चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ८ ] ३६ विमानस्थानम् ५६१
अ० ८ ] ३६ विमानस्थानम् ५६१
सुसंवीतेनावाक्शिरसा स्मृतिमतो स्तिमितेनावेक्ष्यावेक्ष्य मनसा सर्व- माचरता बुद्ध्या सम्यगनुप्रवेष्टव्यं, अनुप्रविश्य च वाङ्मनोबुद्धीन्द्रि- याणि न क्वचित्प्रणिधातव्यान्यन्यत्राऽऽतुरादातुरोपकारार्थाद्वाऽऽतुरगतेष्व- न्येषु वा भावेषु, न चाऽऽतुरकुलप्रवृत्तयो बहिर्निश्चारयितव्याः, हसितं चाऽऽयुषः प्रमाणमातुरस्य न वर्णयितव्यं जानताऽपि तत्र यत्रोच्यमा- नमातुरस्यान्यस्य वाऽप्युपघाताय संपद्यते, विज्ञानवताऽपि च नात्यर्थ- मात्मानो ज्ञाने विकत्थितव्यं, आप्तादपि हि विकत्थमानादित्यर्थमुद्वि- जन्त्यनेके ॥ ११ ॥
आचार्य का शिष्य को उपदेश—इसके अनन्तर आचार्य उस शिष्य को अग्नि, ब्राह्मण और वैद्यों के समक्ष (इनके साक्षि रूप में) निम्न उपदेश देवे । तुझको ब्रह्मचारी, श्मश्रुधारी, सत्यवादी, पवित्रभोजी, मात्सर्यरहित, निरामिष- भोजी, निःशस्त्र होकर रहना चाहिये। तुझको मेरी आज्ञा से ही सब कुछ करना चाहिये, परन्तु राजविरुद्ध, प्राणनाशक, बहुत बड़ा अधर्म या अनर्थ का काम हो तो वह काम मेरी आज्ञा से भी नहीं करना चाहिये। तुझको मुझको अर्पण करके, मेरी प्रधानता से, मेरे अधीन रह कर, मेरे प्रिय और मेरे हितकारी रह कर सदा बरतना चाहिये। पुत्र पिता की, भृत्य स्वामी को, अर्थी धनी की जिस प्रकार से सेवा करते हैं, वैसे तुझे मेरी सेवा करनी चाहिये। उत्सुकता- रहित, दत्तचित्त, सावधान, एकाग्र मन से, नम्र होकर, बार २ देख कर कार्य करना चाहिये। तुझे निन्दा से रहित और मेरी आज्ञा से विचरना-घूमना चाहिये। मेरी आज्ञा से या बिना मेरी आज्ञा के घूमने पर भी तुझे प्रथम मुझ गुरु के लिये अर्थ (धन) लाने का प्रयत्न करना चाहिये। चिकित्सा कर्म में सफलता, धनप्राप्ति, यश-लाभ और परलोक में स्वर्ग की कामना से तुझे गो- ब्राह्मण का प्रथम संस्कार कर अन्य सब प्राणियों की मंगल कामना करना चाहिये। प्रति दिन उठते-बैठते, जागते सब अवस्थाओ में, सब समय में, सम्पूर्णरूप से रोगियों के कल्याण के लिये यत्नवान् रहना चाहिये (रोगी को दुःखित करके जीविका नहीं कमानी चाहिये)। मन से भी पर स्त्री की चाह न करनी चाहिये। इसी प्रकार दूसरे के धन को मन से भी नहीं चाहना चाहिये। विनीत (नम्र वेश) वस्त्रों वाला होना चाहिये (उद्धत वेश नहीं पहिनना चाहिये)। प्रमाद रहित, स्वयं पापरहित, तथा पापकर्म में साथी नहीं होना चाहिये। कोमल, निर्दोष, धर्मानुकूल, सुखकारक, सत्य, हितकारी, परिमित वाणी बोलने वाला तथा, देशकाल को विचार कर काम करने वाला,
१६२ चरकसंहिता [ अ० ८ स्मृतिमान् होना चाहिये। ज्ञान और अभ्युदय के उपकरणों को प्राप्त करने में सदा यत्नवान् रहना चाहिये। राजा जिनसे द्वेष करता है, अथवा जो राजा से द्वेष करते हैं, महाजन (बड़े आदमी), जिनसे द्वेष करते हैं, अथवा जो महाजनों से द्वेष करते हैं, उनकी चिकित्सा नहीं करनी चाहिये। इसी प्रकार जिनके शील (स्वभाव) और आचार अत्यन्त निकृष्ट और दुष्ट हों, अल्पवाद, प्रतिकार, धनरहित (जनपदोद्ध्वंस में कहे हुए) लोगों की तथा मरणोन्मुख रोगियों की चिकित्सा नहीं करनी चाहिये। इसी प्रकार जिन स्त्रियों का पति अथवा संरक्षक पास में न हो, उन की भी चिकित्सा नहीं करनी चाहिये। स्त्रियों से दिये धन को पति या संरक्षक के पूछे बिना कभी भी ग्रहण नहीं करना चाहिये, (उनकी आज्ञा से ही ग्रहण करना चाहिये)। रोगी के घर जाते समय चेतावनी देकर, आज्ञा मिलने पर दूसरे पुरुष के साथ उत्तम विनम्र वेश को पहिने हुए शिर को नीचे किये जाना चाहिये। जाते समय स्मृतिमान्, स्थिर मन से भली प्रकार-सोच विचार कर जो कुछ करना हो, भली प्रकार से घर में पहुंच कर करना चाहिये। घर में जा कर रोगी के उपकार के सिवाय रोगी से सम्बन्धित अथवा चिकित्सा से अतिरिक्त अन्य स्थानों में वाणी, मन, बुद्धि और इन्द्रियों को नहीं लगाना चाहिये। रोगी के घर के रहस्यों को बाहर नहीं करना चाहिये। जहाँ पर कहने से किसी अन्य प्राणी के मरने की सम्भावना हो, वहाँ पर मरणोन्मुख लक्षणों से रोगी की आयु का क्षय जानने पर भी नहीं कहना चाहिये। ज्ञानवान् होने पर भी अपने ज्ञान की प्रशंसा नहीं करनी चाहिये, क्योकि सत्यभाषी, आप्त, विद्वान् होकर भी अपने मुख से अपनी प्रशंसा करने वाले से अनेक लोग बहुत उद्विग्न हो जाते हैं ॥ १३ ॥ न चैव ह्यस्ति सुतरमायुर्वेदस्य पारं, तस्मादप्रमत्तः शश्वदभियो- गमस्मिन् गच्छेत्। एतच्च कार्यं, एवं भूयश्च वृत्तसौष्ठवमनसूयता परेभ्योऽप्यागमयितव्यं, कृत्स्नो हि लोको बुद्धिमतामाचार्यः। शत्रुश्चा- बुद्धिमताम्, अतश्चाभिसमीक्ष्य बुद्धिमताऽमित्रस्यापि धन्यं यशस्यमा- युष्यं पौष्टिकं लोकमभ्युपदिशतो वचः श्रोतव्यमनुविधातव्यं चेति।१४। आयुर्वेद ज्ञान की कहीं पर समाप्ति नहीं है। इसलिये इस आयुर्वेद के ज्ञान उपलब्ध करने में सदा प्रमादरहित होकर निरन्तर मनोयोग देवे। यहाँ कहे हुए कार्य सम्पूर्ण रूप से करने चाहिये। इस प्रकार करते हुए निन्दारहित होकर दूसरे लोगों से भी (शास्त्र के सिवाय) अन्य ज्ञान प्राप्त करना चाहिये। क्योंकि बुद्धिमानों का सम्पूर्ण संसार आचार्यवत् है और मूर्खों का वह शत्रु है। अतः
ठीक २ जान कर बुद्धिमान् मनुष्य को शत्रु के भी धन्य, यशकारी, आयुष्य, पौष्टिक और लौकिक वचन को सुनना चाहिये और तदनुसार करना चाहिये॥१२॥ अतः परमिदं ब्रूयात्—देवताग्नि-द्विजाति-गुरु-वृद्ध-सिद्धाचार्येषु ते नित्यं सम्यग्वर्तितव्यम् । तेषु ते सम्यग्वर्तमानस्यायमग्निः सर्वगन्धरस- रत्नबीजानि यथेरिताश्च देवताः शिवाय स्युः । अतोऽन्यथा वर्तमानस्या- शिवायति । इसके आगे निम्न प्रकार से उपदेश देवे—'देवता, अग्नि, ब्राह्मण, गुरु, वृद्ध, सिद्ध और आचार्य इनकी प्रतिदिन भली प्रकार से सेवा करनी चाहिये । इन देवताओं की भली प्रकार से सेवा करने पर यह तेरे सामने उपस्थित अग्नि सब प्रकार के गन्ध, रस, रत्न, बीज और पूर्वोक्त देवता आदि सब तेरे लिये मङ्गलकारी होंगे ।' एवं ब्रुवति चाऽऽचार्ये शिष्यस्तथेति ब्रूयात् । तद्यथोपदेशं च कुर्वन्न- ध्याप्यो ज्ञेयः, अतोऽन्यथा त्वनध्याप्यः । अध्याप्यमध्यापयन् ह्याचार्यो यथोक्तैरध्यापनफलैर्योगमाप्नोत्यन्यैश्चानुक्तैः श्रेयस्करैर्गुणैः शिष्यमा- त्मानं च युनक्ति । इत्युक्तावध्ययनाध्यापनविधी यथावत् ॥ १३ ॥ इस प्रकार से आचार्य के कहने पर शिष्य भो 'तथास्तु' कह कर स्वीकार करे । आचार्य उपदेशानुसार करने वाले शिष्य को पढ़ावे और न करने वाले को नहीं पढ़ावे । पढ़ाने के योग्य शिष्य को पढ़ाने से ही आचार्य को अध्या- पन-कार्य का योग्य फल उचित लाभ मिलता है और यहाँ न कहे हुए दूसरे, अनेक श्रेयस्कर गुणों से शिष्य को और अपने को भी युक्त करता है । इस प्रकार अध्ययन और अध्यापन विधि कह दी ॥ १३ ॥ अध्ययनाध्यापनविधिवत्संभाषाविधिमत ऊर्ध्वं व्याख्यास्यामः— भिषक् भिषजा सह संभाषेत, तद्विद्यसंभाषा हि ज्ञानाभियोगसंहर्षकरी भवति, वैशारद्यमपि चाभिनिर्वर्तयति, वचनशक्तिमपि चाऽऽधत्ते, यशश्चा- भिदीपयति, पूर्वश्रुते च संदेहवतः पुनः श्रवणात् संशयमपकर्षति, श्रुते चासंदेहवतो भूयोऽध्यवसायमभिनिर्वर्तयति, अश्रुतमपि च कंचिदर्थं श्रोत्रविषयमापादयति, यच्चाऽऽर्थः शिष्याय शुश्रूषवे प्रसन्नः क्रमेणो- पदिशति गुह्याभिमतमर्थजातं तत्परस्परेण सह जल्पन् पिण्डेन विजि- गीषुराइ संहर्षात्, तस्मात्तद्विद्यसंभाषामभिप्रशंसन्ति कुशलाः ॥ १४ ॥ संभाषणविधि—अध्ययन-अध्यापन विधि के समान ही अब संभाषणविधि का वर्णन करते हैं । वैद्य वैद्य के साथ संभाषण करे । क्योंकि उसी विद्या को
५६४ चरकसंहिता [ अ० ८ जानने वाले के साथ संभाषण करने से ज्ञान और हर्ष को प्राप्त करता है, ज्ञान की चतुरता उत्पन्न करता है, बोलने की शक्ति पैदा करता है, यश को बढ़ाता है, अध्ययन काल में पहिले सुने शब्द या अर्थ में जरा संदेह होता है, उसको मिटाता है । और संदेह रहित वस्तु में और भी अधिक दृढ़ निश्चय कर लेता है अध्ययन काल में गुरुमुख से न सुना हुआ भी कुछ विषय यहां पर सुनने में आता है और आचार्य की सेवा करने वाले शिष्य के लिये जो गोपनीय वस्तु ( अर्थ ) प्रसन्न होकर गुरु बताता है, उस गोपनीय बात को यह दूसरे के साथ शास्त्रार्थ करते हुए अपनी विद्वत्ता दिखाने के लिये, जीतने की इच्छा से सार रूप में प्रसन्नतापूर्वक प्रकट कर देता है । इसलिये बुद्धिमान् लोग उस विद्या में निपुण विद्वान् से संभाषण करने की प्रशंसा करते हैं ॥ १४ ॥ द्विविधा तु खलु तद्विद्यसंभाषा भवति—संधाय संभाषा, विगृह्य सम्भाषा चेति ॥ १५ ॥ 'तद्विद्य-संभाषण' अर्थात् उस विद्या के वेत्ता पुरुष से भाषण दो प्रकार का है । ( १ ) संधाय संभाषा—संधि अर्थात् परस्पर मेल करके प्रेमपूर्वक संभाषण करना, अनुलोम संभाषण है । ( २ ) विगृह्य संभाषा—विग्रह करके, दूसरे को पराजित करने के अभिप्राय से संभाषण करना प्रतिलोम-संभा- षण है ॥ १५ ॥ तत्र ज्ञान-विज्ञान-वचन-प्रतिवचन-शक्ति-संपन्नेनाकोपनेनोपस्कृतवि- द्येनानसूयकेनानुनेयेनानुनेयकोविदेन क्लेशक्षमेण प्रियसम्भाषणेन च सह संधाय संभाषा विधीयते । तथाविधेन सह कथयन्विस्त्रब्धः कथयेत्, पृच्छेद्धि च विस्रब्धः, पृच्छते चास्मै विस्रब्धाय विशदमर्थं ब्रूयात्, न च निग्रहभयादुद्विजेत, निगृह्य चैनं न हृष्येन्न च परेषु विकत्थेत्, नच मोहादेकान्तग्राही स्यात्, न चाविदितमर्थं तमनुवर्णयेत्; सम्यक् चानुन- येनानु नयेच्च, अनुनये तत्र चावहितः स्यादित्यनुलोमसंभाषा- विधिः ॥ १६ ॥ अनुलोम संभाषण की विधि— ज्ञान ( शास्त्रज्ञान ), विज्ञान, वचन ( पूर्व- पक्ष ), प्रतिवचन ( उत्तरपक्ष ) कहने में समर्थ, क्रोध से रहित, अविकृत विद्या वाले, अनिन्दक, अनुनय के योग्य, अनुनय को जानने वाले, क्लेशसहिष्णु, प्रिय बोलने वाले पुरुष के साथ सन्धि करके संभाषण करते हुए विश्वासपूर्वक ( बिना संकोच या भय के ) बातचीत करे और जो कुछ पूछना हो वह विश्वा- सपूर्वक पूछे । इस प्रकार के पुरुष के आगे पराजय के भय से न घबराए और
अ० ८ ] विमानस्थानम् ५६५
अ० ८ ] विमानस्थानम् ५६५ स्वयं भी प्रतिवादी का पराजय करके प्रसन्न न हो। दूसरों के आगे अपनी डींग न करे, अपनी प्रशंसा नहीं करे। मोहवश केवल लेने वाला ही न बने। न जाने हुए विषय का वर्णन नहीं करे। प्रतिवादी से किये अनुनय के सामने विनीत होवे। दूसरे के अनुनय में सावधान रहे। यह 'अनुलोम-संभाषण विधि' है ॥ १६ ॥ अत ऊर्ध्वमितरेण सह विगृह्य संभाषायां जल्पेत् श्रेयसा योगमा- त्मनः पश्यन्; प्रागेव च जल्पाज्जल्पान्तरं परावरान्तरं परिषद्विशेषांश्च सम्यक्परीक्षेत। सम्यक् परीक्षा हि बुद्धिमतां कार्यप्रवृत्तिनिवृत्तिकालौ शंसति, तस्मात्परीक्षामभिप्रशंसन्ति कुशलाः। परीक्षमाणस्तु खलु परा- वरान्तरमिमाञ्जल्पकगुणान् श्रेयस्करान् दोषवतश्च परीक्षेत सम्यक्। तद्यथा—श्रुतं विज्ञानं धारणं प्रतिभानं वचनशक्तिरित्येतान् गुणान् श्रेयस्करानाहुः। इमान्पुनर्दोषवतः, तद्यथा-कोपस्तमवैशारद्यं भीरु- त्वमधारणत्वमनवहितत्वमिति। एतान्द्वयानपि गुणान् गुरुलाघवतः परस्य चैवाऽऽत्मनश्च तोलयेत् ॥ १७ ॥ विगृह्य-संभाषा—इसके अनन्तर 'विगृह्य संभाषा' का वर्णन करते हैं। पुरुष अपना श्रेय (विद्योत्कर्ष आदि) योग देखता हुआ प्रतिवादी के साथ 'विगृह्य संभाषण' करे। इसमें जल्प (वाद-विवाद) से पूर्व ही जल्प के लक्षण, जल्प के गुण दोष, प्रतिवादी और अपने गुण दोष, और परिषद् के गुण दोषों को भली प्रकार से देख लेवे। क्योंकि भली प्रकार की हुई परीक्षा बुद्धिमानों को कार्य में प्रवृत्त होने और निवृत्त होने का काल बता देती है। इसलिये कुशल लोग परीक्षा की प्रशंसा करते हैं। अपने और प्रतिवादी के गुण-दोषों की परीक्षा करने में, इन श्रेयस्कर और अश्रेयस्कर जल्पगुणों की परीक्षा करनी चाहिये। जैसे—गुरुमुख से शास्त्र का श्रवण, विज्ञान, (अवबोध), धारण (मन से धारण करना), प्रतिभान (प्रतिभा, प्रत्युत्पन्नमति) और बोलने की शक्ति का होना—इन गुणों को श्रेय- स्कर कहते हैं और इन निम्नलिखित गुणों को अश्रेयस्कर अर्थात् दोषयुक्त कहते हैं। जैसे—क्रोध करना, अपाण्डित्य, भीरुता, अन- भ्यास दत्तचित्त न होना, ये दोष हैं। इन दोनों प्रकार के गुणों को अपने में तथा प्रतिवादी में तुलना करके न्यून-अधिक रूप से देखना चाहिये ॥१७॥ तत्र त्रिविधः परः संपद्यते, -प्रवरः प्रत्यवरः समो वा गुणविनिश्चे- पतः, नत्वेव कात्स्न्र्येन ॥ १८ ॥
५६६ चरकसंहिता [अ० ८ इनमें प्रतिवादी तीन प्रकार का होता है—(१) प्रवर (उत्तम), (२) प्रत्यवर (हीन) और (३) सम (समान)। ये भेद श्रुत, विज्ञान आदि गुणों के परिमाण से होते हैं, कुल, शील आदि भेद से नहीं ॥ १८॥ परिषत्तु खलु द्विविधा,-ज्ञानवती, मूढपरिषद्व; सेव द्विविधा सती त्रिविधा पुनरनेन कारणविभागेन-सुहृत्परिषद्, उदासीनपरिषद, प्रति- निविष्टपरिषद्चेति ॥ १६ ॥ परिषद् अर्थात् सभा दो प्रकार की होती है, ज्ञानवती और मूढ। यही दो प्रकार की परिषद् शत्रु, मित्र और उदासीन कारण से तीन प्रकार की हो जाती है। (१) सुहृत्परिषद्, (२) उदासीन-परिषद्, (३) प्रतिकूल-निविष्टपरिषत् (विरोधियों की परिषद्) ॥ १६ ॥ तत्र प्रतिनिविष्टायां परिषदि ज्ञान-विज्ञान-वचन-प्रतिवचन शक्तिसंप- न्नायामपि मूढायां वा न कथंचित्केनचित्सह जल्पो विधीयते, मूढायां तु सुहृत्परिषदि उदासीनायां वा ज्ञान-विज्ञान-वचन-प्रतिवचन-शक्तिमन्त- रेणाप्यदीप्रयशसा महाजनद्विष्टेन सह जल्पो विधीयते, तद्दिष्टेन च सह कथयता आविद्धदीर्घसूत्रसंकुलैर्वाक्यदण्डकैः कथयितव्यं, अतिहृष्टं मुहु- र्मुहुरुपहसता परं, निरूपयता च परिषदमाकारैः, ब्रुवता चास्य वाक्यावका- शो न देयः। कष्टशब्दं च ब्रुवता वक्तव्यो 'नोच्यते' इति, अथवा पुनः 'हीना ते प्रतिज्ञा'इति, पुनश्चाऽऽहूयमानः प्रतिवक्तव्यः-‘परिसंवत्सरो भव, शिक्ष- स्व तावत्, पर्याप्तमेतावत्ते', सकृदपि हि परिक्षेप्तिकं निहतं निहतमाहु- रिति नास्य योगः कर्तव्यः कथंचित्; अप्येवं श्रेयसा सह विगृह्य वक्तव्य- मित्याहुरेके; न त्वेवं ज्यायसा सह विग्रहं प्रशंसन्ति कुशलाः ॥ २० ॥ इनमें से शत्रु-परिषद् अथवा मूढ़-परिषत् में ज्ञान-विज्ञान, वचन-प्रतिवचन की शक्ति होने पर भी किसी उत्तम, हीन वा समान व्यक्ति के साथ किसी भी प्रकार से जल्प (विवाद) नहीं करना चाहिये। मूढ़परिषद् में, वा मित्रपरि- षद् में, या उदासीन-परिषद् में ज्ञान-विज्ञान और वचन-प्रतिवचन शक्ति के बिना भी, प्रज्वलित कीर्ति से रहित और अनेक जनों के द्वेषपात्र (जिसका पक्ष कोई नहीं करे) ऐसे पुरुष के साथ जल्प किया जा सकता है। इस प्रकार के पुरुष के साथ संभाषण करते हुए, टेढ़ेमेढ़े लम्बे सूत्रों से युक्त लम्बे २ वाक्यों से भाषण करना चाहिये। खूब प्रसन्न होते हुए, प्रतिवादी की बार-बार हंसी करते हुए, आकार-चेष्टा आदि से परिषद् का ध्यान खींचते हुए और बोलने को उद्यत हुए प्रतिवादी को बोलने का अवसर नहीं देना चाहिये। दुर्बोध अर्थ या
अ० ८ ] विमानस्थानम् ५६७
अ० ८ ] विमानस्थानम् ५६७ वाक्य को कहते हुए उससे बोलने के लिये कहना चाहिये कि 'नहीं कहते अथवा तेरी प्रतिज्ञा हीन है।' और यदि वह फिर वाद-विवाद के लिये बुलावे तो उसको कहना चाहिये कि—"एक साल और अधिक गुरु के पास पढ़, तेरे लिये इतना ही पर्याप्त है।" एक बार पराजित हुए प्रतिवादी को पराजित ही कहते हैं। अतः फिर इसके पक्ष का ग्रहण नहीं करना चाहिये । एक बार प्रति- पक्षी को पराजित करके पुनः उसे अवसर नहीं देना चाहिये । कुछ आचार्यों का मत है कि इस प्रकार अपने से श्रेष्ठ से भी प्रतिलोम जल्प कर लेना चाहिये परन्तु बुद्धिमान् मनुष्य अपने से श्रेष्ठ के साथ प्रतिलोम (विगृह्य) संभाषण की इच्छा नहीं करते ॥ २० ॥ प्रत्यवरेण तु सह समानाभिभतेन वा विगृह्य जल्पतः सुहृत्परिषदि कथयितव्यं, अथवाऽप्युदासीनपर्षदि अवधान-श्रवण ज्ञान-विज्ञानापधा- रण-वचन-शक्ति-संपन्नायां कथयता चावहितेन परस्य साद्गुण्यदोषबलम- वेक्षितव्यं; संवेक्ष्य च यत्रेमं श्रेष्ठं मन्येत, नास्य तत्र जल्पं योजयेदना- विष्कृतमयोगं कुर्वन्; यत्र त्वेनमवरं मन्येत तत्रैवेनमाशु निगृह्णीयात् । अपने से हीन या अपने समान प्रतिवादी के साथ सुहृत्परिषद्, उदासीन परिषद् या मूढ़ परिषद् में विगृह्य संभाषण करना चाहिये । अथवा उदासीन परिषद् में अवधान, श्रवण, ज्ञान, विज्ञान, उच्चारण, वचन, प्रतिवचन शक्ति, आदि गुणों तथा क्रोध आदि दोषों की अपने में और दूसरे में तुलना करके सावधानी से संभाषण करना चाहिये और परीक्षा करके जिस बात में प्रतिवादी को अपने से श्रेष्ठ समझे, उस विषय में अपनी अयोग्यता को प्रकट न करते हुए जल्प का प्रयोग नहीं करना चाहिये और जिस विषय में प्रतिवादी को अपने से हीन समझे, उसमें इसको शीघ्रता से पकड़ लेना चाहिये । तत्र खल्विमे प्रत्यवराणामाशु निग्रहे भवन्त्युपायाः; तद्यथा—श्रुत- हीनं महता सूत्रपाठेनाभिभवेत्, विज्ञानहीनं पुनः कष्टशब्देन वाक्येन, वाक्यधारणाहीनमाविद्धदीर्घसूत्रसंकुलैर्वाक्यदण्डकैः, प्रतिभाहीनं पुन- र्वचनेनैकविधेनानेकार्थवाचिना, वचनशक्तिहीनमर्धोक्तस्य वाक्यस्याऽऽ- क्षेपेण, अविशारदमपह्नपेण, कोपनमायासेनेन, भीरुं वित्रासनेन, अन- वहितं नियमेन । इत्येवमेतैरुपायैः परमवरमभिभवेत् ॥ २१ ॥ प्रतिवादी को शीघ्र निग्रह करने के लिये निम्न उपाय हैं। जैसे—जिसने शास्त्र न पढ़ा हो उसको बड़े लम्बे २ सूत्र सुना कर पराजित करे । विशेष ज्ञान से हीन अतिदुर्बोध अर्थ वाले, क्लिष्ट शब्दों से बने वाक्यों का प्रयोग करे ।
५६८ चरकसंहिता [अ० ८ अनभ्यस्त शास्त्र वाले या अल्पबुद्धि के लिये वक्र, लम्बे २ सूत्रों से बने वाक्यों का प्रयोग करे। प्रतिभा से हीन के लिये अनेकार्थवाची, अनेक प्रकार के वचनों का प्रयोग करे। वचन-शक्ति से हीन को आधे ही वाक्य पर टोक दे। अपण्डित या अचतुर को (जिसने कभी पहिले सभा नहीं देखी हो) लज्जाजनक वाक्यों से पराजित करना चाहिये, क्रोधी व्यक्ति को तंग करके, डरपोक को भय दिखला कर, जो सावधान न हो उसको मन के नियमन करने वाले वचनों से पराजित करे। इन नाना उपायों द्वारा प्रतिवादी का शीघ्र पराजय करे ॥२१॥ तत्र श्लोकौ—विगृह्य कथयेद्युक्त्या युक्तं च न निवारयेत् । विगृह्यभाषा तीव्रं हि केषांचिद् द्रोहमावहेत् ॥ २२ ॥ नाकार्यमस्ति क्रुद्धस्य नावाच्यमपि विद्यते। कुशला नाभिनन्दन्ति कलहं सहिताः सताम् ॥ २३ ॥ एवं प्रवृत्ते वादे कुर्यात् ॥ २४ ॥ प्रतिलोम संभाषण करने का प्रकार—दूसरे के साथ विगृह्य-संभाषण करते हुए युक्तिपूर्वक भाषण करे। युक्ति प्रमाणानुकूल दूसरे के वचन का निषेध नहीं करे। जल्प कई पुरुषों में तीव्र क्रोध उत्पन्न कर देता है। क्रुद्ध व्यक्ति के लिये कुछ भी अकार्य नहीं होता, वह कुछ भी कर सकता है। उसके लिये कुछ भी अवाच्य नहीं, वह सब कुछ बुरा-भला भी कह सकता है। इसलिये बुद्धिमान् पुरुष सज्जनों की सभा में कलह को अच्छा नहीं समझते। वाद चलने पर इस प्रकार करे ॥ २२-२४ ॥ प्रागेव तावदिदं कर्तुं यतेत—संधाय परिषदाऽयनभूतमात्मनः प्रक- रणमादेशयितव्यं यद्वा परस्य भृशदुर्गं स्यात्, पक्षमथवा परस्य भृशं विमुखमानयेत् परिषदि, परिषदि चोपसंहितायामशक्यमस्माभिर्वक्तुम्, एषैव ते परिषदयथेष्टं यथायोगं यथाभिप्रायं वादं वादमर्यादां च स्थाप- यिष्यतीत्युक्त्वा तूष्णीमासीत ॥ २५ ॥ वाद प्रारम्भ होने से पूर्व निम्न बातें करने का यत्न करे। यथा—परिषद् (सभ्यों) से मिलकर अपने अभ्यास किये हुए प्रकरण या विषय का निर्देश करे। अथवा जो प्रकरण वा विषय दूसरे को बहुत दुर्बोध हो उसे कहे अथवा दूसरे का पक्ष जो बहुत अधिक झगड़ा उत्पन्न करने वाला हो, वहां पर सभ्यों के बीच कहे। यदि परिषद् अपने विरोध में जान पड़े तो कहे कि—'इस परि- षद् को तो तुमने पहिले ही मिलकर अपने पक्ष में कर लिया है, इसलिये हमारा बोलना असम्भव है। यह तो तुम्हारी घर की ही सभा है। जैसा चाहोगे, जैसा
अ० ८ ] विमानस्थानम् ५६६
अ० ८ ] विमानस्थानम् ५६६ बने, जैसा अभिप्राय हो, वह वैसा वाद, और वैसी वाद-मर्यादा को स्थापित करेगी,—ऐसा कह कर चुप हो जाये ॥ २५ ॥ तत्रे॒दं वादमर्यादालक्षणं भवति—इदं भवति वाच्यमिदमवाच्य- मेवं सति पराजितो भवतीति ॥ २६ ॥ वाद की मर्यादा—यह कहना, यह नहीं कहना, इस प्रकार से पराजय होता है, यह तीन वाद-मर्यादा के लक्षण कहाते हैं ॥२६॥ इमानि तु खलु पदानि वादमार्गज्ञानार्थमधिगम्यानि भवन्ति । तद्यथा—वादः, द्रव्यं, गुणाः, कर्म, सामान्यं, विशेषः, समवायः, प्रतिज्ञा, स्थापना, प्रतिष्ठापना, हेतुः, दृष्टान्तः, निगमनं, उत्तरं, सिद्धान्तः, उपनयः, शब्दः, प्रत्यक्षं, अनुमानमैतिह्यमौपम्यं, संशयः, प्रयोजनं, सव्यभिचारं, जिज्ञासा, व्यवसायः, अर्थप्राप्तिः, संभवः, अनुयोज्यं, अननुयोज्यं, अनुयोगः, प्रत्यनुयोगः, वाक्यदोषः, वाक्यप्रशंसा, छलम्हेतुरतीतकालमुपालम्भः, परिहारः, प्रतिज्ञाहानिरभ्यनुज्ञा, हेत्वन्तरमर्थान्तरं, निग्रहस्थानमिति ॥ २७ ॥ वाद के मार्ग को समझने के लिये वैद्यों को निम्न चवालीस बातें समझ लेनी चाहियें । यथा—वाद, द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय, प्रतिज्ञा, स्थापना, प्रतिष्ठापना, हेतु, दृष्टान्त, उपनय, निगमन, उत्तर, सिद्धान्त, शब्द, प्रत्यक्ष, अनुमान, ऐतिह्य, औपम्य, संशय, प्रयोजन, सव्यभिचार, जिज्ञासा, व्यवसाय, अर्थप्राप्ति, संभव, अनुयोज्य, अननुयोज्य, अनुयोग, प्रत्य- नुयोग, वाक्यदोष, वाक्यप्रशंसा, छल, हेतु, अतीतकाल, उपालम्भ, परिहार, प्रतिज्ञाहानि, अभ्यनुज्ञा, हेत्वन्तर, अर्थान्तर और निग्रहस्थान ॥ २७ ॥ तत्र वादो नाम—यत् परः परेण सह शास्त्रपूर्वकं विगृह्य कथयति । स वादो द्विविधः संग्रहेण—जल्पो वितण्डा च । तत्र पक्षाश्रितयोर्वचनं जल्पः, विपर्ययो वितण्डा । यथा—एकस्य पक्षः—पुनर्भवोऽस्तीति, नास्तीत्यपरस्य । तौ च हेतुभिः स्वस्वपक्षं स्थापयतः, परपक्षमुद्भावयतः, एष जल्पः । जल्पविपर्ययो वितण्डा, वितण्डा नाम—परपक्षे दोष- वचनमात्रमेव ॥ २८ ॥ वाद का लक्षण—शास्त्र के अनुसार जो परस्पर विगृह्य भाषण है वह वाद ॐ कहाता है । यह संक्षेप से दो प्रकार का है । जल्प और वितण्डा । इनमें ॐ वाद का लक्षण—'प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भः सिद्धान्ताविरुद्धः पञ्चा- वयवोपपन्नः पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहो वादः । न्यायदर्शन १ । २ । ४२ ।
५७० चरकसंहिता [ अ० ८ पक्ष और प्रतिपक्ष का आश्रय करके जो वाद किया जाता है, उसका नाम ‘जल्प’ है। इससे विपरीत ‘वितण्डा’ है। जैसे एक व्यक्ति का पक्ष है कि पुनर्जन्म होता है, और दूसरे का पक्ष है कि पुनर्जन्म नहीं होता है। ये दोनों नाना हेतुओं से अपने अपने पक्ष की स्थापना करते हैं और प्रतिबाधक प्रमाणों से दूसरे के पक्ष का निराकरण करते हैं। इसका नाम ‘जल्प’ है। जल्प से विपरीत वितण्डा है, परपक्ष में केवल दोष दिखाना ‘वितण्डा’ होता है † ॥२८॥ द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायाः स्वलक्षणैः श्लोकस्थाने पूर्वमुक्ताः ॥ २६ ॥ द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय इनमें से प्रत्येक का लक्षण सूत्रस्थान में कह आये हैं ॥ २६ ॥ अथ प्रतिज्ञा । प्रतिज्ञा नाम साध्यवचनम् । यथा नित्यः पुरुष इति ॥ ३० ॥ प्रतिज्ञा—साध्य वचन का नाम ‘प्रतिज्ञा’ ✤ है। जैसे पुरुष नित्य है ॥३०॥ अथ स्थापना । स्थापना नाम तस्या एव प्रतिज्ञाया हेतुदृष्टान्तो- पनयनिगमनैः स्थापना । पूर्वं हि प्रतिज्ञा पश्चात्स्थापना, किं ह्यप्रतिज्ञातं स्थापयिष्यति । यथा नित्यः पुरुष इति प्रतिज्ञा । हेतुः—अकृतकत्वा- दिति । दृष्टान्तः-अकृतकमाकाशं तच्च नित्यम् । उपनयो यथा-चाकृत- कमाकाशं तथा पुरुषः । निगमनं-तस्मान्नित्य इति ॥ ३१ ॥ स्थापना—इसी प्रतिज्ञा के हेतु, दृष्टान्त, उपनय, और निगमन द्वारा सिद्ध करने का नाम ‘स्थापना’ है। प्रथम प्रतिज्ञा होती है, फिर उसकी स्थापना की जाती है। बिना प्रतिज्ञा के किस वस्तु को स्थापना करेगा। जैसे पुरुष नित्य है यह प्रतिज्ञा है। इसमें हेतु—उत्पत्ति न होने से। दृष्टान्त-आकाश, जिसे किसीने उत्पन्न नहीं किया और वह नित्य है। उपनय—जिस प्रकार अनुत्पन्न आकाश है इसी प्रकार पुरुष है। निगमन-इसलिये पुरुष भी नित्य है ॥३१॥ अथ प्रतिष्ठापना—प्रतिष्ठापना नाम या परप्रतिज्ञाया विपरीतार्थ- स्थापना, यथा—अनित्यः पुरुष इति प्रतिज्ञा । हेतुः-ऐन्द्रियकत्वात्, दृष्टान्तः—घट ऐन्द्रियकः, स चानित्यः, उपनयो-यथा घटस्तथा पुरुषः । निगमनं—तस्मादनित्य इति ॥ ३२ ॥ † ‘यथोक्तोपपन्नश्छलजातिनिग्रहस्थानसाधनोपालम्भो जल्पः । स प्रतिपक्ष- स्थापनाहीनो वितण्डा । न्याय द० १ । २ । ४१ । ४४ । ✤ साध्यस्य वचनं प्रतिज्ञा । न्याय द० १ । १ । ३२ ।
अ० ८ ] विमानस्थानम् ५७१
अ० ८ ] विमानस्थानम् ५७१ प्रतिष्ठापना--दूसरे वादी की प्रतिज्ञा के विपरीत अर्थ की स्थापना करना प्रतिष्ठापना कहलाता है । पुरुष अनित्य है, यह विपरीतार्थ प्रतिज्ञा है । इसमें हेतु—इन्द्रियग्राह्य होने से । दृष्टान्त—घड़ा इन्द्रियग्राह्य है, वह अनित्य है । उपनय-जिस प्रकार घड़ा है उसी प्रकार पुरुष भी अनित्य है । निगमन—इस- लिये पुरुष अनित्य है ॥ ३२ ॥ अथ हेतुः—हेतुर्नामोपलब्धिकारणं, तत्प्रत्यक्षमनुमानमैतिह्यमौपम्य- मिति । एभिर्हेतुभिर्यदुपलभ्यते, तत्तत्त्वम् ॥ ३३ ॥ हेतु-साध्य के उपलब्धि अर्थात् ज्ञान का कारण हेतु है ☸ । प्रत्यक्ष, अनु- मान, ऐतिह्य और उपमान ये भी उपलब्धि ( ज्ञान ) के साधन हैं । इन हेतुओं ( प्रमाणों ) से जो ज्ञान उपलब्ध होता है, वह तत्त्व अर्थात् ज्ञान है ॥ ३३ ॥ उपनयो निगमनं चोक्तं स्थापनाप्रतिष्ठापनाव्याख्यायाम् ॥ ३४ ॥ उपनय और निगमन को स्थापना और प्रतिष्ठापना की व्याख्या में कह दिया है ॥ ३४ ॥ अथोत्तरं—उत्तरं नाम साधर्म्योपदिष्टे वा हेतौ वैधर्म्यवचनं,वैधर्म्यो- पदिष्टे वा साधर्म्यवचनं । यथा-हेतुसधर्माणो विकाराः, शीतकस्य हि व्याधे- र्हेतुसाधर्म्यवचनं-हिमशिशिरवातसंस्पर्शा इति ब्रुवतः परो ब्रूयात्-हेतु- विधर्माणो विकाराः, यथा शरीरावयवानां दाहोष्ण्यकोथप्रपचने हेतु- वैधर्म्यं हिमशिशिरवातसंस्पर्शो इति; एतत्सविपर्ययमुत्त रम् ॥ ३५ ॥ उत्तर—हेतु में साधर्म्य दिखाने पर वैधर्म्य दिखाना अथवा हेतु में वैधर्म्य दिखाने पर साधर्म्य दिखाना 'उत्तर' है । कोई कहे—विकार ( रोग ) हेतु ( कारण ) के समान धर्म ( तुल्य धर्म ) वाले होते हैं । यथा शीतजन्य रोगों में कारण के तुल्य धर्म हेमन्त शिशिर की वायु का शीत संस्पर्श हो इस पर प्रतिपक्षी कहे कि रोग हेतु के विरुद्धधर्म ( अतुल्य धर्म ) वाले होते हैं । जैसे-शरीरावयवों के जलने में, गरम होने में, सड़ने में, पकने में हेतु ( कारण ) से असमान धर्म वाले हेमन्त, शिशिर की वायु का स्पर्श है । यह विपरीत उत्तर है ॥ ३५ ॥ अथ दृष्टान्तः—दृष्टान्तो नाम यत्र मूर्खविदुषां बुद्धिसाम्यं, यो वर्ण्यं ☸ 'उदाहरणसाधर्म्यात् साध्यसाधनं हेतुः । तथा वैधर्म्यात् । न्याय० १। १ । ३४-३५ ।
५७२ चरकसंहिता [अ० ८ वर्णयति, यथा-अग्निरुष्णो द्रवमुदकं स्थिरा पृथिवी आदित्यः प्रकाशक इति, यथा वाऽऽदित्यः प्रकाशकस्तथा सांख्यवचनं प्रकाशकमिति ॥३६॥ दृष्टान्त—जिसमें विद्वान् अविद्वान् दोनों की बुद्धि समान हो, उसका नाम दृष्टान्त है ॐ । जिस वस्तु का वर्णन करना होता है, उसका उसी प्रकार की वस्तु से वर्णन करते हैं । यथा-अग्नि उष्ण है, जल द्रव है, पृथिवी स्थिर है, सूर्य प्रकाशक है, इन बातों को मूर्ख भी उसी प्रकार समझता है, जिस प्रकार एक विद्वान् समझता है । जिस प्रकार सूर्य प्रकाशक है, उसी प्रकार सांख्य ज्ञान भी प्रकाशक है । यहां पर सांख्य ज्ञान साध्य 'वर्ण्य' है । इसको आदित्य के दृष्टान्त से सिद्ध करते हैं ॥३६॥ अथ सिद्धान्तः—सिद्धान्तो नाम यः परीक्षकैर्बहुविधं परीक्ष्य हे- तुभिः साधयित्वा स्थाप्यते निर्णयः स सिद्धान्तः, स चोक्तश्चतुर्विधः,— सर्वतन्त्रसिद्धान्तः, प्रतितन्त्रसिद्धान्तः, अधिकरणसिद्धान्तोऽभ्युपगम- सिद्धान्त इति । सिद्धान्त—जिस को परीक्षकों ने बहुत प्रकार से परीक्षा कर हेतुओं द्वारा सिद्ध कर निर्णय रूप से स्थापित कर दिया है वह निर्णय 'सिद्धान्त' है। यह सिद्धान्त चार प्रकार का है । (१) सर्वतन्त्र सिद्धान्त, (२) प्रतितंत्र सिद्धान्त, (३) अधिकरण सिद्धान्त और (४) अभ्युपगम सिद्धान्त । तत्र सर्वतन्त्रसिद्धान्तो नाम—सर्वतन्त्रेषु यत्प्रसिद्धम् । सन्ति व्याधयः सन्ति सिद्धयुपायाः साध्यानामिति । (१) सर्वतन्त्र सिद्धान्त—सब तंत्रों (शास्त्रों) में (उस सम्बन्ध के) जो सिद्धान्त प्रसिद्ध हों, उनका नाम सर्वतंत्र सिद्धान्त है। यथा—निदान हैं, साध्य रोग हैं, रोगों को दूर करने के भी उपाय हैं, ये बातें सब तंत्रों में प्रसिद्ध हैं । प्रतितन्त्रसिद्धान्तो नाम तस्मिंस्तस्मिंस्तन्त्रे तत्तत्प्रसिद्धं, यथा— अन्यत्राष्टौ रसाः षडत्र, पञ्चेन्द्रियाणि यथाऽन्यत्रान्यत्र षडिन्द्रियाणि । वातादिकृताः सर्वविकारा यथाऽन्यत्र वातादिकृता भूतकृताश्च प्रसिद्धाः। (२) प्रतितंत्र सिद्धान्त—उसी विशेष तंत्र में जो तत्त्व प्रसिद्ध हों और तंत्रों में अप्रसिद्ध हों, उसका नाम प्रतितंत्र सिद्धान्त है। यथा—एक तंत्र में रस आठ प्रकार के हैं, और इस तंत्र में रस छः प्रकार के हैं। एक तंत्र में पांच इन्द्रियां हैं, अन्य तंत्र में छः इन्द्रियां मानी हैं (मन को भी इन्द्रिय गिनते हैं) अन्य तंत्रों में सब रोग बात आदि दोषजन्य ही माने गये हैं। एक तंत्र में रोगों ॐ लौकिकपरीक्षकाणां यस्मिन्नर्थे बुद्धिसाम्यं सद्दृष्टान्तः ॥ न्याय० १। १। २५॥
अ० ८ ] विमानस्थानम् ५७३
अ० ८ ] विमानस्थानम् ५७३
का कारण वात आदि दोष तथा पंच महाभूत व सूक्ष्म कीट-प्राणियों को भी माना है। अधिकरणसिद्धान्तो नाम यस्मिन् यस्मिन्नधिकरणे संस्तूयमाने सिद्धान्यन्यान्यधिकरणानि भवन्ति, यथा-न मुक्तः कर्मानुबन्धिकं कुरुते; निस्पृहत्वादिति प्रस्तुते सिद्धाः कर्मफलमोक्षपुरुषप्रेत्यभावा भवन्ति । (३) अधिकरण सिद्धान्त—जिस जिस अधिकरण के उपस्थित करने पर अन्य न कहे हुए अधिकरण भी अपने आप सिद्ध हो जाते हैं, उसका नाम अधिकरण सिद्धान्त है । यथा—मुक्त पुरुष निःस्पृह होने से फलजनक कर्म नहीं कर सकता । इस अवस्था में कर्मफल, मोक्ष, पुरुष और प्रेत्यभाव से प्रक- रण भी स्वयं सिद्ध होते हैं । क्योंकि यदि कर्मफल न हो तो मुमुक्षु भी कर्म करें। कर्मफल से उद्विग्न होकर ही वे कर्म नहीं करते । यदि मोक्ष हो तो मुक्त ऐसा नाम हो । यदि पुरुष न हो तो बन्ध और मोक्ष किसका । अभ्युपगमसिद्धान्तो नाम—यमर्थमसिद्धमपरीक्षितमनुपदिष्टमहे- तुकं वा वादकालेऽभ्युपगच्छन्ति भिषजः। तद्यथा—द्रव्यं न प्रधानमिति कृत्वा वक्ष्यामः, गुणाः प्रधाना इति कृत्वा वक्ष्यामः, इत्येवमादिश्च- तुर्विधः सिद्धान्तः ॥ ३७ ॥ (४) अभ्युपगम सिद्धान्त—जिसको बिना सिद्ध किये, बिना परीक्षा किये और बिना हेतु आदि बतलाये ही विवादकाल में वैद्य लोग स्वीकार कर लेते हैं, वह अभ्युपगम सिद्धान्त है । यथा—द्रव्य को प्रधान न मानकर सिद्धान्त रूप से स्वीकार करके आगे विवाद करें । इसी प्रकार गुण को प्रधान मान कर, कर्म को प्रधान मानकर वाद आरम्भ करे । ये चारों प्रकार के सिद्धान्त कह दिये हैं ।३७। अथ शब्दः—शब्दो नाम वर्णसमाम्नायः, स चतुर्विधः-दृष्टार्थश्चा- दृष्टार्थश्च सत्यश्चानृतश्चेति । शब्द—वर्णों के समाम्नाय (समूह) का नाम शब्द है । यह चार प्रकार का है । यथा (१) दृष्टार्थ, (२) अदृष्टार्थ (३) सत्य और (४) अनृत । तत्र दृष्टार्थः—त्रिभिर्हेतुभिर्दोषाः प्रकुप्यन्ति षड्भिरुपक्रमैश्च प्रशा- म्यन्ति, श्रोत्रादिसद्भावे शब्दादिग्रहणमिति । ( १ ) दृष्टार्थ—तीन कारणों (असात्म्येन्द्रियार्थसंयोग, प्रज्ञापराध और परि- णाम ) से वात आदि दोष कुपित होते हैं । वे छः उपक्रमों ( बृंहण, लंघन, स्नेहन, रूक्षण, स्वेदन और स्तम्भन ) से शान्त होते हैं । श्रोत्र आदि इन्द्रियों
के होने पर शब्द आदि विषयों का ग्रहण होता है । इन वाक्यों का अर्थ यहां प्रत्यक्ष होता है, देखा जाता है । स दृष्टार्थः पुनः—अस्ति प्रेत्यभावोऽस्ति मोक्ष इति । ( २ ) अदृष्टार्थ—जैसे प्रेत्यभाव अर्थात् ( पुनर्जन्म ) है और मोक्ष है, यह अदृष्ट अर्थ है । सत्यो नाम यथार्थभूतः—सन्त्यायुर्वेदोपदेशाः, सन्त्युपायाः साध्या- नां, सन्त्यारम्भफलानीति, सत्यविपर्ययाच्चानृतः ॥ ३८ ॥ सत्य—यथार्थ जैसा हो वैसा कहना सत्य है । यथा आयुर्वेद का उपदेश है, साध्य रोगों की चिकित्सा के उपाय हैं। आरम्भ फल अर्थात् कर्मों के फल होते हैं। सत्य से विपरीत अनृत ( मिथ्या ) है ॥ ३८ ॥ अथ प्रत्यक्षं—प्रत्यक्षं नाम तद्यदात्मना पञ्चेन्द्रियैश्च स्वयमुपल- भ्यते । तत्राऽऽत्मप्रत्यक्षाः सुखदुःखेच्छाद्वेषादयः, शब्दादयस्त्विन्द्रिय- प्रत्यक्षाः ॥ ३६ ॥ प्रत्यक्ष—आत्मा और इन्द्रियों द्वारा जो ज्ञान स्वयं प्राप्त किया जाता है, उसका नाम प्रत्यक्ष¹ है, इनसे सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष आदि आत्मा द्वारा प्रत्यक्ष होते हैं, शब्द आदि विषय श्रोत्र आदि इन्द्रियों द्वारा प्रत्यक्ष होते हैं॥३६॥ अथानुमानं—अनुमानं नाम तर्को युक्त्यपेक्षः । यथोक्तम्—अग्निं जरणशक्त्या, बलं व्यायामशक्त्या, श्रोत्रादीनि शब्दादिग्रहणेनेत्ये- वमादि ॥ ४० ॥ अनुमान—युक्ति की अपेक्षा करने वाला तर्क अनुमान है । कार्यकारण भाव के ज्ञान से अविज्ञात अर्थ को जानना तर्क है । यथा—जीर्ण करने की शक्ति से अग्नि का, व्यायाम शक्ति से बल का, शब्दादि के ग्रहण करने से श्रोत्रादि इन्द्रियों का अनुमान किया जाता है ॥ ४० ॥ अथैतिह्यं—ऐतिह्यं नामाऽऽप्तोपदेशो वेदादिः ॥ ४१ ॥ ऐतिह्य—ऐसा वृद्ध पुरुषों ने कहा था यह 'ऐतिह्य' है। आप्त-वचन का नाम ऐतिह्य है। यथा आप्त-वचन वेद आदि ॥ ४१ ॥ अथौपम्यं—औपम्यं नाम यदन्येनान्यस्य सादृश्यमधिकृत्य प्रका- शनं, यथा—दण्डेन दण्डकस्य, धनुषा धनुष्टम्भस्य, इष्वासिना आ- रोग्यदस्येति ॥ ४२ ॥
१ इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमव्यपदेश्यमव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्य- क्षम् । न्याय० १ । १ । ४ ।
अध्याय १० में) ॥ ४२ ॥
औपम्य ( उपमा ) — सादृश्य को देखकर एक प्रसिद्ध वस्तु का प्रकाशन करना 'उपमा' है। जैसे दण्डे से दण्डक नाम (वातव्याधि) रोग बतलाया है। धनुष द्वारा धनुस्तम्भ (जिसमें धनुष के समान शरीर मुड़ जाता है, ऐसा धनुर्वात रोग बतलाया है) और धानुष्क (तीर चलाने वाले) का उदाहरण देकर आरोग्यता देने वाले वैद्य का प्रयोजन बतलाया है (खुड्डाक चतुष्पाद अध्याय १० में) ॥ ४२ ॥ अथ संशयः — संशयो नाम संदेह लक्षणानुसंदिग्धेष्वर्थेष्वनिश्चयः । यथा-दृष्टा ह्यायुष्यलक्षणोपेताश्चानुपैताश्च तथा सक्रियाश्चाक्रियाश्च पुरुषाः शीघ्रभङ्गाश्चिरजीविनश्च, एतदुभयदृष्टत्वात्संशयः-किन्नु खल्व- कालमृत्युरस्त्युत नास्तीति ॥ ४३ ॥ संशय - संदिग्ध अर्थों में निश्चय का न होना संशय' है। जैसे क्या अकाल मृत्यु है, अथवा नहीं है ! आयुष्मान् पुरुषों के लक्षणों से युक्त एवं इन लक्षणों से रहित किंवा चिकित्सा क्रिया के बिना और चिकित्सा करने पर भी शीघ्र मरने वाले तथा देर तक जीने वाले दोनो प्रकार के पुरुष देखे जाते हैं। दोनों प्रकार की अवस्थाओं के देखने से संशय होता है कि क्या अकाल मृत्यु है, अथवा नहीं है ॥४३॥ अथ प्रयोजनं — प्रयोजनं नाम यदर्थमारभ्यन्त आरम्भाः । यथा- यद्यकालमृत्युरस्ति ततोऽहमात्मानमायुष्यैरुपचरिष्याम्यनायुष्याणि च परिहरिष्यामि, कथं मामकालमृत्युः प्रसहेतेति ॥४४॥ प्रयोजन -- जिसके लिये कर्मों का आरम्भ किया जाता है वह 'प्रयोजन' है। जैसे यदि अकाल मृत्यु है, तो मैं आयु के लिये हितकारी पथ्यों द्वारा अपने शरीर की रक्षा करूंगा। आयु का नाश करने वाली अपथ्य वस्तु का परित्याग करूंगा। फिर किस प्रकार से मुझपर अकाल मृत्यु आक्रमण कर सकती है?॥४४॥ अथ सव्यभिचारं - सव्यभिचारं नाम यद्व्यभिचरणं; यथा- भवेदिदमौषधं तस्मिन् व्याधौ यौगिकमथवा नेति ॥४५॥ सव्यभिचार - व्यभिचार एकत्र अव्यवस्था, अनिश्चितता, अनेकों में प्रवृत्त होना ही सव्यभिचार है। यथा - इस रोग में इस औषध का यौगिक १ समानानेकधर्मोपपत्तेः विप्रतिपत्तेरुपलब्ध्यनुपलब्ध्यव्यवस्थातश्च विशेषा- पेक्षो विमर्शः संशयः ॥ न्याय० १ । १ । ४१ ॥
५७६ चरकसंहिता [ अ० ८ अर्थात् योग के अनुकूल होना वा विपरीत भी होना सम्भव है, इस प्रकार एकान्त निश्चय न होना 'सव्यभिचार'* है ॥ ४५ ॥ अथ जिज्ञासा—जिज्ञासा नाम परीक्षा; यथा भेषजपरीक्षोत्तर- कालमुपदेक्ष्यते ॥ ४६ ॥ जिज्ञासा—प्रमाणों द्वारा अर्थ की परीक्षा करना 'जिज्ञासा' है। यथा भेषज परीक्षा जो आगे कहेंगे ॥ ४६ ॥ अथ व्यवसायः—व्यवसायो नाम निश्चयः, यथा वातिक एवायं व्याधिः, इदमेवास्य भेषजमिति ॥ ४७ ॥ व्यवसाय—निश्चय का नाम 'व्यवसाय' है। यथा—यह रोग वातजन्य ही है, और इस रोग की यही औषध है ॥ ४७ ॥ अथार्थप्राप्तिः-अर्थप्राप्तिर्नाम यत्रैकेनार्थेनोक्तेनापरस्यार्थस्यानुक्तस्य सिद्धिः; यथा-नायं संतर्पणसाध्यो व्याधिरित्युक्ते भवत्यर्थप्राप्तिः—अप- तर्पणसाध्योऽयमिति, नानेन दिवा भोक्तव्यमित्युक्ते भवत्यर्थप्राप्तिः— निशि भोक्तव्यमिति ॥ ४८ ॥ अर्थप्राप्ति—एक कहे हुए अर्थ से दूसरे न कहे हुए अर्थ का जिससे ज्ञान होजाय उसका नाम अर्थप्राप्ति है। यथा यह रोग संतर्पणसाध्य नहीं है, यह कहने पर पता लग जाता है कि यह रोग अपतर्पण साध्य है। इसको दिन में भोजन नहीं देना चाहिये, ऐसा कहने पर ज्ञात हो जाता है कि रात्रि में भोजन देना चाहिये ॥ ४८ ॥ अथ संभवः—संभवो नाम यो यतः संभवति स तस्य संभवः; यथा-षड् धातवो गर्भस्य, व्याधेरहितं हितमारोग्यस्येति ॥ ४९ ॥ संभव—जो जिससे उत्पन्न होता है, वह उसका संभव अर्थात् कारण है। जैसे छः धातु (पृथिवी, अप, तेज, वायु, आकाश और चेतना) गर्भ की उत्पत्ति में कारण हैं। इसी प्रकार अहित-सेवन रोगों की उत्पत्ति में, हित-सेवन आरोग्यता की उत्पत्ति में कारण हैं ॥ ४९ ॥ अथानुयोज्यं—अनुयोज्यं नाम यद्वाक्यं वाक्यदोषयुक्तं तदनुयो- ज्यमुच्यते,सामान्येनाहृतेष्वर्थेषु वा विशेषग्रहणार्थं यद्वाक्यं तदनुयोज्यं; ॐ न्यायदर्शन में सव्यभिचार को हेत्वाभास माना है। यह हेतु नहीं, परन्तु हेतु के समान दीखता है। यथा—'सव्यभिचार-विरुद्ध-प्रकरणसम-साध्यस- मातीतकाला हेत्वाभासाः' । न्याय० १ । २ । ४५ ॥
अ० ८ ] ३७ विमानस्थानम् ५७७
अ० ८ ] ३७ विमानस्थानम् ५७७ यथा-संशोधनसाध्योऽयं व्याधिरित्युक्ते किं वमनसाध्यः किं वा विरेचनसाध्यः ? इत्यनुयुज्यते ॥ ५० ॥ अनुयोज्य-जो वाक्य वाक्य के न्यून आदि दोषों से युक्त होता है, उसका नाम अनुयोज्य है। क्योंकि इस प्रकार का दोषयुक्त वाक्य प्रयुक्त नहीं किया जा सकता । अथवा सामान्य रूप में कहे हुए वाक्यार्थ में विशेष ग्रहण के लिये जो वाक्य कहा जाता है, वह भी अनुयोज्य होता है। यथा-यह रोग संशोधन से साध्य है, ऐसा कहने पर वमनसाध्य है या विरेचनसाध्य है। यह और भी वक्तव्य शेष रह जाने से 'अनुयोज्य' है ॥ ५० ॥ अथाननुयोज्यं—अननुयोज्यं नामातो विपर्ययेण; यथा—अयम- साध्यः ॥ ५१ ॥ अननुयोज्य — अनुयोज्य के विपरीत-वाक्यदोष से रहित वचन को 'अननु- योज्य' कहते हैं। यथा- यह रोग असाध्य है ॥ ५१ ॥ अथानुयोगः- अनुयोगो नाम यत्तद्विद्यानां तद्विद्यैरेव सार्धं तन्त्रे तन्त्रैकदेशे वा प्रश्नः प्रश्नैकदेशो वा ज्ञान-विज्ञान-वचन-प्रतिवचन-परी- क्षार्थमादिश्यते । यथा नित्यः पुरुष इति प्रतिज्ञाते, यत्परः को हेतुरि- त्याह सोऽनुयोगः ॥ ५२ ॥ अनुयोग—विशेष विद्या वाले पुरुष का उसी (एक समान) विद्या वाले पुरुष के साथ ज्ञान, विज्ञान, प्रतिवचन शक्ति की परीक्षा के लिये सम्पूर्ण उसी शास्त्र में अथवा उस शास्त्र के किसी एक भाग में प्रश्न करना 'अनुयोग' कहाता है। जैसे—एक ने प्रतिज्ञा की—पुरुष नित्य है। दूसरे ने पूछा—इसमें हेतु क्या है ? यह कहना अनुयोग है ॥ ५२ ॥ अथ प्रत्यनुयोगः -प्रत्यनुयोगो नामानुयोगस्यानुयोगः; यथा— अस्यानुयोगस्य पुनः को हेतुरिति ॥ ५३ ॥ प्रत्यनुयोग—अनुयोग का अनुयोग करना प्रत्यनुयोग है। जैसे—एक ने प्रतिज्ञा की-पुरुष नित्य है, दूसरे ने प्रश्न किया इसमें क्या हेतु है? इस हेतु में क्या हेतु है ? ऐसा प्रश्न पर प्रश्न पूछना 'प्रत्यनुयोग है ॥ ५३ ॥ अथ वाक्यदोषः —वाक्यदोषो नाम यथा —खल्वस्मिन्नर्थे न्यूनम- धिकमनर्थकमपार्थकं विरुद्धं चेति । तत्र प्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयनि- गमनानामन्यतमेनापि न्यूनं न्यूनं भवतीति, बहुद्दिष्टहेतुकमेकेन साध्यते हेतुना तच्च न्यूनम्, एतानि ह्यन्तरेण प्रकृतोऽप्यर्थः प्रनश्येत् । वाक्यदोष—वाक्य में विषय की दृष्टि से निम्न दोष होते हैं जैसे—न्यून, अधिक, अनर्थक, अपार्थक और विरुद्धार्थ।
५७८ चरकसंहिता [ अ० ८ न्यून—प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय, निगमन इनमें से किसी एक से भी न्यून हो तो वह न्यून दोष गिना जाता है। अथवा जो वस्तु बहुत से हेतु देकर सिद्ध करनी चाहिये, उस वस्तु को केवल एक ही हेतु से सिद्ध किया जाये तो वह भी 'न्यून' दोष समझना चाहिये। अथाधिकं—अधिकं नाम यदायुर्वेदे भाष्यमाणे बार्हस्पत्यमौशन- समन्यद्वा यत्किंचिदप्रतिसंबद्धार्थमुच्यते । यद्वा पुनः प्रतिसंबद्धार्थमपि द्विरभिधीयते तत्पुनरुक्तत्वादधिकम् । तच्च पुनरुक्तं, द्विविधम् । अर्थ- पुनरुक्तं शब्दपुनरुक्तं च । तत्रार्थपुनरुक्तं नाम यथा—भेषजमौषधं साधनमिति, शब्दपुनरुक्तं नाम पुनः भेषजं भेषजमिति । अधिक-न्यून से विपरीत हेतु आदि उदाहरण अधिक हों उसको अधिक कहते हैं। अथवा आयुर्वेद के विषय में बार्हस्पत्य, औशनस आदि अन्य अप्रासंगिक बातों का कहना, अथवा प्राकृत ( सम्बन्धित ) वस्तु को दो बार कहना यह भी पुनरुक्त होने से 'अधिक' ही होता है। यह पुनरुक्त दो प्रकार का है । जैसे—अर्थपुनरुक्त और शब्दपुनरुक्त । इनमें 'अर्थपुनरुक्त' दो प्रकार का है । जैसे—भेषज, औषध और साधन । 'शब्दपुनरुक्त' जैसे 'भेषज भेषज' है। अनर्थकं नाम यद्वचनमक्षरग्राममात्रमेव स्यात्पञ्चवर्गवन्न चार्थतः गृह्यते । अनर्थक— जिनका कहना पंचवर्ग ( ङ ञ ण न म ) के समान केवल अक्षर समूह ( वर्णमाला ) के रूप में होता है, जिसका कोई अर्थ नहीं निकलता उसका नाम 'अनर्थक' है। अथापार्थकं—अपार्थकं नाम यदर्थवच्च परस्परेण चायुज्यमानार्थ- कम् । यथा—चक्र-नक्र-वंश-वज्र-निशाकरा इति । अपार्थक—जब बहुतोंमें से प्रत्येक शब्द अर्थ वाला होकर भी वे सब पर- स्पर मिलकर किसी भी अर्थ को न बता सकें तब 'अपार्थक' दोष होता है । जैसे—चक्र, नक्र, वंश, वज्र, निशाकर आदि । इनमें से प्रत्येक का पृथक् २ अर्थ है, परन्तु मिलने पर कोई संगत अर्थ नहीं निकलता । विरुद्धं नाम यद्दृष्टान्तसिद्धान्तसमयैर्विरुद्धं, तत्र दृष्टान्तसिद्धान्ता- वुक्तौ,समयः पुनस्त्रिधा भवति, यथा—आयुर्वेदिकसमयो याज्ञिकसमयो मोक्षशाब्दिकसमय इति । तत्रायुर्वेदिक्समयश्चतुष्पादं भेषजमिति,याज्ञि- कसमयः, आलब्ध्याः पशव इति,सर्वभूतेष्वहिंसेति मोक्षशाब्दिकसमयः । तत्र स्वसमयविपरीतमुच्यमानं विरुद्धं भवतीति वाक्यदोषः ॥ ५४ ॥
अ० ८ ] विमानस्थानम् ५७६
अ० ८ ] विमानस्थानम् ५७६ विरुद्ध- जो वाक्य दृष्टान्त, सिद्धान्त और समय के विपरीत हो । यह विरुद्ध तीन प्रकार का है, दृष्टान्त-विरुद्ध, सिद्धान्त-विरुद्ध और समय-विरुद्ध । इनमें दृष्टान्त और सिद्धान्त दोनों को पीछे कह चुके हैं । समयविरुद्धम्-समय तीन प्रकार का है । यथा-(१) याज्ञिक समय, (२) आयुर्वेदिक समय और (३) मोक्षशास्त्रिक समय । इनमें आयुर्वेदिक-समय जैसे-भेषज चतुष्पाद (भिषक्, द्रव्य, उपस्थाता और रोगी) है । याज्ञिक- समय जैसे-यजमान को चाहिये कि पशुओं का आलम्भन करे। मोक्षशास्त्रिक समय जैसे-सब प्राणियों के प्रति अहिंसा वृत्ति रखे । इनमें अपने २ समय अर्थात् सिद्धान्त के विपरीत कहना 'विरुद्धम्' है । ये वाक्यदोष हैं ॥ ५४ ॥ अथ वाक्यप्रशंसा नाम यथा खल्वास्मिन्नर्थे त्वन्यूनमनधिकम- र्थवदनपार्थकमविरुद्धमधिगतपदार्थं चेति यत्तद्वाक्यमननुयोज्यमिति प्रशस्यते ॥ ५५ ॥ वाक्य प्रशंसा-जिस वाक्य में न्यून और अधिक दोष न हों, जो अर्थवान् होकर भी अनर्थक और विरुद्ध न हो और पदार्थ को कहने वाला तथा दूसरे से अनुयोज्य न हो ऐसा वाक्य प्रशंसायोग्य होता है, इसे वाक्यप्रशंसा कहते हैं । अथ च्छलं-छलं नाम परिशठमर्थाभासमनर्थकं वाग्वस्तुमात्रमेव तद्द्विविधं वाक्छलं, सामान्यच्छलं च । छल-शठ के प्रति वञ्चना के लिये अर्थ की भाँति दीखने वाले अनर्थक, वाणी मात्र को (दूसरे के वचन को नष्ट करने के लिये) प्रयुक्त करना 'छल' है । यह छल दो प्रकार का है * (१) वाक्छल और (२) सामान्य छल । तत्र वाक्छलं नाम यथा-कश्चिद् ब्रूयान्नवतन्त्रोऽयंभिषगिति । भिषग् ब्रूयाद्-नाहं नवतन्त्र एकतन्त्रोऽहमिति । परो ब्रूयात्-नाहं ब्रवीमि नवतन्त्राणि तवेति, अपितु नवाभ्यस्तं हि ते तन्त्रमिति । भिषग्ब्रूयात्- न मया नवाभ्यस्तं तन्त्रमनेकधाऽभ्यस्तं मया तन्त्रमिति । एतद्वाक्छलम् । इनमें वाक् छल-जैसे कोई कहे कि यह वैद्य तो नवतन्त्रों वाला है। वैद्य कहे कि मैं नव (नौ) तंत्रों वाला नहीं हूं । दूसरा व्यक्ति कहे कि मैं यह नहीं कहता कि तुम नौ तंत्रों वाले हो, अपितु तुमने तंत्रों का नया ही अभ्यास किया है । वैद्य कहे कि मैंने तन्त्रों का नया अभ्यास नहीं किया अपितु अनेक वार किया है; यह वाक्-छल है ।
- न्यायदर्शन में 'तत् त्रिविधं वाक्छलं सामान्यच्छलमुपचारच्छलं च ।' न्याय० १ । २ । ५२ । 'धर्मविकल्पनिर्देशेऽर्थसद्भावप्रतिषेध उपचारच्छलम्' ॥ न्याय० १ । २ । ५५ ।
५८० चरकसंहिता [ अ० ८ सामान्यच्छलं नाम यथा-व्याधिप्रशमनायौषधमित्युक्ते परो ब्रूयात्-सत् सत्प्रशमनायेति । ( किंतु ) भवानाह, सन् हि रोगः, सदौ- षधं, यदि च सत् सत्प्रशमनाय भवति, तत्र सन हि कासः, सत् क्षयः, सत्सामान्यात्कासस्ते क्षयप्रशमनाय भविष्यतीति । एतत्सामान्य- च्छलम् ॥ ५६ ॥ सामान्यच्छल—जैसे—व्याधि को शान्त करने के लिये औषध है, ऐसा कहने पर दूसरा कहे कि सत् वस्तु से सत् का प्रशमन होता है । यह आप कहते हैं । रोग भी सत् है । और औषध भी सत् है । यदि सत् वस्तु से सत् वस्तु का प्रशमन होता तो तेरे मत में सत् कास से सत् क्षय का नाश होना चाहिये, क्योंकि सत् धर्म दोनों में समान है । कास भी सत् है क्षय भी सत् है । यह सामान्य छल है ॥ ५६ ॥ अथाहतुः—अहेतुर्नाम प्रकरणसमः संशयसमो वर्ण्यसम इति । अहेतु—वास्तव में जो हेतु न हो । यह तीन प्रकार का है । जैसे—( १ ) प्रकरणसम, ( २ ) संशयसम और ( ३ ) वर्ण्यसम । तत्र प्रकरणसमो नामाहेतुर्यथा—अन्यः शरीरादात्मा नित्य इति पक्षे ब्रूयात्-यस्मादन्यः शरीरादात्मा तस्मान्नित्यः, शरीरं ह्यनित्यमतो विधर्मिणा चाऽऽत्मना भवितव्यमित्येष चाहेतुः, न हि य एव पक्षः स एव हेतुः । प्रकरणसम अहेतु—जैसे कोई कहे कि आत्मा शरीर से भिन्न है । इस पर दूसरा कहे कि आत्मा शरीर से अलग है, इसलिये नित्य है; शरीर अनित्य है । इसलिये आत्मा को विधर्मी होना ही चाहिये, यह अहेतु है । क्योंकि जो पक्ष ( प्रतिज्ञा वा साध्य ) है वही हेतु नहीं हो सकता । संशयसमो नामाहेतुर्य एव संशयहेतुः स एव संशयच्छेदहेतुः । यथा—अयमायुर्वेदकदेशमाह, किंवायं चिकित्सकः स्यान्नवेति संशये परो ब्रूयात्-यस्मादयमायुर्वेदैकदेशमाह तस्माच्चिकित्सकोऽयमिति, न च संशयहेतुं विशेषयत्येष चाहेतुः, न हि य एव संशयहेतुः स एव संशयच्छेदहेतुर्भवति । संशयसम अहेतु—जो हेतु संशय का कारण हो, वही हेतु संशय के नाश का भी कारण हो जाय । जैसे-किसीने आयुर्वेद का कुछ भाग कहा, इसमें संशय हुआ कि यह चिकित्सक है या नहीं ? इस पर दूसरा व्यक्ति कहता है कि-चूंकि इसने आयुर्वेद का कुछ भाग कहा है, इसलिये वह चिकित्सक है ।