भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 587

अ० ८ ] विमानस्थानम् ५६६ बने, जैसा अभिप्राय हो, वह वैसा वाद, और वैसी वाद-मर्यादा को स्थापित करेगी,—ऐसा कह कर चुप हो जाये ॥ २५ ॥ तत्रे॒दं वादमर्यादालक्षणं भवति—इदं भवति वाच्यमिदमवाच्य- मेवं सति पराजितो भवतीति ॥ २६ ॥ वाद की मर्यादा—यह कहना, यह नहीं कहना, इस प्रकार से पराजय होता है, यह तीन वाद-मर्यादा के लक्षण कहाते हैं ॥२६॥ इमानि तु खलु पदानि वादमार्गज्ञानार्थमधिगम्यानि भवन्ति । तद्यथा—वादः, द्रव्यं, गुणाः, कर्म, सामान्यं, विशेषः, समवायः, प्रतिज्ञा, स्थापना, प्रतिष्ठापना, हेतुः, दृष्टान्तः, निगमनं, उत्तरं, सिद्धान्तः, उपनयः, शब्दः, प्रत्यक्षं, अनुमानमैतिह्यमौपम्यं, संशयः, प्रयोजनं, सव्यभिचारं, जिज्ञासा, व्यवसायः, अर्थप्राप्तिः, संभवः, अनुयोज्यं, अननुयोज्यं, अनुयोगः, प्रत्यनुयोगः, वाक्यदोषः, वाक्यप्रशंसा, छलम्हेतुरतीतकालमुपालम्भः, परिहारः, प्रतिज्ञाहानिरभ्यनुज्ञा, हेत्वन्तरमर्थान्तरं, निग्रहस्थानमिति ॥ २७ ॥ वाद के मार्ग को समझने के लिये वैद्यों को निम्न चवालीस बातें समझ लेनी चाहियें । यथा—वाद, द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय, प्रतिज्ञा, स्थापना, प्रतिष्ठापना, हेतु, दृष्टान्त, उपनय, निगमन, उत्तर, सिद्धान्त, शब्द, प्रत्यक्ष, अनुमान, ऐतिह्य, औपम्य, संशय, प्रयोजन, सव्यभिचार, जिज्ञासा, व्यवसाय, अर्थप्राप्ति, संभव, अनुयोज्य, अननुयोज्य, अनुयोग, प्रत्य- नुयोग, वाक्यदोष, वाक्यप्रशंसा, छल, हेतु, अतीतकाल, उपालम्भ, परिहार, प्रतिज्ञाहानि, अभ्यनुज्ञा, हेत्वन्तर, अर्थान्तर और निग्रहस्थान ॥ २७ ॥ तत्र वादो नाम—यत् परः परेण सह शास्त्रपूर्वकं विगृह्य कथयति । स वादो द्विविधः संग्रहेण—जल्पो वितण्डा च । तत्र पक्षाश्रितयोर्वचनं जल्पः, विपर्ययो वितण्डा । यथा—एकस्य पक्षः—पुनर्भवोऽस्तीति, नास्तीत्यपरस्य । तौ च हेतुभिः स्वस्वपक्षं स्थापयतः, परपक्षमुद्भावयतः, एष जल्पः । जल्पविपर्ययो वितण्डा, वितण्डा नाम—परपक्षे दोष- वचनमात्रमेव ॥ २८ ॥ वाद का लक्षण—शास्त्र के अनुसार जो परस्पर विगृह्य भाषण है वह वाद ॐ कहाता है । यह संक्षेप से दो प्रकार का है । जल्प और वितण्डा । इनमें ॐ वाद का लक्षण—'प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भः सिद्धान्ताविरुद्धः पञ्चा- वयवोपपन्नः पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहो वादः । न्यायदर्शन १ । २ । ४२ ।