्दादिग्रहणेनेत्ये- वमादि ॥ ४० ॥ अनुमान—युक्ति की अपेक्षा करने वाला तर्क अनुमान है । कार्यकारण भाव के ज्ञान से अविज्ञात अर्थ को जानना तर्क है । यथा—जीर्ण करने की शक्ति से अग्नि का, व्यायाम शक्ति से बल का, शब्दादि के ग्रहण करने से श्रोत्रादि इन्द्रियों का अनुमान किया जाता है ॥ ४० ॥ अथैतिह्यं—ऐतिह्यं नामाऽऽप्तोपदेशो वेदादिः ॥ ४१ ॥ ऐतिह्य—ऐसा वृद्ध पुरुषों ने कहा था यह 'ऐतिह्य' है। आप्त-वचन का नाम ऐतिह्य है। यथा आप्त-वचन वेद आदि ॥ ४१ ॥ अथौपम्यं—औपम्यं नाम यदन्येनान्यस्य सादृश्यमधिकृत्य प्रका- शनं, यथा—दण्डेन दण्डकस्य, धनुषा धनुष्टम्भस्य, इष्वासिना आ- रोग्यदस्येति ॥ ४२ ॥


१ इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमव्यपदेश्यमव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्य- क्षम् । न्याय० १ । १ । ४ ।

अध्याय १० में) ॥ ४२ ॥

औपम्य ( उपमा ) — सादृश्य को देखकर एक प्रसिद्ध वस्तु का प्रकाशन करना 'उपमा' है। जैसे दण्डे से दण्डक नाम (वातव्याधि) रोग बतलाया है। धनुष द्वारा धनुस्तम्भ (जिसमें धनुष के समान शरीर मुड़ जाता है, ऐसा धनुर्वात रोग बतलाया है) और धानुष्क (तीर चलाने वाले) का उदाहरण देकर आरोग्यता देने वाले वैद्य का प्रयोजन बतलाया है (खुड्डाक चतुष्पाद अध्याय १० में) ॥ ४२ ॥ अथ संशयः — संशयो नाम संदेह लक्षणानुसंदिग्धेष्वर्थेष्वनिश्चयः । यथा-दृष्टा ह्यायुष्यलक्षणोपेताश्चानुपैताश्च तथा सक्रियाश्चाक्रियाश्च पुरुषाः शीघ्रभङ्गाश्चिरजीविनश्च, एतदुभयदृष्टत्वात्संशयः-किन्नु खल्व- कालमृत्युरस्त्युत नास्तीति ॥ ४३ ॥ संशय - संदिग्ध अर्थों में निश्चय का न होना संशय' है। जैसे क्या अकाल मृत्यु है, अथवा नहीं है ! आयुष्मान् पुरुषों के लक्षणों से युक्त एवं इन लक्षणों से रहित किंवा चिकित्सा क्रिया के बिना और चिकित्सा करने पर भी शीघ्र मरने वाले तथा देर तक जीने वाले दोनो प्रकार के पुरुष देखे जाते हैं। दोनों प्रकार की अवस्थाओं के देखने से संशय होता है कि क्या अकाल मृत्यु है, अथवा नहीं है ॥४३॥ अथ प्रयोजनं — प्रयोजनं नाम यदर्थमारभ्यन्त आरम्भाः । यथा- यद्यकालमृत्युरस्ति ततोऽहमात्मानमायुष्यैरुपचरिष्याम्यनायुष्याणि च परिहरिष्यामि, कथं मामकालमृत्युः प्रसहेतेति ॥४४॥ प्रयोजन -- जिसके लिये कर्मों का आरम्भ किया जाता है वह 'प्रयोजन' है। जैसे यदि अकाल मृत्यु है, तो मैं आयु के लिये हितकारी पथ्यों द्वारा अपने शरीर की रक्षा करूंगा। आयु का नाश करने वाली अपथ्य वस्तु का परित्याग करूंगा। फिर किस प्रकार से मुझपर अकाल मृत्यु आक्रमण कर सकती है?॥४४॥ अथ सव्यभिचारं - सव्यभिचारं नाम यद्व्यभिचरणं; यथा- भवेदिदमौषधं तस्मिन् व्याधौ यौगिकमथवा नेति ॥४५॥ सव्यभिचार - व्यभिचार एकत्र अव्यवस्था, अनिश्चितता, अनेकों में प्रवृत्त होना ही सव्यभिचार है। यथा - इस रोग में इस औषध का यौगिक १ समानानेकधर्मोपपत्तेः विप्रतिपत्तेरुपलब्ध्यनुपलब्ध्यव्यवस्थातश्च विशेषा- पेक्षो विमर्शः संशयः ॥ न्याय० १ । १ । ४१ ॥

५७६ चरकसंहिता [ अ० ८ अर्थात् योग के अनुकूल होना वा विपरीत भी होना सम्भव है, इस प्रकार एकान्त निश्चय न होना 'सव्यभिचार'* है ॥ ४५ ॥ अथ जिज्ञासा—जिज्ञासा नाम परीक्षा; यथा भेषजपरीक्षोत्तर- कालमुपदेक्ष्यते ॥ ४६ ॥ जिज्ञासा—प्रमाणों द्वारा अर्थ की परीक्षा करना 'जिज्ञासा' है। यथा भेषज परीक्षा जो आगे कहेंगे ॥ ४६ ॥ अथ व्यवसायः—व्यवसायो नाम निश्चयः, यथा वातिक एवायं व्याधिः, इदमेवास्य भेषजमिति ॥ ४७ ॥ व्यवसाय—निश्चय का नाम 'व्यवसाय' है। यथा—यह रोग वातजन्य ही है, और इस रोग की यही औषध है ॥ ४७ ॥ अथार्थप्राप्तिः-अर्थप्राप्तिर्नाम यत्रैकेनार्थेनोक्तेनापरस्यार्थस्यानुक्तस्य सिद्धिः; यथा-नायं संतर्पणसाध्यो व्याधिरित्युक्ते भवत्यर्थप्राप्तिः—अप- तर्पणसाध्योऽयमिति, नानेन दिवा भोक्तव्यमित्युक्ते भवत्यर्थप्राप्तिः— निशि भोक्तव्यमिति ॥ ४८ ॥ अर्थप्राप्ति—एक कहे हुए अर्थ से दूसरे न कहे हुए अर्थ का जिससे ज्ञान होजाय उसका नाम अर्थप्राप्ति है। यथा यह रोग संतर्पणसाध्य नहीं है, यह कहने पर पता लग जाता है कि यह रोग अपतर्पण साध्य है। इसको दिन में भोजन नहीं देना चाहिये, ऐसा कहने पर ज्ञात हो जाता है कि रात्रि में भोजन देना चाहिये ॥ ४८ ॥ अथ संभवः—संभवो नाम यो यतः संभवति स तस्य संभवः; यथा-षड् धातवो गर्भस्य, व्याधेरहितं हितमारोग्यस्येति ॥ ४९ ॥ संभव—जो जिससे उत्पन्न होता है, वह उसका संभव अर्थात् कारण है। जैसे छः धातु (पृथिवी, अप, तेज, वायु, आकाश और चेतना) गर्भ की उत्पत्ति में कारण हैं। इसी प्रकार अहित-सेवन रोगों की उत्पत्ति में, हित-सेवन आरोग्यता की उत्पत्ति में कारण हैं ॥ ४९ ॥ अथानुयोज्यं—अनुयोज्यं नाम यद्वाक्यं वाक्यदोषयुक्तं तदनुयो- ज्यमुच्यते,सामान्येनाहृतेष्वर्थेषु वा विशेषग्रहणार्थं यद्वाक्यं तदनुयोज्यं; ॐ न्यायदर्शन में सव्यभिचार को हेत्वाभास माना है। यह हेतु नहीं, परन्तु हेतु के समान दीखता है। यथा—'सव्यभिचार-विरुद्ध-प्रकरणसम-साध्यस- मातीतकाला हेत्वाभासाः' । न्याय० १ । २ । ४५ ॥

अ० ८ ] ३७ विमानस्थानम् ५७७

अ० ८ ] ३७ विमानस्थानम् ५७७ यथा-संशोधनसाध्योऽयं व्याधिरित्युक्ते किं वमनसाध्यः किं वा विरेचनसाध्यः ? इत्यनुयुज्यते ॥ ५० ॥ अनुयोज्य-जो वाक्य वाक्य के न्यून आदि दोषों से युक्त होता है, उसका नाम अनुयोज्य है। क्योंकि इस प्रकार का दोषयुक्त वाक्य प्रयुक्त नहीं किया जा सकता । अथवा सामान्य रूप में कहे हुए वाक्यार्थ में विशेष ग्रहण के लिये जो वाक्य कहा जाता है, वह भी अनुयोज्य होता है। यथा-यह रोग संशोधन से साध्य है, ऐसा कहने पर वमनसाध्य है या विरेचनसाध्य है। यह और भी वक्तव्य शेष रह जाने से 'अनुयोज्य' है ॥ ५० ॥ अथाननुयोज्यं—अननुयोज्यं नामातो विपर्ययेण; यथा—अयम- साध्यः ॥ ५१ ॥ अननुयोज्य — अनुयोज्य के विपरीत-वाक्यदोष से रहित वचन को 'अननु- योज्य' कहते हैं। यथा- यह रोग असाध्य है ॥ ५१ ॥ अथानुयोगः- अनुयोगो नाम यत्तद्विद्यानां तद्विद्यैरेव सार्धं तन्त्रे तन्त्रैकदेशे वा प्रश्नः प्रश्नैकदेशो वा ज्ञान-विज्ञान-वचन-प्रतिवचन-परी- क्षार्थमादिश्यते । यथा नित्यः पुरुष इति प्रतिज्ञाते, यत्परः को हेतुरि- त्याह सोऽनुयोगः ॥ ५२ ॥ अनुयोग—विशेष विद्या वाले पुरुष का उसी (एक समान) विद्या वाले पुरुष के साथ ज्ञान, विज्ञान, प्रतिवचन शक्ति की परीक्षा के लिये सम्पूर्ण उसी शास्त्र में अथवा उस शास्त्र के किसी एक भाग में प्रश्न करना 'अनुयोग' कहाता है। जैसे—एक ने प्रतिज्ञा की—पुरुष नित्य है। दूसरे ने पूछा—इसमें हेतु क्या है ? यह कहना अनुयोग है ॥ ५२ ॥ अथ प्रत्यनुयोगः -प्रत्यनुयोगो नामानुयोगस्यानुयोगः; यथा— अस्यानुयोगस्य पुनः को हेतुरिति ॥ ५३ ॥ प्रत्यनुयोग—अनुयोग का अनुयोग करना प्रत्यनुयोग है। जैसे—एक ने प्रतिज्ञा की-पुरुष नित्य है, दूसरे ने प्रश्न किया इसमें क्या हेतु है? इस हेतु में क्या हेतु है ? ऐसा प्रश्न पर प्रश्न पूछना 'प्रत्यनुयोग है ॥ ५३ ॥ अथ वाक्यदोषः —वाक्यदोषो नाम यथा —खल्वस्मिन्नर्थे न्यूनम- धिकमनर्थकमपार्थकं विरुद्धं चेति । तत्र प्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयनि- गमनानामन्यतमेनापि न्यूनं न्यूनं भवतीति, बहुद्दिष्टहेतुकमेकेन साध्यते हेतुना तच्च न्यूनम्, एतानि ह्यन्तरेण प्रकृतोऽप्यर्थः प्रनश्येत् । वाक्यदोष—वाक्य में विषय की दृष्टि से निम्न दोष होते हैं जैसे—न्यून, अधिक, अनर्थक, अपार्थक और विरुद्धार्थ।

५७८ चरकसंहिता [ अ० ८ न्यून—प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय, निगमन इनमें से किसी एक से भी न्यून हो तो वह न्यून दोष गिना जाता है। अथवा जो वस्तु बहुत से हेतु देकर सिद्ध करनी चाहिये, उस वस्तु को केवल एक ही हेतु से सिद्ध किया जाये तो वह भी 'न्यून' दोष समझना चाहिये। अथाधिकं—अधिकं नाम यदायुर्वेदे भाष्यमाणे बार्हस्पत्यमौशन- समन्यद्वा यत्किंचिदप्रतिसंबद्धार्थमुच्यते । यद्वा पुनः प्रतिसंबद्धार्थमपि द्विरभिधीयते तत्पुनरुक्तत्वादधिकम् । तच्च पुनरुक्तं, द्विविधम् । अर्थ- पुनरुक्तं शब्दपुनरुक्तं च । तत्रार्थपुनरुक्तं नाम यथा—भेषजमौषधं साधनमिति, शब्दपुनरुक्तं नाम पुनः भेषजं भेषजमिति । अधिक-न्यून से विपरीत हेतु आदि उदाहरण अधिक हों उसको अधिक कहते हैं। अथवा आयुर्वेद के विषय में बार्हस्पत्य, औशनस आदि अन्य अप्रासंगिक बातों का कहना, अथवा प्राकृत ( सम्बन्धित ) वस्तु को दो बार कहना यह भी पुनरुक्त होने से 'अधिक' ही होता है। यह पुनरुक्त दो प्रकार का है । जैसे—अर्थपुनरुक्त और शब्दपुनरुक्त । इनमें 'अर्थपुनरुक्त' दो प्रकार का है । जैसे—भेषज, औषध और साधन । 'शब्दपुनरुक्त' जैसे 'भेषज भेषज' है। अनर्थकं नाम यद्वचनमक्षरग्राममात्रमेव स्यात्पञ्चवर्गवन्न चार्थतः गृह्यते । अनर्थक— जिनका कहना पंचवर्ग ( ङ ञ ण न म ) के समान केवल अक्षर समूह ( वर्णमाला ) के रूप में होता है, जिसका कोई अर्थ नहीं निकलता उसका नाम 'अनर्थक' है। अथापार्थकं—अपार्थकं नाम यदर्थवच्च परस्परेण चायुज्यमानार्थ- कम् । यथा—चक्र-नक्र-वंश-वज्र-निशाकरा इति । अपार्थक—जब बहुतोंमें से प्रत्येक शब्द अर्थ वाला होकर भी वे सब पर- स्पर मिलकर किसी भी अर्थ को न बता सकें तब 'अपार्थक' दोष होता है । जैसे—चक्र, नक्र, वंश, वज्र, निशाकर आदि । इनमें से प्रत्येक का पृथक् २ अर्थ है, परन्तु मिलने पर कोई संगत अर्थ नहीं निकलता । विरुद्धं नाम यद्दृष्टान्तसिद्धान्तसमयैर्विरुद्धं, तत्र दृष्टान्तसिद्धान्ता- वुक्तौ,समयः पुनस्त्रिधा भवति, यथा—आयुर्वेदिकसमयो याज्ञिकसमयो मोक्षशाब्दिकसमय इति । तत्रायुर्वेदिक्समयश्चतुष्पादं भेषजमिति,याज्ञि- कसमयः, आलब्ध्याः पशव इति,सर्वभूतेष्वहिंसेति मोक्षशाब्दिकसमयः । तत्र स्वसमयविपरीतमुच्यमानं विरुद्धं भवतीति वाक्यदोषः ॥ ५४ ॥

अ० ८ ] विमानस्थानम् ५७६

अ० ८ ] विमानस्थानम् ५७६ विरुद्ध- जो वाक्य दृष्टान्त, सिद्धान्त और समय के विपरीत हो । यह विरुद्ध तीन प्रकार का है, दृष्टान्त-विरुद्ध, सिद्धान्त-विरुद्ध और समय-विरुद्ध । इनमें दृष्टान्त और सिद्धान्त दोनों को पीछे कह चुके हैं । समयविरुद्धम्-समय तीन प्रकार का है । यथा-(१) याज्ञिक समय, (२) आयुर्वेदिक समय और (३) मोक्षशास्त्रिक समय । इनमें आयुर्वेदिक-समय जैसे-भेषज चतुष्पाद (भिषक्, द्रव्य, उपस्थाता और रोगी) है । याज्ञिक- समय जैसे-यजमान को चाहिये कि पशुओं का आलम्भन करे। मोक्षशास्त्रिक समय जैसे-सब प्राणियों के प्रति अहिंसा वृत्ति रखे । इनमें अपने २ समय अर्थात् सिद्धान्त के विपरीत कहना 'विरुद्धम्' है । ये वाक्यदोष हैं ॥ ५४ ॥ अथ वाक्यप्रशंसा नाम यथा खल्वास्मिन्नर्थे त्वन्यूनमनधिकम- र्थवदनपार्थकमविरुद्धमधिगतपदार्थं चेति यत्तद्वाक्यमननुयोज्यमिति प्रशस्यते ॥ ५५ ॥ वाक्य प्रशंसा-जिस वाक्य में न्यून और अधिक दोष न हों, जो अर्थवान् होकर भी अनर्थक और विरुद्ध न हो और पदार्थ को कहने वाला तथा दूसरे से अनुयोज्य न हो ऐसा वाक्य प्रशंसायोग्य होता है, इसे वाक्यप्रशंसा कहते हैं । अथ च्छलं-छलं नाम परिशठमर्थाभासमनर्थकं वाग्वस्तुमात्रमेव तद्द्विविधं वाक्छलं, सामान्यच्छलं च । छल-शठ के प्रति वञ्चना के लिये अर्थ की भाँति दीखने वाले अनर्थक, वाणी मात्र को (दूसरे के वचन को नष्ट करने के लिये) प्रयुक्त करना 'छल' है । यह छल दो प्रकार का है * (१) वाक्छल और (२) सामान्य छल । तत्र वाक्छलं नाम यथा-कश्चिद् ब्रूयान्नवतन्त्रोऽयंभिषगिति । भिषग् ब्रूयाद्-नाहं नवतन्त्र एकतन्त्रोऽहमिति । परो ब्रूयात्-नाहं ब्रवीमि नवतन्त्राणि तवेति, अपितु नवाभ्यस्तं हि ते तन्त्रमिति । भिषग्ब्रूयात्- न मया नवाभ्यस्तं तन्त्रमनेकधाऽभ्यस्तं मया तन्त्रमिति । एतद्वाक्छलम् । इनमें वाक् छल-जैसे कोई कहे कि यह वैद्य तो नवतन्त्रों वाला है। वैद्य कहे कि मैं नव (नौ) तंत्रों वाला नहीं हूं । दूसरा व्यक्ति कहे कि मैं यह नहीं कहता कि तुम नौ तंत्रों वाले हो, अपितु तुमने तंत्रों का नया ही अभ्यास किया है । वैद्य कहे कि मैंने तन्त्रों का नया अभ्यास नहीं किया अपितु अनेक वार किया है; यह वाक्-छल है ।

  • न्यायदर्शन में 'तत् त्रिविधं वाक्छलं सामान्यच्छलमुपचारच्छलं च ।' न्याय० १ । २ । ५२ । 'धर्मविकल्पनिर्देशेऽर्थसद्भावप्रतिषेध उपचारच्छलम्' ॥ न्याय० १ । २ । ५५ ।

५८० चरकसंहिता [ अ० ८ सामान्यच्छलं नाम यथा-व्याधिप्रशमनायौषधमित्युक्ते परो ब्रूयात्-सत् सत्प्रशमनायेति । ( किंतु ) भवानाह, सन् हि रोगः, सदौ- षधं, यदि च सत् सत्प्रशमनाय भवति, तत्र सन हि कासः, सत् क्षयः, सत्सामान्यात्कासस्ते क्षयप्रशमनाय भविष्यतीति । एतत्सामान्य- च्छलम् ॥ ५६ ॥ सामान्यच्छल—जैसे—व्याधि को शान्त करने के लिये औषध है, ऐसा कहने पर दूसरा कहे कि सत् वस्तु से सत् का प्रशमन होता है । यह आप कहते हैं । रोग भी सत् है । और औषध भी सत् है । यदि सत् वस्तु से सत् वस्तु का प्रशमन होता तो तेरे मत में सत् कास से सत् क्षय का नाश होना चाहिये, क्योंकि सत् धर्म दोनों में समान है । कास भी सत् है क्षय भी सत् है । यह सामान्य छल है ॥ ५६ ॥ अथाहतुः—अहेतुर्नाम प्रकरणसमः संशयसमो वर्ण्यसम इति । अहेतु—वास्तव में जो हेतु न हो । यह तीन प्रकार का है । जैसे—( १ ) प्रकरणसम, ( २ ) संशयसम और ( ३ ) वर्ण्यसम । तत्र प्रकरणसमो नामाहेतुर्यथा—अन्यः शरीरादात्मा नित्य इति पक्षे ब्रूयात्-यस्मादन्यः शरीरादात्मा तस्मान्नित्यः, शरीरं ह्यनित्यमतो विधर्मिणा चाऽऽत्मना भवितव्यमित्येष चाहेतुः, न हि य एव पक्षः स एव हेतुः । प्रकरणसम अहेतु—जैसे कोई कहे कि आत्मा शरीर से भिन्न है । इस पर दूसरा कहे कि आत्मा शरीर से अलग है, इसलिये नित्य है; शरीर अनित्य है । इसलिये आत्मा को विधर्मी होना ही चाहिये, यह अहेतु है । क्योंकि जो पक्ष ( प्रतिज्ञा वा साध्य ) है वही हेतु नहीं हो सकता । संशयसमो नामाहेतुर्य एव संशयहेतुः स एव संशयच्छेदहेतुः । यथा—अयमायुर्वेदकदेशमाह, किंवायं चिकित्सकः स्यान्नवेति संशये परो ब्रूयात्-यस्मादयमायुर्वेदैकदेशमाह तस्माच्चिकित्सकोऽयमिति, न च संशयहेतुं विशेषयत्येष चाहेतुः, न हि य एव संशयहेतुः स एव संशयच्छेदहेतुर्भवति । संशयसम अहेतु—जो हेतु संशय का कारण हो, वही हेतु संशय के नाश का भी कारण हो जाय । जैसे-किसीने आयुर्वेद का कुछ भाग कहा, इसमें संशय हुआ कि यह चिकित्सक है या नहीं ? इस पर दूसरा व्यक्ति कहता है कि-चूंकि इसने आयुर्वेद का कुछ भाग कहा है, इसलिये वह चिकित्सक है ।

अ० ८ ] विमानस्थानम् ५८१

अ० ८ ] विमानस्थानम् ५८१ संशय के नाश करने वाले हेतु का स्पष्टीकरण नहीं करता, इसलिये यह अहेतु है । क्योंकि जो हेतु स्वयं संशय का कारण है, वही संशय के नाश का कारण नहीं हो सकता । वर्ण्यसमो नामाहेतुर्यो वर्ण्यविशिष्टः । यथा परो ब्रूयात्-अस्पर्शत्वाद् बुद्धिरनित्या शब्दवदिति, अत्र वर्ण्यः शब्दो बुद्धिरपि वर्ण्या, तदुभय- वर्ण्यविशिष्टत्वाद्वर्ण्यसमोऽप्यहेतुः ॥ ५७ ॥ वर्ण्यसम अहेतु — जो हेतु साध्य के समान असिद्ध होने से साध्य की भांति साधने योग्य होता है। जैसे किसी ने कहा कि बुद्धि अनित्य है, स्पर्श, न होने के कारण, शब्द की भांति। इनमें बुद्धि साध्य है, शब्द भी साध्य है । इसलिये दोनों के असिद्ध होने से यह वर्ण्यसम अहेतु है ॥ ५७ ॥ अथातीतकालं—अतीतकालं नाम यत्पूर्व वाच्यं तत्पश्चादुच्यते, तत्कालातीतत्वादग्राह्यं भवतीति । पूर्वं वा निग्रहप्राप्तमनिगृह्य पक्षान्त- रितं पश्चान्निगृह्णीते तत्तस्यातीतकालत्वान्निग्रहवचनमसमर्थं भवतीति ५८ अतीतकाल — जो बात पहिले कहनी चाहिये, उसको पीछे कहना 'अतीत- काल' है । समय के व्यतीत होने के कारण वह बात अग्रहणीय होजाती है । अथवा दूसरे प्रतिवादी के निग्रह स्थान में आने पर उस समय उसको न पकड़ कर दूसरे पक्ष में पहुंचने पर पीछे से निग्रह करना, यह भी अतीत काल होने से निग्रह में असमर्थ होता है ॥ ५८ ॥ अथोपालम्भः—उपालम्भो नाम हेतोर्दोषवचनं; यथापूर्वमहेतवो हेत्वाभासा व्याख्याताः ॥ ५६ ॥ उपालम्भ — हेतु में प्रकरणसम आदि दोष दिखाना 'उपालम्भ' है। जैसे पहिले कहे अहेतु जो कि हेतु न होने पर भी हेतु की भांति दीखते हैं ॥ ५६ ॥ अथ परिहारः—परिहारो नाम तस्यैव दोषवचनस्य परिहरणम् । यथा—नित्यमात्मनि शरीरस्थे जीवलिङ्गान्युलभ्यन्ते, तस्य चापगमा- न्नोपलभ्यन्ते, तस्मादन्यः शरीरादात्मा नित्यश्चेति ॥ ६० ॥ परिहार—हेतु में कहे दोष का दूर करना 'परिहार' है। जैसे—शरीरस्थ आत्मा में प्राण अपान आदि जीव के लक्षण नित्य उपलब्ध होते हैं और आत्मा के शरीर से निकल जाने पर ये लक्षण उपलब्ध नहीं होते, इस लिये आत्मा शरीर से भिन्न दूसरी वस्तु है और वह नित्य है ॥ ६० ॥ अथ प्रतिज्ञाहानिः — प्रतिज्ञाहानिर्नाम सा पूर्वप्रतिगृहीतां पर्य॑नुयुक्तः परित्यजति । यथा-प्राक् प्रतिज्ञां कृत्वा 'नित्यः पुरुष' इति । पर्यनुयुक्त- स्त्वाह—अनित्य इति ॥ ६१ ॥

५८२ चरकसंहिता [ अ० ८ प्रतिज्ञाहानि—पहिले की हुई प्रतिज्ञा को छोड़ कर दूसरी प्रतिज्ञा को स्वी- कार करना 'प्रतिज्ञाहानि' है। जैसे—प्रथम प्रतिज्ञा की—पुरुष नित्य है, अकृतक होने से, आकाशवत्। दूसरे प्रतिपक्षी ने कहा—पुरुष अनित्य है, इन्द्रिय-ग्राह्य होने से, घड़े के तुल्य। इसमें अपनी प्रतिज्ञा (नित्य पुरुष) को छोड़ कर दूसरी प्रतिज्ञा (अनित्य पुरुष है) को स्वीकार करना प्रतिज्ञा- हानि है ॥ ६१ ॥ अथाभ्यनुज्ञा—अभ्यनुज्ञा नाम य इष्टानिष्टाभ्युपगमः ॥ ६२ ॥ अभ्यनुज्ञा—इष्ट (परपक्ष में दोष) और अनिष्ट (स्वपक्ष में दोष) दोनों को स्वीकार करना 'अभ्यनुज्ञा' है। दूसरे से कहे हुए दोष को अपने पक्ष में मान लेना और दूसरे के पक्ष में दोष दिखाना 'अभ्यनुज्ञा' वा 'मतानुज्ञा' है ॥६२॥ अथ हेत्वन्तरं—हेत्वन्तरं नाम प्रकृतेर्हेतौ वाच्ये यद्विकृतिकहेतु- माह ॥ ६३ ॥ हेत्वन्तर—प्रासंगिक हेतु के स्थान पर विकृत हेतु अर्थात् अप्रासंगिक हेतु कहना 'हेत्वन्तर' है ॥ ६३ ॥ अथार्थान्तरं—अर्थान्तरं नाम एकस्मिन् वक्तव्ये परं यदाह; यथा— ज्वरलक्षणे वाक्ये प्रमेहलक्षणमाह ॥ ६४ ॥ अर्थान्तर—एक वस्तु के प्रसंग में दूसरी वस्तु का कहना 'अर्थान्तर' है। यथा—ज्वर के लक्षणों में प्रमेह के लक्षण कहने लगना ॥ ६४ ॥ अथ निग्रहस्थानं—निग्रहस्थानं नाम पराजयप्राप्तिः, तच्च त्रिर- भिहितस्य वाक्यस्याविज्ञानं परिषदि विज्ञानवत्यां; यद्वा अननुयोज्य- स्यानुयोगोऽनुयोज्यस्य चाननुयोगः। प्रतिज्ञाहानिरभ्यनुज्ञाकालातीतव- चनमहेतवो न्यूनमतिरिक्तं व्यर्थमपार्थकं पुनरुक्तं विरुद्धं हेत्वन्तर- मर्थान्तरं निग्रहस्थानम् ॥ ६५ ॥ निग्रहस्थान का दूसरा नाम पराजय-प्राप्ति है। यह विज्ञानवती परिषद् में तीन बार कहे हुए वाक्य को न जानना, या अननुयोज्य का अनुयोग, अथवा अनुयोज्य का अननुयोग है अर्थात् जहां प्रश्न न करना चाहिये वहां प्रश्न करना और जहाँ करना चाहिये वहाँ न पूछना भी निग्रहस्थान ही है। इसके अतिरिक्त प्रतिज्ञाहानि, अभ्यनुज्ञा, अतीतकालवचन, अहेतु, न्यून, अतिरिक्त, व्यर्थ, अनर्थक, पुनरुक्त, विरुद्ध, हेत्वन्तर, अर्थान्तर, ये सब बातें पराजय का कारण होती हैं ॥ ६५ ॥ इति वादमार्गपदानि यथोद्देशमभिनिर्दिष्टानि भवन्ति ॥ ६६ ॥ इस प्रकार से बाद के मार्गों को पूर्व कथनानुसार कह दिया है ॥ ६६ ॥

अ० ८ ] विमानस्थानम् ५८३

अ० ८ ] विमानस्थानम् ५८३ वादस्तु खलु भिषजां वर्तमानो वर्तेतायुर्वेद एव, नान्यत्र ॥ ६७ ॥ वैद्यजनों के वाद का विषय केवल आयुर्वेद ही है, अन्यत्र नहीं ॥ ६७ ॥ अत्र हि वाक्यप्रतिवाक्यविस्तराः केवलाश्चोपपत्तयश्च सर्वाधिकर- णेषु । ताः सर्वाः सम्यगवेक्ष्यावेक्ष्य सर्वं वाक्यं ब्रूयात्, नाप्रकृतकम- ज्ञाक्षमपरीक्षितमसाधकमकुलमव्यापकं वा, सर्वं च हेतुमद् ब्रूयात्, हेतुमन्तो ह्यकलुषाः सर्व एव वादविग्रहाः चिकित्सिते कारणभूताः; प्रशस्तबुद्धिवर्धकत्वात्, सर्वारम्भसिद्धिं ह्यवहत्यनुपहता बुद्धिः ॥ ६८ ॥ इस आयुर्वेद में वाक्य, प्रतिवाक्य, इसका विस्तार, सम्पूर्ण उपपत्तियां ये सब बातें प्रकरणों में हैं। उन सबका भली प्रकार देखकर सम्पूर्ण वाक्य कहना चाहिये । अप्रकृतक ( असम्बद्ध ), शास्त्ररहित, अपरीक्षित, साधकरहित, बिना जाने कुछ नहीं कहना चाहिये; जो कुछ कहना हो वह सब कारण वा हेतु, युक्तिपूर्वक कहना चाहिये, क्योंकि हेतुपूर्वक कहे हुए सम्पूर्णवाद-विग्रह स्वच्छ होते हैं, तथा चिकित्सा में कारणभूत हैं, क्योंकि वे निर्मलबुद्धि सब प्रकार की सफलता को उत्पन्न करती है ॥ ६८ ॥ इमानि खलु तावदिह कानिचित्प्रकरणानि ब्रूमो भिषजां ज्ञानार्थम् । ज्ञानपूर्वकं कर्मणां समारम्भं प्रशंसन्ति कुशलाः ॥ ६६ ॥ ज्ञात्वा हि कारण-करण-कार्ययोनि-कार्य-कार्यफलानुबन्ध-देश-कालप्रवृ- त्त्युपायान्सम्यगभिनिर्वर्तमानः कार्याभिनिवृत्ताविष्टफलानुबन्धं कार्य- मभिनिर्वर्तयत्यनतिमहता प्रयत्नेन कर्ता ॥ ७० ॥ निम्न कुछ प्रकरणों को वैद्यों के ज्ञान के लिये कहते हैं क्योंकि विद्वान् लोग ज्ञानपूर्वक कर्मों का आरम्भ करने की प्रशंसा करते हैं। कारण, करण, कार्ययोनि, कार्य, कार्यफल, अनुबन्ध, देश, काल, प्रवृत्ति और उपाय, इनको भली प्रकार जान कर ही कर्म करता हुआ कर्त्ता स्वल्प प्रयत्न से ही कार्यसमाप्ति पर फल देने वाले कार्य का सम्पादन करता है ॥ ७० ॥ तत्र कारणं नाम तत्, यत्करोति, स एव हेतुः, स कर्ता ॥ ७१ ॥ कारण—जो करता है वही 'कारण' है, इसी को हेतु या 'कर्त्ता' कहते हैं ॥ ७१ ॥ करणं पुनस्तद्, यदुपकरणायोपकल्पते कर्तुः कार्याभिनिर्वृत्तौ प्रय- तमानस्य ॥ ७२ ॥ करण—प्रयत्न करने वाले कर्त्ता के कार्य को पूर्ण करने के लिये जिस साधन की अपेक्षा होती है, उस साधन को 'करण' कहते हैं ॥७२॥ कार्ययोनिस्तु सा, या विक्रियमाणा कार्यत्वमेवाऽऽपद्यते ॥७३॥

५८४ चरकसंहिता [ अ० ८

कार्ययोनि—जो विकृत होकर कार्य रूप से प्रकट होती है ॥ ७३ ॥ कार्यं तु तद्, यस्याभिनिर्वृत्तिमभिसंधाय प्रवर्तते कर्ता ॥ ७४ ॥ कार्य — जिसकी सफलता को सामने रखकर कर्त्ता प्रवृत्त होता है ॥७४॥ कार्यफलं पुनस्तद्, यत्प्रयोजना कार्याभिनिर्वृत्तिरिष्यते ॥ ७५ ॥ कार्यफल — जिस मतलब से कार्य किया जाता है ॥७५॥ अनुबन्धस्तु खलु स यः कर्तारमवश्यमनुबध्नाति कार्यादुत्तरकालं कार्यनिमित्तः शुभो वाऽप्यशुभो वा भावः ॥ ७६ ॥ अनुबन्ध— कार्य करने के पीछे जो शुभ या अशुभ ( कार्यजन्य ) कर्म के कारण कर्त्ता को कर्म से बांधता है, उसका नाम 'अनुबन्ध' है ॥७६॥ देशस्त्वधिष्ठानम् ॥ ७७ ॥ देश—अधिष्ठान, आश्रयस्थान है ॥७७॥ कालः पुनः परिणामः ॥ ७८ ॥ काल का अर्थ परिणाम है ॥७८॥ प्रवृत्तिस्तु खलु चेष्टा कार्यार्था, सैव क्रिया कर्म यत्नः कार्य- समारम्भश्च ॥ ७६ ॥ प्रवृत्ति—प्रवृत्ति का अर्थ कार्य के लिये चेष्टा, इसीका नाम क्रिया, कर्म, यत्न और कार्य-समारम्भ ( प्रारम्भ ) है ॥ ७६ ॥ उपायः पुनस्त्रयाणां कारणादीनां सौष्ठवमभिविधानं च सम्यक् कार्यकार्या... कार्यकार्या... कार्यकार्या... कार्यकार्या... कार्यकार्या... कार्यकार्या... 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वाले वैद्य को चाहिये कि कार्य करने से पूर्व सम्पूर्ण परीक्षा से परीक्षणीय वस्तु की परीक्षा करके काम करना आरम्भ करे ॥८१॥ तत्र चेद्विद्वाङ् अभिषग्वा भिषजं कश्चिदेवं पृच्छेत्-वमन-विरेचना- स्थापनानुवासन-शिरोविरेचनानि प्रयोक्तुकामेन भिषजा कतिविधया परीक्षया कतिविधमेव परीक्ष्यं, कश्चात्र परीक्ष्यविशेषः, कथं च परी- क्षितव्यः, किंप्रयोजना च परीक्षा, क्व च वमनादीनां प्रवृत्तिः, क्व च निवृत्तिः, प्रवृत्तिनिवृत्तिलक्षणसंयोगे च किं नैष्ठिकं, कानि च वमना- दीनां भेषजद्रव्याण्युपयोगं गच्छन्तीति ॥ ८२ ॥ यदि कभी भिषग् अथवा साधारण मनुष्य, जो वैद्य नहीं, वैद्य से पूछे कि वमन, विरेचन, आस्थापन, अनुवासन, शिरोविरेचन देने की इच्छा वाले वैद्य की कितनी प्रकार की परीक्षायें, कितने प्रकार का परीक्ष्य और परीक्षा में विशे- षता क्या है, उसकी किस प्रकार से परीक्षा करनी चाहिये, परीक्षा का क्या प्रयोजन है ? वमन आदि का कहाँ प्रयोग करना और कहाँ नहीं करना चाहिये! प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों के लक्षण मिलें तो क्या करना ? वमन आदि कार्यों में कौन से औषध द्रव्य काम में आते हैं, इत्यादि प्रश्न करे तब निम्न प्रकार से उत्तर देना चाहिये ॥ ८२ ॥ स एवं पृष्टो यदि मोहयितुमिच्छेत्, ब्रूयादेनं - बहुविधा हि परी- क्षा तथा परीक्ष्यविधिभेदः, कतमेन विधिभेदप्रकृत्यन्तरेण भिन्नया परीक्षया केन वा विधिभेदप्रकृत्यन्तरेण परीक्ष्यस्य भिन्नस्य भेदाग्रं भवान्पृच्छत्याख्यायमानं, नेदानीं भवताऽन्येन विधिभेदप्रकृत्यन्तरेण भिन्नया परीक्षयाऽन्येन वा विधिभेदप्रकृत्यन्तरेण परीक्ष्यस्य भिन्नस्या- भिलषितमर्थं श्रोतुमहमन्येन परीक्षाविधिभेदप्रकृत्यन्तरेणान्येन वा विधिभेदप्रकृत्यन्तरेण परीक्ष्यं भित्त्वाऽन्यथाऽऽचक्षाण इच्छां प्रपूर- येयमिति ॥ ८३ ॥ यदि वैद्य पूछने वाले को परेशान करना चाहे तो-परीक्षा और परीक्षा- विधि इनके अनेक भेद होते हैं । आप कौन सी विधि-भेद-प्रकृति से भिन्न परीक्षा से अथवा कौन से विधि-भेद-प्रकृति से भिन्न परीक्ष्य के भेद को पूछना चाहते हैं। वही कहा जाय ? आप से बिना यह जाने कि आप कौन से विधि- भेद-प्रकृति से भिन्न परीक्षा वा कौन से विधि-भेद-प्रकृति से भिन्न परीक्ष्य को जानना चाहते हैं, मैं और भेदों को कहकर आपकी इच्छा को पूर्ण नहीं कर सकता ॥८३॥

५८६ चरकसंहिता [ अ० ८ स यदुत्तरं ब्रूयात्तत्परीक्ष्योत्तरं वाक्यं स्याद्यथोक्तं प्रतिवचनविधि- मवेक्ष्य; सम्यग्यदि तु ब्रूयात्, न चैनं मोहयितुमिच्छेद्, प्राप्तं तु वच- नकालं मन्येत काममस्मै ब्रूयादाप्तमेव निखिलेन ॥ ८४ ॥ इस पर जो उत्तर वह दे, उसकी परीक्षा करके, प्रतिवचन विधि के अनु- सार उचित उत्तर दे। यदि वह भली प्रकार से कहे और इसको चक्कर में डालकर चाहे तो इसके लिये सब कुछ विश्वस्त रूप से कह दे ॥८४॥ द्विविधा खलु परीक्षा ज्ञानवतां प्रत्यक्षमनुमानं च, एतद्धि द्वय- मुपदेशश्च परीक्षा स्यात् । एवमेषा द्विविधा परीक्षा, त्रिविधा वा सहोपदेशेन ॥ ८५ ॥ बुद्धिमानों के लिये परीक्षा दो प्रकार की है। प्रत्यक्ष और अनुमान (ये दोनों पहले कहे गये हैं) और तीसरी उपदेश भी परीक्षा है, इस प्रकार से यह दो प्रकार की परीक्षा उपदेश (आप्तोपदेश) के साथ तीन प्रकार की हो जाती है ॥ ८५ ॥ दशविधं तु परीक्ष्यं कारणानि यदुक्तमग्रे। तदिह भिषगादिषु संसार्य संदर्शयिष्यामः—इह कार्यप्राप्तेः कारणं भिषक्, करणं पुनर्भै- षजम्, कार्ययोनिर्धातुवैषम्यं, कार्यं धातुसाम्यं, कार्यफलं सुखावाप्तिः, अनुबन्धस्तु खल्वायुः, देशो भूमिरातुरश्च। कालः पुनः संवत्सरश्चाऽऽतु- रावस्था च। प्रवृत्तिः प्रतिकर्मसमारम्भः। उपायस्तु भिषगादीनां सौष्ठ- वमभिविधानं च सम्यक्। इहाप्यस्योपायस्य विषयः पूर्वेणैवो पाय विशे- षेण व्याख्यात इति कारणादीनि दश दशसु भिषगादिषु संसार्य संद- र्शितानि, तथैवाऽऽनुपूर्व्या एतद्दशविधं परीक्ष्यमुक्तम् ॥ ८६ ॥ पहिले यह कहा है कि परीक्ष्य (कारण आदि) वस्तु दस प्रकार की हैं। इसी को भिषग् आदि में घटाकर दिखाते हैं यहां कार्यप्राप्ति में कारण भिषक् है, औषध करण है। धातुओं की विषमता कार्ययोनि है। धातुओं को समान करना कार्य है। सुख का मिलना कार्यफल है। आयु अनुबन्ध है। भूमि और रोगी देश हैं। संवत्सर और रोगी की अवस्था काल है। प्रत्येक कर्म का आरम्भ करना प्रवृत्ति है। भिषग् औषध, परिचारक और रोगी इनका भली प्रकार से मेल उपाय है। यहाँ पर भी इस उपाय के सम्बन्ध में सब बातें पूर्वोक्त उपायविशेष के साथ कह दी हैं। धातुसाम्य रूपी कार्य के करने पर आरोग्यता निश्चित है। इस प्रकार से कारण आदि दसों को भिषग् आदि में घटाकर दिखा दिया है, इसी प्रकार क्रम से यह दश प्रकार का 'परीक्ष्य' कह दिया है ॥ ८६ ॥

अ० ८ ] विमानस्थानम् ५८७

अ० ८ ] विमानस्थानम् ५८७ तस्य यो यो विशेषो यथा यथा च परीक्षितव्यः स तथा तथा व्याख्यास्यते ॥ ८७ ॥ इस दश प्रकार की परीक्षा में जो जो विशेषता है और जिस जिस प्रकार से परीक्षा करनी चाहिये उसकी उसी २ प्रकार से व्याख्या करते हैं ॥ ८७ ॥ कारणं भिषगित्युक्तमग्रे, तस्य परीक्षा—भिषङ् नाम स यो भेषति, यः सूत्रार्थप्रयोगकुशलः, यस्य चायुः सर्वथा विदितम् यथाव- त्सर्वधातुसाम्यं चिकीर्षन्नात्मानमेवाऽऽदितः परीक्षेत गुणिषु गुणतः कार्याभिनिर्वृत्तिं पश्यन्— कश्चिदहमस्य कार्यस्याभिनिर्वर्तने समर्थो न वेति । तत्रेमे भिषग्गुणा यैरुपपन्नो भिषग्धातुसाम्याभिनिर्वर्तने समर्थो भवति । तद्यथा,-पर्यवदातश्रुतता परिदृष्टकर्मता दाक्ष्यं शौचं जितहस्तता उपकरणवत्ता सर्वेन्द्रियोपपन्नता प्रकृतिज्ञता प्रतिपत्तिज्ञता चेति ॥८८॥ पहिले कहा है कि भिषक् कारण है। इस भिषक् की परीक्षा यह है । जो पीड़ा ( रोग ) को दूर करता, शमन करता है, वह भिषक् है। जो आयुर्वेदीय सूत्रों में, प्रयोग में और कर्म में कुशल है, जिसे रोगी की आयु हित-अहित, सुख-असुख, प्रमाण-अप्रमाण और स्वरूप से भली प्रकार विदित है, शास्त्रज्ञ, कर्म को जानने वाला वैद्य सब धातुओं की समानता करने की इच्छा से सबसे प्रथम अपनी परीक्षा करे । जैसे गुण के योग से कार्य में सफलता को देखता हुआ वैद्य गुणियों अर्थात् भिषग्-द्रव्य, रोगी और परिचारकों में अपनी परीक्षा करे, क्या मैं इस कार्य को करने में समर्थ हूँ वा नहीं । भिषक् के निम्नलिखित गुण हैं जिन गुणों से युक्त होने पर वैद्य धातुसाम्य रूपी कार्य करने में समर्थ होता है । यथा- विमल शास्त्र-ज्ञान, सब प्रकार के कर्म का साक्षात् अनुभव, दक्षता, शस्त्रोपचार आदि में हस्तलाघव, उपकरणों का होना, सब इन्द्रियों से युक्त होना, रोगी की प्रकृति का ज्ञान और प्रतिपत्ति अर्थात् जिस रोगी की जैसी चिकित्सा करनी चाहिये उसका ज्ञान ॥ ८८ ॥ करणं पुनर्भेषजं; भेषजं नाम तद्यदुपकरणायोपकल्पते भिषजो धा- तुसाम्याभिनिर्वृत्तौ प्रयतमानस्य विशेषतश्चोपायान्तरेभ्यः । तद्द्विविधं व्यपाश्रयभेदात् ;-दैवव्यपाश्रयं युक्तिव्यपाश्रयं चेति । तत्र दैवव्यपाश्रयं मन्त्रौषधिमणि-मङ्गलबल्युपहार-होम-नियम-प्रायश्चित्तोपवास-स्वस्त्ययन- प्रणिपात-गमनादि, युक्तिव्यपाश्रयं-संशोधनोपशमने चेष्टाश्च दृष्टफलाः । एतच्चैव भेषजमङ्गभेदादपि द्विविधं द्रव्यभूतमद्रव्यभूतं च । तत्र यद् द्रव्यभूतं तदुपायाभिप्लुतम् । उपायो नाम भयदर्शनबिस्मापन-विस्मारण- क्षोभण-हर्षण-भर्त्सन-वध - बन्ध-स्वप्न - संवाहनादिरमूर्तो भावविशेषो

५८८ चरकसंहिता [ अ० ८ यथोक्ताः सिद्धयपायाश्चोपायाभिप्लुता इति। यत्त द्रव्यभूतं तद्वमनादिषु योगमुपैति; तस्यापीयं परीक्षा,-इदमेवंप्रकृत्या एवं गुणमेवं प्रभावमस्मि- न्देशे जातमस्मिन्नृताववं गृहीतमेवं निहितमेवमुपस्कृतमनया मात्रया युक्तमस्मिन् रोगे एवंविधस्य पुरुषस्यैतावन्तं दोषमपकर्षत्युपशमयति वा यदन्यदपि चैवंविधं भेषजं भवेत्तच्चानेन विशेषेण युक्तमिति ॥ ८९ ॥ भेषज (औषध) करण है। धातुसाम्यरूप कार्य के करने में प्रयत्न करते हुए वैद्य को जो वस्तु साधन होती हैं उसका नाम 'भेषज' है। यह भेषज (औषध) आश्रय भेद से दो प्रकार की है। (१) दैवव्यपाश्रय और (२) युक्तिव्यपाश्रय। इनमें दैवव्यपाश्रय मंत्र, औषधि, मणि, मंगल, बलि, उपहार, होम, नियम, प्रायश्चित्त, उपवास, दान, स्वस्त्ययन, प्रणिपात (विनय), गमन आदि कार्य दैव का आश्रय करके धातुओं को समान करते हैं। युक्ति- व्यपाश्रय—संशोधन, उपशमन और दृष्टफल वाली चेष्टाएं (धावन, स्वप्न, जागरण आदि)। यही भेषज अंग भेद से दो प्रकार का है। (१) अद्रव्य और (२) द्रव्य। इनमें जो अद्रव्य औषध है वह उपाय से व्याप्त है। भय दिखाना, विस्मय उत्पन्न करना, झिड़कना, बांधना, नींद लाना, अंगमर्दन आदि (दौड़ना, तैरना आदि) अमूर्त्त पदार्थों और चिकित्सा में सफ़लता देने वाले भिषग् आदि गुणों का होना ये उपाय हैं और जो औषध द्रव्य रूप हैं वह वमन आदि शोधन-शमन कार्यों में काम आते हैं। द्रव्य रूप (मूर्त्त) ओषधि की ऐसी परीक्षा करनी उचित है कि इस औषधि की यह प्रकृति है, यह गुण है, ऐसा प्रभाव है, इस देश में उत्पन्न हुई है, इस ऋतु में संग्रह की गई है, इस प्रकार से रक्खी गई है, इस प्रकार के पुरुष को देने से इतने दोष को बाहर करती है अथवा शमन करती है। अन्य भी जो औषध इन या अन्य गुणों से युक्त थी, उसने भी दोषो का निष्कासन अथवा शमन किया था, इस- लिये यह भी करेगी, इस प्रकार अन्यत्र प्रत्यक्ष करके यहां पर अनुमान से निश्चय करना चाहिये ॥ ८६ ॥ कार्ययोनिर्धातुवैषम्यं, तस्य लक्षणं विकारागमः, परीक्षा त्वस्य विकारप्रकृतेश्चैवोनातिरिक्तलिङ्गविशेषावेक्षणं विकारस्य च साध्यासा- ध्य-मृदु-दारुण-लिङ्ग विशेषावेक्षणमिति ॥ ९० ॥ कार्ययोनि—धातुओं की विषमता 'कार्ययोनि' है। विकार का होना यह उसका लक्षण है। इस विकार की प्रकृति के वातादि दोषों के कम अधिक, विशेष लक्षणों को देखना। इसी प्रकार से विकार का साध्य, असाध्य, मृदु, दारुण आदि विशेष लक्षणों से परीक्षा करनी चाहिये ॥ ९० ॥

[अ० ८ ] विमानस्थानम् ५८६

[अ० ८ ] विमानस्थानम् ५८६

कार्यं धातुसाम्यं, तस्य लक्षणं विकारोपशमः, परीक्षा त्वस्य रुगप- शमनं स्वरवर्णयोगः शरीरोपचयः बलवृद्धिश्ञ्चाभ्यवहार्याभिलाषा रुचिरा- हारकालेऽभ्यवहृतस्य चाऽऽहारस्य काले सम्यग्जरणं निद्रालाभो यथा- कालं वैकारियाणां च स्वप्नानामदर्शनं सुखेन च प्रतिबोधनं वातमूत्र- पुरीषरेतसां मुक्तिश्च सर्वाकारर्मनोबुद्धीन्द्रियाणां चाव्यापत्तिरिति ॥६१॥ कार्य—धातुओं का समान करना कार्य है। विकार का शान्त होना यह इसका लक्षण है। इसकी परीक्षा दर्द का शान्त होना है। स्वर और वर्ण का प्राकृत रूप में आजाना। शरीर की वृद्धि, बलवृद्धि, भोजन में इच्छा, आहार के समय रुचि होना, खाये हुए भोजन का आहारकाल में भली प्रकार जीर्ण होना, ठीक समय पर नींद आना, विकार (रोग) जन्य स्वप्नों का न देखना, सुखपूर्वक जागना, प्रातः उठना, वायु, मूत्र, मल और शुक्र का ठीक समय पर त्याग होना, सब प्रकार से मन, बुद्धि और इन्द्रियों में सुख होना ॥ ६१ ॥ कार्यफलं सुखावाप्तिः। तस्य लक्षणं मनोबुद्धीन्द्रियशरीरतुष्टिः ॥६२॥ कार्यफल—सुख का प्राप्त होना। इसका लक्षण-मन, बुद्धि, इन्द्रिय और शरीर का प्रसन्न होना है ॥ ६२ ॥ अनुबन्धस्तु खल्वायुः, तस्य लक्षणं प्राणैः सहः संयोगः ॥ ६३ ॥ अनुबन्ध—आयु है, इसका लक्षण-प्राणों के साथ शरीर का सम्बन्ध बना रहना है ॥ ६३ ॥ देशस्तु भूमिरातुरश्च। तत्र भूमिपरीक्षा—आतुरपरिज्ञानहेतोर्वा स्यादौषधपरिज्ञानहेतोर्वा। तत्र तावदियमातुरपरिज्ञानहेतोः। तद्यथा कस्मिन्नयं भूमिदेशे जातः संवृद्धो व्याधितो वेति । तस्मिंश्च भूमिदेशे मनुष्याणामिदमाहार जातमिदं बिहारजातमेतद्बलमेवंविधं सत्त्वमेवं- विधं सात्म्यमेवंविधा दोषो भक्तिरियमिमे व्याधया हितमिदमहि- तमिदामित (प्रायोग्रहणेन)। औषधपरिज्ञानहेतास्तु कल्पेषु भूमि- परीक्षा वक्ष्यत ॥ ६४ ॥ देश—देश भूमि और रोगी हैं। इनमें भूमि-परीक्षा के ज्ञान का प्रयोजन रोगी के देश के कारण सात्म्य को समझने के लिये और औषधि के ज्ञान के लिये है। इनमें रोगी को समझने के लिये—जैसे-किस भूमि-खण्ड पर यह रोगी उत्पन्न हुआ है? बढ़ा है ? रोगी हुआ है ? उस भूमि पर मनुष्यों का इस प्रकार का अहार है, इस प्रकार का विहार है, इस प्रकार का आचार है, इस प्रकार का बल, इस प्रकार का सत्त्व, इस प्रकार का सात्म्य, इस प्रकार के दोष, इस प्रकार की रुचि, इस प्रकार के रोग, यह हितकर, यह अहितकर है, यह