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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

५५० चरकसंहिता [ अ० ७ यस्त्वभ्यवहार्यविधिः प्रकृतिविघातायोक्तः कृमीणां, सोऽनुव्या- ख्यास्यते—मूषिकपर्णीं समूलामप्रतानामाहृत्य खण्डशश्छेदयित्वा, उलूखले क्षोदयित्वा पाणिभ्यां पीडयित्वा रसं गृह्णीयात्, तेन रसेन ऽोदितशालितण्डुलपिष्टं समालोड्य पूपलिकाः कृत्वा विधूमेष्वङ्गारेषु विपाच्य विडङ्गतैललवणोपहिताः कृमिकोष्ठाय भक्षयितुं प्रयच्छेत्; अनन्तरं चाम्लकाञ्जिकमुदश्विद्वा पिप्पल्यादिपञ्चवर्गसंसृष्टं सलवण- मनुपापयेत् ॥ २२ ॥ अनेन कल्पेन मार्कवार्क-सहचर-नीप-निर्गुण्डी-सुमुख-सुरस-कुठेरक- गण्डीर-कालमालक-पर्णास-क्षवक-फणिज्जक-बकुल-कुटज-सुवर्णक्षीरी- स्वरसा नामन्यतमस्मिन्कारयेत्पूपलिकाः, तथा किणिही-किरात-तिक्तक- सुवहामलक-हरीतकी-बिभीतक-स्वरसेषु कारयेत्पूपलिकाः । स्वरसांश्चै- तेषामेकैकशो द्वन्द्वशः सर्वशो वा मधुविलुलितान् प्रातरनन्नाय पातुं प्रयच्छेत् ॥ २३ ॥ कृमियों के प्रकृति-विघात के लिये जो आहार-विधि कही है, उस को व्याख्या करते हैं । जल और कोमल पत्तों के साथ मूषापर्णी को लाकर इसको टुकड़े २ करके, ऊखल में कूटकर, हाथों से दबाकर रस निकाल ले । इस रस में लाल धानों के चावलों की पिष्ठी को मिलाकर इससे पूरी ( पूप ) बनावे । इन पूरियों को धूम रहित अंगारों पर पकावे । फिर विडंग तैल और लवण के . साथ मिलाकर कृमि कोष्ठवाले रोगी को खाने के लिये दे । पूरी खाने के पीछे खट्टी कांजी ( धान्य-काञ्जिक ) में या उदश्वित् ( आधे विलोये मठे, या छाछ ) में पिप्पली आदि पंचकोल को लवण के साथ मिला कर पीने के लिये दे । इसी विधि से मार्कव ( भृंगराज ), अर्क (आंक ), सहचर (झण्टि ), नीप ( कदम्ब ), निर्गुण्डी ( सिन्धुवार सम्हालू ), सुमुख, सुरस, कुठेरक, गण्डीर, (सेहुण्ड ), कालमाल ( कुठेरक के भेद ), पर्णास, क्षवक, फणिजक (तुलसी के भेद ), बकुल (मौलसरी ) कुटज, स्वर्णक्षीरी ( सत्यानाशी ) इन में से किसी एक के रस के साथ पूरी तैयार करनी चाहिये। इसी प्रकार किणिही ( अपामार्ग ), किराततिक्त (चिरायता), आम की, हरड़, बिभीतक (बहेड़ा ), सुवहा (शेफालिका ) इनके रसों में पूरियां बनानी चाहियें । इन ( मण्डूक- पर्णी आदि ) में से एक एक को या दो दो को अथवा सब को मिलाकर स्वरस निकाल कर इस स्वरस में मधु मिला कर प्रातःकाल खाली पेट पीने के लिये दे ॥ २२-२३ ॥ अथापशराफूदाहृत्य महति किलिञ्चके प्रस्तीर्याऽऽतपे शोषयित्वोदूखले

क्षोदयित्वा दृषदि पुनः सूक्ष्माणि चूर्णानि कारयित्वा विडङ्गकषायेण त्रिफलाकषायेण वाऽष्टकृत्वो दशकृत्वो वाऽऽतपे सुपरिभावितानि भावयित्वा दृषदि पुनः सूक्ष्माणि चूर्णानि कारयित्वा नवे कलशे समा- वाप्यानुगुप्तं निधापयेत् । तेषां तु खलु चूर्णानां पाणितलं चूर्णं यावद्वा साधु मन्येत, तत् क्षौद्रेण संसृज्य कृमिकोष्ठाय लेढुं यच्छेत् ॥ २४ ॥ इसके पीछे घोड़े की शकृत (लीद) को लाकर बड़ी चटाई पर फैलाकर धूप में सुखा ले। फिर ऊखल में कूटकर शिला पर पीसकर बारीक बनाले इस चूर्ण को विडंग के कषाय से या त्रिफला-कषाय से आठ बार अथवा दस बार धूप में भावना देकर शुष्क कर ले। फिर इसको पत्थर पर पीसकर नये घड़े में रखकर, वायु आदि न जा सके इस प्रकार से मुख को ढांप कर गुप्त स्थान पर रख दे। इसमें से कर्ष परिमाण (चार माशा) अथवा रोग के अनुसार जितनी मात्रा उचित समझे उतनी मात्रा को शहद में मिलाकर कृमि रोगी को खाने के लिये दे ॥ २४ ॥ तथा भल्लातकास्थीन्याहृत्य कलशप्रमाणेन संपोथ्य स्नेहभाविते दृढ़े कलशे सूक्ष्मानेकच्छिद्रप्रध्‍ने शरीरमुपवेष्ट्य मृदावलिप्ते समावाप्यो- ल्‍पेन पिधाय भूमावाकण्ठं निखातस्य स्नेहभावितस्यैवान्यस्य दृढस्य कुम्भस्योपरि समारोप्य समन्ताद् गोमयैरुपचित्य दाहयेत्; स यदा जानीयात् साधु दग्धानि गोमयानि गलितस्नेहानि भल्लातकास्थीनीति, ततस्तं कुम्भमुद्घाटयेत् । अथ तस्माद् द्वितीयात्कुम्भात्तं स्नेहमादाय विडङ्गतण्डुलचूर्णैः स्नेहार्धमात्रैः प्रतिसंसृज्याऽऽतपे सर्वमहः स्थाप- यित्वा ततोऽस्मै मात्रां प्रयच्छेत्पानाय, तेन साधु विरिच्यते, विरिक्तस्य चाऽऽनुपूर्वी यथोक्ता ॥ २५ ॥ दूसरा प्रयोग—घड़े में जितने भिलावे के फल आ सकें, उतने फलों को कूट कर तैलादि स्नेह से चिकने, मजबूत एक घड़े में भरे। इस घड़े के निचले भाग में अनेक सूक्ष्म छिद्र बना दे तथा घड़े पर मिट्टी का लेप कर दे। इस घड़े में भिलावे भर कर ढक्कन से मुंह ढांप दे। फिर स्नेह से भावित एक दूसरे घड़े को ले कर जमीन में गले तक गाड़ दे। इस गड़े हुए घड़े के ऊपर भिलावे वाला घड़ा रख कर चारों ओर उपले रख कर जलावे। जब उपले भली प्रकार जल जावें, तब ऊपर के घड़े को पृथक् करे। जब इस दूसरे घड़े में से तेल (स्नेह) ले कर स्नेह से आधी मात्रा में विडंग-तण्डुल चूर्ण को स्नेह में मिला कर धूप में चार प्रहर तक रखे। पीछे इस स्नेह को

५५२ चरकसंहिता [ अ० ७ कृमि-कोष्ठ रोगी को पीने के लिये दे । इससे भली प्रकार विरेचन होता है। विरेचन के पीछे पूर्व की भांति पेया आदि देने का क्रम है ॥२५॥ एवमेव भद्रदारु-सरलकाष्ठस्नेहानुपकल्प्य पातुं प्रयच्छेत्। अनुवा- सयेच्चैनमनुवासनकाले ॥ २६ ॥ इसी भल्लात के स्नेह-विधि से देवदारु, सरल (राल-सर्ज), वृक्षों से स्नेह बना कर रोगी को पीने के लिये देना चाहिये और अनुवासन के योग्य समय में कहे हुए स्नेहों से अनुवासन देना चाहिये ॥ २६ ॥ अथ 'आहर' इति ब्रूयात् शारदान्नावांस्तिलान्संपदुपपेतान्। तानाहृत्य सुनिष्पूय सुशुद्धान् शोधयित्वा विडङ्गकषाये सुखोष्णे निर्वापयेदाश्लेष- गमनात्, गतदोषानभिसमीक्ष्य सुप्रलूनान्प्रलुञ्च्य पुनरेव सुनिष्पूतान् सुनिष्पूय सुशुद्धान् शोधयित्वा विडङ्गकषायेण त्रिःसप्तकृत्वः सुपरिभा- वितान्भावयित्वाऽऽतपे शोषयित्वोलूखले संक्षुद्य दृषदि पुनः श्लक्ष्णपिष्टा- न्कारयित्वा द्रोण्यामभ्यवधाय विडङ्गकषायेण मुहुर्मुहुरवसिञ्चन् पाणि- मर्दमेव मर्दयेत् । तस्मिन्खलु प्रपीड्यमाने यत्तैलमुदियात्तत्पाणिभ्यां पर्यादाय शुचौ दृढे कलशे समासिच्यानुगुप्तं निधापयेत् । अन्ययोग—वैद्य रोगी से कहे कि 'आगे कहे पदार्थ लाओ'। अच्छी प्रकार पके, रस-वीर्य युक्त, शरद ऋतु में होने वाले नये तिलों को ला कर, भली प्रकार मिट्टी आदि से साफ़ करके सुखा ले । फिर सुखोष्ण, कुछ गरम बिडंग-कषाय में भिगो दे, जब तक कि छिलके में लगा मैल दूर न हो जाय तब तक भिगो कर रखे । दोष निकलने पर इन तिलों को तुष रहित करके, सुखा लेवे । फिर छाज से साफ़ करके धोले । फिर सूखने पर बिडंग कषाय में इक्कीस बार भावना दे कर धूप में सुखा लेवे । इन तिलों को ऊखल में कूट कर पत्थर की शिला पर रख बारीक पीस लेवे । अब इनको द्रोणी (थाली, कड़ाही) में रखकर विडंग कषाय को थोड़ा थोड़ा डालते हुए हाथों से खूब मले, इस प्रकार हाथों से मलने पर जो तैल निकलता है, हाथ पर लगे हुए उस तैल को ले कर पवित्र, दृढ़ घड़े में रखकर गुप्त स्थान में सुरक्षित रख देवे । इस को खाने के लिये कहे । अथ 'आहार' इति ब्रूयात्-तिल्वकोदालकयोर्द्वौ बिल्वमात्रौ पिण्डौ श्लक्ष्णपिष्टौ विडङ्गकषायेण, ततोऽर्धमात्रौ श्यामात्रिवृतोस्ततोऽर्धमात्रौ दन्तीद्रवन्त्योरतोऽर्धमात्रौ चव्यचित्रकयोरित्येतं सम्भारं विडङ्गकषा- यस्याऽऽढकमात्रेण प्रतिसंसृज्य ततस्तैलप्रस्थमावाप्य सर्वमालोड्य महति पयोगे समासिच्याग्नावधिश्रित्य महत्यासने सुखोपविष्टः सर्वतः स्नेह-

मवलोकयन्नजस्रं मृद्वग्निना साधयेद्दर्व्या सतत मवघट्टयन् । स यदा जानीयाद्विरमति शब्दः, प्रशाम्यति च फेनः, प्रसादमापद्यते स्नेहो यथास्वं गन्धवर्णरसोत्पत्तिः, संवर्तते च भेषजमंगुलिभ्यां मृद्यमानमति- मृदुनतिदारुणमनंगुलिप्राद्दि चेति, स कालस्तस्यावतारणाय । ततस्तम- वतीर्णशीतीभूत महतेन वाससा परिपूय शुचौ दृढे कलशे समासिच्य पिधानेन पिधाय शुक्लेन बद्धपट्टेनावच्छाद्य सूत्रेण सुबद्धं सुनिगुप्तं निधापयेत् । ततोऽस्मै मात्रां प्रयच्छेत्पानाय, तेन साधु विरिच्यते, सम्यगपहृतदोषस्य चास्याऽऽनुपूर्वी यथोक्ता । ततश्चैनमनुवासयेदनु- वासनकाले ।

फिर वैद्य आगे कहे पदार्थ लाने को कहे—तिल्वक और उद्दालक ये दो बिल्व भर (पल भर, ४ तोला) लेकर विडंग कषाय के साथ खूब बारीक पीस ले । इनसे आधी मात्रा (२ तोला) श्यामा (काली निशोथ) और त्रिवृत् (सफेद निशोथ), इन से आधी (१ तोला) दन्ती और द्रवन्ती, इनसे आधे (½ तोला) चव्य और चित्रक इन सबको अर्धाढक (दो प्रस्थ) विडंग कषाय, में तथा एक प्रस्थ पूर्वोक्त तिलों से तैयार किये तैल के साथ मिलाकर एक बड़े कड़ाहे में रख कर आग पर रख कर आराम से बैठ कर, चारों ओर स्नेह को देखते हुए कि गिरे नहीं, निरन्तर मृदु अग्नि से पकावे । और पकाते समय कड़छी द्वारा बराबर हिलाता रहे। जिस समय शब्द होना बन्द हो जाय, झाग उठना भी रुक जाय, तथा स्नेह (तैल) भी स्वच्छ हो जावे, एवं तैल में उचित गन्ध, वर्ण और रस की उत्पत्ति हो जाय तब समझे कि तैल बन गया । औषध (कल्क) अंगुली से मलने पर न तो बहुत कोमल और न बहुत कठोर हो तथा अंगुली पर चिपटे नहीं, (कल्क की बत्ती बन जावे)। तब समझ ले कि तैल सिद्ध हो गया यह समय है, तैल उतारने का; अब इसको उतार कर ठण्डा होने पर बड़े भारी वस्त्र से छान कर एक शुद्ध, मजबूत पात्र में डाल कर, ढक्कन से टांप कर, सफेद वस्त्र से बांध कर तागे से कस कर, गुप्त (सुरक्षित) स्थान पर रख देवे । इस तैल की मात्रा को रोग के अनुसार पीने के लिये (कृमि-रोगी को) देवे। इससे भली प्रकार विरेचन होता है। दोषों के भली प्रकार निकल जाने पर पहिले कही विधि करनी चाहिये। अनुवासन योग्य समय में उस तैल से अनुवासन देना चाहिये ।

एतेनैव च पाकविधिना सर्षपातसी-करञ्ज-कोषातकी-स्नेहानुपकल्प्य पाययेत्सर्वविशेषानवेक्ष्यमाणः। तेनागदो भवतीति ॥ २७ ॥

५५४ चरकसंहिता [ अ० ७ इसी पूर्वोक्त विधि से सरसो, अलसी, करञ्ज, कोषातकी ( तुरई ) का तैल बना कर सब परीक्षणीय वस्तुओं को देख कर कृमि-रोगी को तैल पिलावे। इस से रोगी नीरोग हो जाता है ॥ २७ ॥ इत्येतत् द्वयानां श्लेष्मपुरीषसंभवानां कृमीणां समुत्थान-संस्थान- स्थान-वर्ण-नाम-प्रभाव-चिकित्सित-विशेषा व्याख्याताः सामान्यतः ॥२८॥ इस प्रकार से कफजन्य और पुरीषजन्य कृमियों के निदान, संस्थान, स्थान, वर्ण, प्रभाव और चिकित्सा सामान्य रूप में कह दी है ॥ २८ ॥ विशेषतस्त्वल्पमात्रमास्थापनानुवासनानुलोमहरणभूयिष्ठं तेष्वौष- धेषु पुरीषजानां कृमीणां चिकित्सितं कार्यमिति । मात्राधिकं पुनः शिरोविरेचन-वमनोपशमन-भूयिष्ठं तेष्वेवौषधेषु श्लेष्मजानां कृमीणां चिकित्सितं कार्यमिति । एष कृमिघ्नो भेषजविधिरनुव्याख्यातो भवतीति ॥ २९ ॥ विशेष रूप से पुरीषजन्य कृमियों के लिये कही हुई वमन, विरेचन, आस्था- पन, अनुवासन, शिरोविरेचन, ओषधियों में अल्पमात्रा में आस्थापन, अनुवा- सन और अनुलोम-हरण, विरेचन बरतना चाहिये। मलजन्य कृमियों में बस्ति, विरेचन अधिक बरतना चाहिये। कफजन्य कृमियों में शिरोविरेचन, वमन और शमन अधिक देना चाहिये ॥ २९ ॥ तमनुतिष्ठता यथास्वहेतुवर्जने प्रयत्नितव्यम् ॥ ३० ॥ यथोद्देशमेवमिदं कृमिकोष्ठचिकित्सितं यथावदनुव्याख्यातं भवतीति ॥ ३१ ॥ इस विधि को बरतते हुए वैद्य को चाहिये कि रोगी को कृमि निदान से भी बचाये। इस प्रकार से पूर्व कथितानुसार कृमि-कोष्ठ चिकित्सा ( शोधन-शमन रूप ) को यथावत् पूर्ण रूप से कह दिया है ॥ ३०-३१ ॥ भवन्ति चात्र—अपकर्षणमेवाऽऽदौ कृमीणां भेषजं स्मृतम्। ततो विघातः प्रकृतेर्निदानस्य च वर्जनम् ॥ ३२ ॥ अयमेव विकाराणां सर्वेषामपि निग्रहे। विधिर्दृष्टस्त्रिधा योऽयं कृमीनूद्दिश्य कीर्तितः ॥ ३३ ॥ संशोधनं संशमनं निदानस्य च वर्जनम्। एतावद्भिषजा कार्यं रोगे रोगे यथाविधि ॥ ३४ ॥ कृमियों को प्रथम खींच कर निकालना ही औषध है। फिर प्रकृति का नाश, निदान का छोड़ना है यह विधि सब प्रकार के कृमियों के लिये है। इतना ही नहीं, अपितु सब रोगों के लिये है। इसलिये वैद्य को चाहिये कि

अ० ८ ] विमानस्थानम् ५५५

अ० ८ ] विमानस्थानम् ५५५ प्रत्येक रोग में सब विकारों में संशोधन, संशमन और निदान का त्याग यह तीन प्रकार की चिकित्सा करे ॥ ३२-३४ ॥ तत्र श्लोकौ—व्याधितौ पुरुषौ ज्ञाज्ञौ भिषजौ सप्रयोजनौ । विशतिः कृमयस्तेषां हेत्वादिः सप्तको गणः ॥ ३५ ॥ उक्तो व्याधितरूपीये विमाने परमर्षिणा । शिष्यसंबोधनार्थं च व्याधिप्रशमनाय च ॥ ३६ ॥ व्याधि से पीड़ित दो प्रकार के पुरुष विज्ञ (जानने वाले) और अज्ञ (मूढ), इनका प्रयोजन (जानने बाल से सिद्धि और मूढ से रोगवृद्धि या मृत्यु), बीस प्रकार के कृमि, इन के हेतु, संस्थान वर्ण, प्रभाव, नाम और चिकित्सा ये सात बातें, भगवान् आत्रेय ने शिष्य को समझाने के लिये तथा रोग की शान्ति के लिये इस विमान स्थान में कह दी हैं ॥ ३५-३६ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते तृतीये विमानस्थाने व्याधितरूपीयविमानं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥ अष्टमोऽध्यायः। अथातो रोगभिषग्जितीयं विमानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ इस के आगे 'रोगभिषग्जितीय' नामक अध्याय को व्याख्यान करेंगे। जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ २ ॥ बुद्धिमानात्मनः कार्यगुरुलाघवे कर्मफलमनुबन्धं देशकालौ च विदित्वा युक्तिदर्शनाद् भिषग्बुभूषुः शास्त्रमेवाऽऽदितः परीक्षेत । विवि- धानि हि शास्त्राणि भिषजां प्रचरन्ति लोके । तत्र यन्मन्येत सुमहद्यश- स्विधीरपुरुषासेवितमर्थबहुलमाप्तजनपूजितं त्रिविधशिष्यबुद्धिहितमप- गतपुनरुक्तदोषमार्षं सुप्रणीतसूत्रभाष्यसंग्रहक्रमं स्वाधारमनवपतित- शब्दमकष्टशब्दं पुष्कलाभिधानं क्रमागतार्थमर्थतत्त्वविनिश्चयप्रधानं संगतार्थमसंकुलप्रकरणमाशुप्रबोधकं लक्षणवच्चोदाहरणवच्च, तदभिप्रप- द्येत शास्त्रम् । शास्त्रं ह्येवंविधममल इवाऽऽदित्यस्तमो विधूय प्रकाशयति सर्वम् ॥ ३ ॥ शास्त्र-परीक्षा—बुद्धिमान् पुरुष अपने कार्य के गौरव (बहुत प्रयास से साध्य) एवं लाघव (अल्प प्रयास से साध्य), कर्मों के फल, अनुबन्ध

५५६ चरकसंहिता [अ० ८ (कर्मजन्य शुभ-अशुभ फल), देश एवं काल को जान कर तथा युक्ति को देख कर यदि वैद्य बनने की इच्छा करे तो सब से प्रथम शास्त्र की ही परीक्षा करे, क्योंकि वैद्यों के नाना प्रकार के शास्त्र लोक में प्रचलित हैं। इन में से जो शास्त्र निम्नलिखित गुणों वाला हो, उसे पढ़ने के लिये स्वीकार करे। शास्त्र के गुण—शास्त्र खूब बड़ा, असंक्षिप्त, यशस्वी, धीर पुरुषों से उप- सेवित, माननीय, थोड़े से शब्दों में बहुत अर्थ को बतलाने वाला, आप्त जनों से अनुमत (निर्दोष), उत्तम, मध्यम और अधम इन तीन प्रकार के शिष्यों की तीनों प्रकार की बुद्धि के लिये योग्य, सब जिस को समझ सकें, पुनरुक्ति दोष से रहित, ऋषियों से बनाया, सुप्रीत (अच्छी प्रकार ग्रथित किया हो), जिस में सूत्र (संक्षेप में अर्थों का ग्रहण) भाष्य (विस्तार से वर्णन), और प्रतिपाद्य विषयों को क्रम से कहा हो, सुन्दर अधिकरणों वाली, ग्राम्य शब्दों से रहित, कठिन दुर्बोध या बोलने में कठिन शब्दों से रहित, भली प्रकार से बहुत तत्त्व बतलाने वाला, (क्रम से उद्देश्य क्रम से अर्थों को बतलाने वाला), वस्तुतत्त्व को सन्देह से रहित, निश्चित तत्त्व को बतलाने वाला, संगतियुक्त अर्थों को बतलाने वाला, अव्यवस्थित, बेमेल मिले हुए प्रकरणों से रहित; सुनते ही स्पष्ट अर्थज्ञान कराने वाला, लक्षण और उदाहरण वाला हो, ऐसा शास्त्र अध्ययन के लिये चुनना चाहिये। क्योंकि जिस प्रकार बादल आदि से रहित, निर्मल सूर्य अन्धकार को दूर करके सब पदार्थों को प्रकाशित कर देता है उसी प्रकार शास्त्र अज्ञान को दूर करके सब अर्थ-तत्त्व को प्रकाशित कर देता है ॥ ३ ॥ ततोऽनन्तरमाचार्यं परीक्षेत। तद्यथा—पर्यवदातश्रुतं परिदृष्टक- र्माणं दक्षं दक्षिगं शुचिं जितहस्तमुपकरणवन्तं सर्वेन्द्रियोपपन्नं प्रकृ- तिज्ञं प्रतिपत्तिज्ञमनुपस्कृतविद्यमनहङ्कृतमनसूयकमकोपनं क्लेशक्षमं शिष्यवत्सलमध्यापकं ज्ञापनसमर्थं चेति। एवंगुणो ह्याचार्यः सुक्षेत्रमा- र्तवो मेघ इव सस्यगुणैः सुशिष्यमाशु वैद्यगुणैः संपादयति ॥ ४ ॥ आचार्य का लक्षण—शास्त्र की परीक्षा करने के अनन्तर आचार्य की परीक्षा करे। यथा-वह निर्मल शास्त्रज्ञान से सम्पन्न हो, जिसने कर्म को उचित रीति से देखा हो, केवल शास्त्र ही न पढ़ा हो, प्रत्युत वह कर्म में कुशल, शुचि (पवित्र), शस्त्र आदि क्रिया में वशी, सिद्धहस्त, नाना उपयोगी उपकरणों वाला सब इन्द्रियों से युक्त, रोगी की प्रकृति को पहिचानने वाला, उत्तम सूझ वाला, रोगों की चिकित्सा को समझने वाला, अन्य शास्त्रों के ज्ञान से प्रकट स्वच्छ विद्या वाला, अभिमान से रहित, गुणों में दोष न देखने वाला, क्रोध-

अ० ८ ] विमानस्थानम् ५५७

अ० ८ ] विमानस्थानम् ५५७ रहित क्लेश सहन करने वाला, शिष्य से प्रेम-भाव रखने वाला, शास्त्र के तत्त्व को बतलाने में समर्थ आचार्य होना चाहिये । जिस प्रकार ठीक ऋतु अनुसार बरसा हुआ मेघ उत्तम क्षेत्र को धान्यों से सम्पन्न कर देता है उसी प्रकार उक्त गुणों वाला आचार्य शिष्य को निर्मल ज्ञान आदि वैद्य के गुणों से शीघ्र सम्पन्न कर देता है ॥ ४ ॥ तमुपसृत्यारिराधयिषुरुपचरेदग्निवच्च देववच्च राजवच्च पितृवच्च भर्तृवच्चाप्रमत्तः । ततस्तत्प्रसादात्कृत्स्नं शास्त्रमधिगम्य, शास्त्रस्य दृढ- तायामभिधानसौष्ठवेऽर्थस्य विज्ञाने वचनशक्तौ च भूयो भूयः प्रयतेत सम्यक् ॥ ५ ॥ उपरोक्त गुणों वाले आचार्य के पास जाकर सेवा करने की इच्छा से शिष्य अग्नि, देव, राजा, माता, पिता और स्वामी के समान प्रमादरहित होकर उस की सेवा करे । तब उस की प्रसन्नता से सम्पूर्ण शास्त्र को जान कर शास्त्र को दृढ़ करने में, शास्त्र को उत्तम रीति से प्रवचन करने में, शास्त्र के अर्थ जानने में और वाक्-चातुर्य ( बोलने की पटुता प्राप्त करने ) में लगातार भली प्रकार से प्रयत्न करे ॥ ५ ॥ तत्रोपाया व्याख्यास्यन्ते—अध्ययनमध्यापनं तद्विद्यसंभाषा चेत्युपायाः ॥ ६ ॥ शास्त्र को दृढ़ करने आदि के उपायों का वर्णन करते हैं । वे उपाय ये हैं—( १ ) अध्ययन ( पढ़ना ), ( २ ) अध्यापन ( पढ़ाना ) और ( ३ ) उस विद्या के विद्वानों से वार्तालाप करना ॥ ६ ॥ तत्रायमध्ययनविधिः—कल्यः कृतक्षणः प्रातरुत्थायोपव्यूषं वा कृत्वाऽऽ- वश्यकमपस्पृश्योदकं देव-गो-ब्राह्मण-गुरु-वृद्ध-सिद्धाचार्येभ्यो नम- स्कृत्य समे शुचौ देशे सुखोपविष्टो मनःपुरःसरीभिर्वाग्भिः सूत्रमनुपरि- क्रामन्पुनःपुनरावर्तयेद् बुद्ध्या सम्यगनुप्रविश्यार्थतत्त्वं स्वदोषपरिहार- परदोषप्रमाणार्थम् । एवं मध्यन्दिनेऽपराह्ने रात्रौ च शश्वदपरिहापयन्न- ध्ययनमभ्यस्येदित्यध्ययनविधिः ॥ ७ ॥ इस शास्त्र की अध्ययन विधि यह है—नीरोग, समय में, नियम-पूर्वक प्रातःकाल उषःकाल में उठ कर शौचादि आवश्यक कर्मों को करके, पानी का आचमन स्नान आदि जलकार्य करे, पीछे देव, परमेश्वर ऋषि, गौ, ब्राह्मण, गुरु, वृद्ध, सिद्ध एवं आचार्य इनको नमस्कार करके समान ( न ऊंचे और न नीचे ) एवं पवित्र स्थान पर सुखपूर्वक बैठकर मनोयोग पूर्वक वाणी से बार- बार सूत्रों का उच्चारण करता हुआ खूब समझ कर, अर्थ-तत्त्व में बुद्धि द्वारा

५५८ चरकसंहिता [अ० ८ प्रवेश करके, ( भली प्रकार समझ कर ) अपने अध्ययन के दोष को त्यागने और दूसरे के अध्ययन के दोषों के ज्ञान लिये एकान्त में बैठ कर अध्ययन करे। इस प्रकार से मध्याह्न और रात्रि में निरन्तर अध्ययन ( किसी दिन को भी बिना त्याग किये, ) प्रतिषिद्ध दिनों को छोड़कर, अभ्यास करे ॥ ७ ॥ अथाध्यापनविधिः—अध्यापने कृतबुद्धिराचार्यः शिष्यमादितः परीक्षेत । तद्यथा—प्रशान्तमार्यप्रकृतिमक्षुद्रकर्माणमृजुचक्षुर्मुखनासा- वंशं तनुरक्तविशदजिह्वमविकृतदन्तौष्ठममिन्मिणं धृतिमन्तममहङ्कृतिं मेधाविनं वितर्कस्मृतिसंपन्नमुदारसत्त्वं तद्विद्यकुलजमथवा तद्विद्यवृत्तं तत्त्वाभिनिवेशिनमव्यङ्गमव्यापन्नेन्द्रियं निभृतमनुद्धतवेशमन्यसनिनं शील-शौचाचारानुराग-दाक्ष्य-प्रादक्षिण्योपपन्नमव्यसनाभिकाममर्थवि- ज्ञाने कर्मदर्शने चानन्यकार्यमलुब्धमनलसं सर्वभूतहितेषिणमाचार्य सर्वा- नुशिष्टप्रतिकरमनुरक्तमेवंगुणसमुदितमध्याप्यमेवमाहुः । अब अध्यापन-विधि कहते हैं—पढ़ाने की इच्छा करने वाले आचार्य को सबसे प्रथम शिष्य की परीक्षा करनी चाहिये। यथा—शिष्य सौम्य आकृति, शान्त, नीच स्वभाव से रहित, कमीने स्वभाव का न हो, नीच कर्म न करने वाला, सरल मुख, आँख और नासिका वाला, पतली लाल वर्ण, स्पष्ट जिह्वा वाला, दांत और ओष्ठों के विकार से रहित, नाक से अनुनासिक न बोलने वाला, संतोषी या धैर्यवान्, अहंकार रहित, मेधावी, वितर्क ( ऊहापोह ) स्मृति (याददास्त) से युक्त, उदारचित्त वाला, वैद्यकुल में या वैद्य वृत्ति करने वाले माता पिता से उत्पन्न, वैद्य के समान आचार वाला, तत्त्व के ग्रहण में दत्तचित्त, अविकल अंगो वाला, सम्पूर्ण इन्द्रियों से युक्त, निभृत ( विनीत ), अनुद्धत, अर्थ-तत्त्व को विचारने वाला, अक्रोधी, व्यसनरहित, शील ( सच्चरित्रता ) शौच ( शुद्धि ) आचार, अनुराग ( पढ़ने से स्नेह ) रखने वाला, दक्षता, प्रादक्षिण्‍य सर्वत्र अनुकूलता इन गुणों से युक्त, कर्म दर्शन और अर्थ के जानने में अन्य कर्म रहित, दत्तचित्त लोभरहित, अप्रमादी, सब प्राणियों में मंगल कामना करने वाला, आचार्य के सब उपदेशों को यथावत् करने वाला और भक्तिमान् हो; इन गुणों से युक्त शिष्य को पढ़ाना चाहिये । ( इन गुणों से रहित शिष्य को पढ़ाने में आचार्य को भी यश नहीं मिलता ।) एवंविधमध्ययनार्थमुपस्थितमारिराधयिषुमाचार्यश्चानुभाषेत— अथोदगयने शुक्लपक्षे प्रशस्तेऽहनि तिष्य-हस्त-श्रवणाश्वयुजामन्यतमेन नक्षत्रेण योगमुपगते भगवति शशिनि कल्याणे; कल्याणे च करणे मैत्रे मुहूर्ते मुण्डः स्नातः कृतोपवासः कषायवस्त्रसंवीतः समिधोऽग्निमाज्य-

मुपलेपनमुदकुम्भांश्चगन्धहस्तो माल्य-दाम-प्रदीप-हिरण्य-हेम-रजत-मणि- मुक्ता-विद्रुम-क्षौम-परिधि-कुश-लाज-सर्षपाक्षतांश्च शुक्लांश्च सुमनसोप्रथि- ताप्रथितांश्च मेध्यांश्च भक्ष्यान् गन्धांश्च घृष्टानादायोपतिष्ठस्वेति । अथ सोऽपि तथा कुर्यात् ॥ ८ ॥ इन उपरोक्त गुणों से युक्त अध्ययनार्थ शिष्य के सेवा में उपस्थित होने पर आचार्य उसे कहे—कि "तू उत्तरायण ( माघ आदिके शुक्ल पक्ष में, प्रशस्त दिव्य उत्तम तिथि, बार से युक्त दिन में, तिष्य, हस्त, श्रवण, अश्विनी इनमें से किसी एक नक्षत्र के साथ कल्याणकारी करण और सुखप्रद मुहूर्त्त के अनुकूल होने पर, मुण्डन करा, उपवास और स्नान करके, कषाय वस्त्र धारण करके, हाथों में सुगन्ध ( धूप ) , समिधा, अग्नि, घी, उपलेपन ( चन्दन आदि ), जल के घड़े, माला, हार, स्वर्ण, रजत, मोती, प्रवाल ( मूँगा ), क्षौम ( रेशम ), हवनकुण्ड के चारों पाश्र्वों में रखने योग्य हस्तप्रमाण के पलाशदि समिधा, कुशा, लाजा, सरसों, अक्षत, श्वेत, गुंथे और ग्रन्थन रहित ( छुटे, अनबिधे ) पुष्प-माला, पवित्र खाद्य पदार्थ ( तिल से बने लड्डू आदि ), घिसे हुई चन्दन, आदि सुगन्धों को लेकर उपस्थित हो।" वह शिष्य उसी प्रकार से करे ॥ ८ ॥ तमपस्थितमाज्ञाय शुभे शुचौ देशे प्राक्प्रवणे उदक्प्रवणे वा चतु- ष्किष्कुमात्रं चतुरस्रं स्थण्डिलं गोमयादकेनोपलिप्तं कुशास्तीर्णं सुपरिहितं परिधिभिश्चतुर्दिशंयथोक्त-चन्दनोदक-कुम्भ-क्षौम-हेम-हिरण्य-रजत-मणि- मुक्ता-विद्रुमालङ्कृतं मेध्य-भक्ष्य-गन्ध-शुक्ल-पुष्प-लाज-सर्षपाक्षतोपशो- भितं कृत्वा, तत्र पालाशीभिरैङ्गुदीभीर्माधुकीभिर्वा समिद्भिरग्निमुपसमा- धाय प्राङ्मुखः शुचिरध्ययनार्थाधमनुविधाय मधुसर्पिर्भ्यां त्रिस्त्रिर्जुहु- यादग्निमाशीःसंप्रयुक्तैर्मन्त्रैर्ब्रह्माणमग्निं धन्वन्तरिं प्रजापतिमश्विनाव- न्द्रमृषींश्च सूत्रकारानभिमन्त्रयमाणः पूर्वं स्वाहेति ॥ ९ ॥ दीक्षा—जिस समय अध्ययनार्थी शिष्य समिधा आदि वस्तुओं को लेकर आचार्य के पास उपस्थित हो उस समय एक समान एवं पवित्र स्थान में पूर्व या उत्तर दिशा में चार हाथ प्रमाण चौकोर जगह को गोबर और पानी से लेप कर इस पर कुशा बिछा दे । इसके चारों ओर से भली प्रकार वेष्टित कर दे । इसके चारों ओर चन्दन, पानी के घड़े, रेशम, स्वर्ण, चांदी, मणि, मुक्ता, मूँगा आदि पवित्र भक्ष्य, गन्ध, श्वेतपुष्प, लाजा, सरसों, अक्षत आदि वस्तुएं सजा देवे । इसमें पलाश ( ढाक ), इंगुदी ( हिंगोट ), गूलर,

५६० चरकसंहिता [ अ० ८ महुए आदि किसी एक वृक्ष की समिधाओं से अग्नि प्रज्वलित करके पवित्र एवं पूर्वमुख बैठ कर अध्ययन विधि ( वेदारम्भ विधि ) के अनुकूल आशीर्वाद में प्रयुक्त मन्त्रों द्वारा ब्राह्मण, अग्नि, धन्वन्तरि, प्रजापति, दो अश्वी, इन्द्र, और सूत्रकार ऋषियों ( भरद्वाज आदि ) को पहिले मन्त्रों से आह्वान करके स्वाहा शब्द के साथ मधु ( शहद ) और घी प्रत्येक से तीन तीन बार आहुति दे ॥ ६ ॥ शिष्यश्चैनमन्वालभेत, हुत्वा च प्रदक्षिणमग्निमनुपरिक्रामेत् । ततोऽनुपरिक्रम्य ब्राह्मणान् स्वस्ति वाचयेत्, भिषजश्चाभिपूजयेत् ॥ १०॥ आचार्य के होम कर चुकने पर पीछे शिष्य भी होम करे । हवन करके अग्नि की तीन परिक्रमा करे । पीछे ब्राह्मणों की परिक्रमा करके स्वस्तिवाचन करे और वैद्यों की पूजा करे ॥ १० ॥ अथैनमग्निसकाशे ब्राह्मणसकाशे भिषक्सकाशे चानुशिष्यात्— ब्रह्मचारिणा श्मश्रुधारिणा सत्यवादिनाऽमांसादेन मेध्यसेविना निर्म- त्सरेणाशस्त्रधारिणा च भवितव्यं, न च ते मद्वचनात्किंचिदकार्यं स्यादन्यत्र राजद्विष्टात्प्राणहराद्विपुलादधर्म्यादनर्थसंप्रयुक्ताद्वाऽप्यर्थात् मदर्पणेन मत्प्रधानेन मदधीनेन मत्प्रियहितानुवर्तिना च शश्वद् भवितव्यं, पुत्रवद्दासवर्द्धर्थिवच्चोपचरताऽनुवस्तव्योऽहमनुत्सुकेनावहिते- नानन्यमनसा विनीतेनावेक्ष्यकारिणाऽनसूयकेन, न चानभ्यनुज्ञातेन प्रविचरितव्यं, अनुज्ञातेन प्रविचरता पूर्वं गुर्वर्थोपान्वाहरणे यथा- शक्ति प्रयतितव्यं, कर्मसिद्धिमर्थसिद्धिं यशोलाभं प्रेत्य च स्वर्गमि- च्छता त्वया गोब्राह्मणमादौ कृत्वा सर्वप्राणभृतां शर्म्माऽऽशासितव्यम- हरहरुत्तिष्ठता चोपविशता च, सर्वात्मना चाऽऽतुराणामारोग्यं प्रयति- तव्यं, जीवितहेतोरपि चाऽऽतुरेभ्यो नाभिद्रोग्धव्यं, मनसाऽपि च पर- स्त्रियो नाभिगमनीयास्तथा सर्वमेव परस्वं, निभृतवेशपरिच्छदेन भवितव्यमशौण्डेनापापेनापापसहायेन च श्लक्ष्ण-शुक्ल-धर्म्य-धन्य-सत्य- शर्म्म-हित-मित-वचसा देशकालविचारिणा स्मृतिमत्ता ज्ञानोत्थानोपक- रणसंपत्सु नित्यं यत्नवता, नच कदाचिद्राजद्विष्टानां राजद्वेषिणां वा महाजनद्विष्टानां महाजनद्वेषिणां वाऽप्यौषधमनुविधातव्यं तथा सर्वे- षामत्यर्थ-विकृत-दुष्ट-दुःख-शीलाचारोपचाराणामनपवादप्रतीकाराणां मुमूर्षूणां च तथैवासंन्निहितेश्वराणां स्त्रीणामनध्यक्षाणां वा, नच कदा- चित्स्त्रीदत्तमामिषमादातव्यमननुज्ञातं भर्त्राऽथवाऽध्यक्षेण, आतुर- कुलं चानुप्रविशता त्वया विदितेनानुमतप्रवेशिना सार्धं पुरुषेण

अ० ८ ] ३६ विमानस्थानम् ५६१

अ० ८ ] ३६ विमानस्थानम् ५६१

सुसंवीतेनावाक्शिरसा स्मृतिमतो स्तिमितेनावेक्ष्यावेक्ष्य मनसा सर्व- माचरता बुद्ध्या सम्यगनुप्रवेष्टव्यं, अनुप्रविश्य च वाङ्मनोबुद्धीन्द्रि- याणि न क्वचित्प्रणिधातव्यान्यन्यत्राऽऽतुरादातुरोपकारार्थाद्वाऽऽतुरगतेष्व- न्येषु वा भावेषु, न चाऽऽतुरकुलप्रवृत्तयो बहिर्निश्चारयितव्याः, हसितं चाऽऽयुषः प्रमाणमातुरस्य न वर्णयितव्यं जानताऽपि तत्र यत्रोच्यमा- नमातुरस्यान्यस्य वाऽप्युपघाताय संपद्यते, विज्ञानवताऽपि च नात्यर्थ- मात्मानो ज्ञाने विकत्थितव्यं, आप्तादपि हि विकत्थमानादित्यर्थमुद्वि- जन्त्यनेके ॥ ११ ॥

आचार्य का शिष्य को उपदेश—इसके अनन्तर आचार्य उस शिष्य को अग्नि, ब्राह्मण और वैद्यों के समक्ष (इनके साक्षि रूप में) निम्न उपदेश देवे । तुझको ब्रह्मचारी, श्मश्रुधारी, सत्यवादी, पवित्रभोजी, मात्सर्यरहित, निरामिष- भोजी, निःशस्त्र होकर रहना चाहिये। तुझको मेरी आज्ञा से ही सब कुछ करना चाहिये, परन्तु राजविरुद्ध, प्राणनाशक, बहुत बड़ा अधर्म या अनर्थ का काम हो तो वह काम मेरी आज्ञा से भी नहीं करना चाहिये। तुझको मुझको अर्पण करके, मेरी प्रधानता से, मेरे अधीन रह कर, मेरे प्रिय और मेरे हितकारी रह कर सदा बरतना चाहिये। पुत्र पिता की, भृत्य स्वामी को, अर्थी धनी की जिस प्रकार से सेवा करते हैं, वैसे तुझे मेरी सेवा करनी चाहिये। उत्सुकता- रहित, दत्तचित्त, सावधान, एकाग्र मन से, नम्र होकर, बार २ देख कर कार्य करना चाहिये। तुझे निन्दा से रहित और मेरी आज्ञा से विचरना-घूमना चाहिये। मेरी आज्ञा से या बिना मेरी आज्ञा के घूमने पर भी तुझे प्रथम मुझ गुरु के लिये अर्थ (धन) लाने का प्रयत्न करना चाहिये। चिकित्सा कर्म में सफलता, धनप्राप्ति, यश-लाभ और परलोक में स्वर्ग की कामना से तुझे गो- ब्राह्मण का प्रथम संस्कार कर अन्य सब प्राणियों की मंगल कामना करना चाहिये। प्रति दिन उठते-बैठते, जागते सब अवस्थाओ में, सब समय में, सम्पूर्णरूप से रोगियों के कल्याण के लिये यत्नवान् रहना चाहिये (रोगी को दुःखित करके जीविका नहीं कमानी चाहिये)। मन से भी पर स्त्री की चाह न करनी चाहिये। इसी प्रकार दूसरे के धन को मन से भी नहीं चाहना चाहिये। विनीत (नम्र वेश) वस्त्रों वाला होना चाहिये (उद्धत वेश नहीं पहिनना चाहिये)। प्रमाद रहित, स्वयं पापरहित, तथा पापकर्म में साथी नहीं होना चाहिये। कोमल, निर्दोष, धर्मानुकूल, सुखकारक, सत्य, हितकारी, परिमित वाणी बोलने वाला तथा, देशकाल को विचार कर काम करने वाला,

१६२ चरकसंहिता [ अ० ८ स्मृतिमान् होना चाहिये। ज्ञान और अभ्युदय के उपकरणों को प्राप्त करने में सदा यत्नवान् रहना चाहिये। राजा जिनसे द्वेष करता है, अथवा जो राजा से द्वेष करते हैं, महाजन (बड़े आदमी), जिनसे द्वेष करते हैं, अथवा जो महाजनों से द्वेष करते हैं, उनकी चिकित्सा नहीं करनी चाहिये। इसी प्रकार जिनके शील (स्वभाव) और आचार अत्यन्त निकृष्ट और दुष्ट हों, अल्पवाद, प्रतिकार, धनरहित (जनपदोद्ध्वंस में कहे हुए) लोगों की तथा मरणोन्मुख रोगियों की चिकित्सा नहीं करनी चाहिये। इसी प्रकार जिन स्त्रियों का पति अथवा संरक्षक पास में न हो, उन की भी चिकित्सा नहीं करनी चाहिये। स्त्रियों से दिये धन को पति या संरक्षक के पूछे बिना कभी भी ग्रहण नहीं करना चाहिये, (उनकी आज्ञा से ही ग्रहण करना चाहिये)। रोगी के घर जाते समय चेतावनी देकर, आज्ञा मिलने पर दूसरे पुरुष के साथ उत्तम विनम्र वेश को पहिने हुए शिर को नीचे किये जाना चाहिये। जाते समय स्मृतिमान्, स्थिर मन से भली प्रकार-सोच विचार कर जो कुछ करना हो, भली प्रकार से घर में पहुंच कर करना चाहिये। घर में जा कर रोगी के उपकार के सिवाय रोगी से सम्बन्धित अथवा चिकित्सा से अतिरिक्त अन्य स्थानों में वाणी, मन, बुद्धि और इन्द्रियों को नहीं लगाना चाहिये। रोगी के घर के रहस्यों को बाहर नहीं करना चाहिये। जहाँ पर कहने से किसी अन्य प्राणी के मरने की सम्भावना हो, वहाँ पर मरणोन्मुख लक्षणों से रोगी की आयु का क्षय जानने पर भी नहीं कहना चाहिये। ज्ञानवान् होने पर भी अपने ज्ञान की प्रशंसा नहीं करनी चाहिये, क्योकि सत्यभाषी, आप्त, विद्वान् होकर भी अपने मुख से अपनी प्रशंसा करने वाले से अनेक लोग बहुत उद्विग्न हो जाते हैं ॥ १३ ॥ न चैव ह्यस्ति सुतरमायुर्वेदस्य पारं, तस्मादप्रमत्तः शश्वदभियो- गमस्मिन् गच्छेत्। एतच्च कार्यं, एवं भूयश्च वृत्तसौष्ठवमनसूयता परेभ्योऽप्यागमयितव्यं, कृत्स्नो हि लोको बुद्धिमतामाचार्यः। शत्रुश्चा- बुद्धिमताम्, अतश्चाभिसमीक्ष्य बुद्धिमताऽमित्रस्यापि धन्यं यशस्यमा- युष्यं पौष्टिकं लोकमभ्युपदिशतो वचः श्रोतव्यमनुविधातव्यं चेति।१४। आयुर्वेद ज्ञान की कहीं पर समाप्ति नहीं है। इसलिये इस आयुर्वेद के ज्ञान उपलब्ध करने में सदा प्रमादरहित होकर निरन्तर मनोयोग देवे। यहाँ कहे हुए कार्य सम्पूर्ण रूप से करने चाहिये। इस प्रकार करते हुए निन्दारहित होकर दूसरे लोगों से भी (शास्त्र के सिवाय) अन्य ज्ञान प्राप्त करना चाहिये। क्योंकि बुद्धिमानों का सम्पूर्ण संसार आचार्यवत् है और मूर्खों का वह शत्रु है। अतः

ठीक २ जान कर बुद्धिमान् मनुष्य को शत्रु के भी धन्य, यशकारी, आयुष्य, पौष्टिक और लौकिक वचन को सुनना चाहिये और तदनुसार करना चाहिये॥१२॥ अतः परमिदं ब्रूयात्—देवताग्नि-द्विजाति-गुरु-वृद्ध-सिद्धाचार्येषु ते नित्यं सम्यग्वर्तितव्यम् । तेषु ते सम्यग्वर्तमानस्यायमग्निः सर्वगन्धरस- रत्नबीजानि यथेरिताश्च देवताः शिवाय स्युः । अतोऽन्यथा वर्तमानस्या- शिवायति । इसके आगे निम्न प्रकार से उपदेश देवे—'देवता, अग्नि, ब्राह्मण, गुरु, वृद्ध, सिद्ध और आचार्य इनकी प्रतिदिन भली प्रकार से सेवा करनी चाहिये । इन देवताओं की भली प्रकार से सेवा करने पर यह तेरे सामने उपस्थित अग्नि सब प्रकार के गन्ध, रस, रत्न, बीज और पूर्वोक्त देवता आदि सब तेरे लिये मङ्गलकारी होंगे ।' एवं ब्रुवति चाऽऽचार्ये शिष्यस्तथेति ब्रूयात् । तद्यथोपदेशं च कुर्वन्न- ध्याप्यो ज्ञेयः, अतोऽन्यथा त्वनध्याप्यः । अध्याप्यमध्यापयन् ह्याचार्यो यथोक्तैरध्यापनफलैर्योगमाप्नोत्यन्यैश्चानुक्तैः श्रेयस्करैर्गुणैः शिष्यमा- त्मानं च युनक्ति । इत्युक्तावध्ययनाध्यापनविधी यथावत् ॥ १३ ॥ इस प्रकार से आचार्य के कहने पर शिष्य भो 'तथास्तु' कह कर स्वीकार करे । आचार्य उपदेशानुसार करने वाले शिष्य को पढ़ावे और न करने वाले को नहीं पढ़ावे । पढ़ाने के योग्य शिष्य को पढ़ाने से ही आचार्य को अध्या- पन-कार्य का योग्य फल उचित लाभ मिलता है और यहाँ न कहे हुए दूसरे, अनेक श्रेयस्कर गुणों से शिष्य को और अपने को भी युक्त करता है । इस प्रकार अध्ययन और अध्यापन विधि कह दी ॥ १३ ॥ अध्ययनाध्यापनविधिवत्संभाषाविधिमत ऊर्ध्वं व्याख्यास्यामः— भिषक् भिषजा सह संभाषेत, तद्विद्यसंभाषा हि ज्ञानाभियोगसंहर्षकरी भवति, वैशारद्यमपि चाभिनिर्वर्तयति, वचनशक्तिमपि चाऽऽधत्ते, यशश्चा- भिदीपयति, पूर्वश्रुते च संदेहवतः पुनः श्रवणात् संशयमपकर्षति, श्रुते चासंदेहवतो भूयोऽध्यवसायमभिनिर्वर्तयति, अश्रुतमपि च कंचिदर्थं श्रोत्रविषयमापादयति, यच्चाऽऽर्थः शिष्याय शुश्रूषवे प्रसन्नः क्रमेणो- पदिशति गुह्याभिमतमर्थजातं तत्परस्परेण सह जल्पन् पिण्डेन विजि- गीषुराइ संहर्षात्, तस्मात्तद्विद्यसंभाषामभिप्रशंसन्ति कुशलाः ॥ १४ ॥ संभाषणविधि—अध्ययन-अध्यापन विधि के समान ही अब संभाषणविधि का वर्णन करते हैं । वैद्य वैद्य के साथ संभाषण करे । क्योंकि उसी विद्या को

५६४ चरकसंहिता [ अ० ८ जानने वाले के साथ संभाषण करने से ज्ञान और हर्ष को प्राप्त करता है, ज्ञान की चतुरता उत्पन्न करता है, बोलने की शक्ति पैदा करता है, यश को बढ़ाता है, अध्ययन काल में पहिले सुने शब्द या अर्थ में जरा संदेह होता है, उसको मिटाता है । और संदेह रहित वस्तु में और भी अधिक दृढ़ निश्चय कर लेता है अध्ययन काल में गुरुमुख से न सुना हुआ भी कुछ विषय यहां पर सुनने में आता है और आचार्य की सेवा करने वाले शिष्य के लिये जो गोपनीय वस्तु ( अर्थ ) प्रसन्न होकर गुरु बताता है, उस गोपनीय बात को यह दूसरे के साथ शास्त्रार्थ करते हुए अपनी विद्वत्ता दिखाने के लिये, जीतने की इच्छा से सार रूप में प्रसन्नतापूर्वक प्रकट कर देता है । इसलिये बुद्धिमान् लोग उस विद्या में निपुण विद्वान् से संभाषण करने की प्रशंसा करते हैं ॥ १४ ॥ द्विविधा तु खलु तद्विद्यसंभाषा भवति—संधाय संभाषा, विगृह्य सम्भाषा चेति ॥ १५ ॥ 'तद्विद्य-संभाषण' अर्थात् उस विद्या के वेत्ता पुरुष से भाषण दो प्रकार का है । ( १ ) संधाय संभाषा—संधि अर्थात् परस्पर मेल करके प्रेमपूर्वक संभाषण करना, अनुलोम संभाषण है । ( २ ) विगृह्य संभाषा—विग्रह करके, दूसरे को पराजित करने के अभिप्राय से संभाषण करना प्रतिलोम-संभा- षण है ॥ १५ ॥ तत्र ज्ञान-विज्ञान-वचन-प्रतिवचन-शक्ति-संपन्नेनाकोपनेनोपस्कृतवि- द्येनानसूयकेनानुनेयेनानुनेयकोविदेन क्लेशक्षमेण प्रियसम्भाषणेन च सह संधाय संभाषा विधीयते । तथाविधेन सह कथयन्विस्त्रब्धः कथयेत्, पृच्छेद्धि च विस्रब्धः, पृच्छते चास्मै विस्रब्धाय विशदमर्थं ब्रूयात्, न च निग्रहभयादुद्विजेत, निगृह्य चैनं न हृष्येन्न च परेषु विकत्थेत्, नच मोहादेकान्तग्राही स्यात्, न चाविदितमर्थं तमनुवर्णयेत्; सम्यक् चानुन- येनानु नयेच्च, अनुनये तत्र चावहितः स्यादित्यनुलोमसंभाषा- विधिः ॥ १६ ॥ अनुलोम संभाषण की विधि— ज्ञान ( शास्त्रज्ञान ), विज्ञान, वचन ( पूर्व- पक्ष ), प्रतिवचन ( उत्तरपक्ष ) कहने में समर्थ, क्रोध से रहित, अविकृत विद्या वाले, अनिन्दक, अनुनय के योग्य, अनुनय को जानने वाले, क्लेशसहिष्णु, प्रिय बोलने वाले पुरुष के साथ सन्धि करके संभाषण करते हुए विश्वासपूर्वक ( बिना संकोच या भय के ) बातचीत करे और जो कुछ पूछना हो वह विश्वा- सपूर्वक पूछे । इस प्रकार के पुरुष के आगे पराजय के भय से न घबराए और

अ० ८ ] विमानस्थानम् ५६५

अ० ८ ] विमानस्थानम् ५६५ स्वयं भी प्रतिवादी का पराजय करके प्रसन्न न हो। दूसरों के आगे अपनी डींग न करे, अपनी प्रशंसा नहीं करे। मोहवश केवल लेने वाला ही न बने। न जाने हुए विषय का वर्णन नहीं करे। प्रतिवादी से किये अनुनय के सामने विनीत होवे। दूसरे के अनुनय में सावधान रहे। यह 'अनुलोम-संभाषण विधि' है ॥ १६ ॥ अत ऊर्ध्वमितरेण सह विगृह्य संभाषायां जल्पेत् श्रेयसा योगमा- त्मनः पश्यन्; प्रागेव च जल्पाज्जल्पान्तरं परावरान्तरं परिषद्विशेषांश्च सम्यक्परीक्षेत। सम्यक् परीक्षा हि बुद्धिमतां कार्यप्रवृत्तिनिवृत्तिकालौ शंसति, तस्मात्परीक्षामभिप्रशंसन्ति कुशलाः। परीक्षमाणस्तु खलु परा- वरान्तरमिमाञ्जल्पकगुणान् श्रेयस्करान् दोषवतश्च परीक्षेत सम्यक्। तद्यथा—श्रुतं विज्ञानं धारणं प्रतिभानं वचनशक्तिरित्येतान् गुणान् श्रेयस्करानाहुः। इमान्पुनर्दोषवतः, तद्यथा-कोपस्तमवैशारद्यं भीरु- त्वमधारणत्वमनवहितत्वमिति। एतान्द्वयानपि गुणान् गुरुलाघवतः परस्य चैवाऽऽत्मनश्च तोलयेत् ॥ १७ ॥ विगृह्य-संभाषा—इसके अनन्तर 'विगृह्य संभाषा' का वर्णन करते हैं। पुरुष अपना श्रेय (विद्योत्कर्ष आदि) योग देखता हुआ प्रतिवादी के साथ 'विगृह्य संभाषण' करे। इसमें जल्प (वाद-विवाद) से पूर्व ही जल्प के लक्षण, जल्प के गुण दोष, प्रतिवादी और अपने गुण दोष, और परिषद् के गुण दोषों को भली प्रकार से देख लेवे। क्योंकि भली प्रकार की हुई परीक्षा बुद्धिमानों को कार्य में प्रवृत्त होने और निवृत्त होने का काल बता देती है। इसलिये कुशल लोग परीक्षा की प्रशंसा करते हैं। अपने और प्रतिवादी के गुण-दोषों की परीक्षा करने में, इन श्रेयस्कर और अश्रेयस्कर जल्पगुणों की परीक्षा करनी चाहिये। जैसे—गुरुमुख से शास्त्र का श्रवण, विज्ञान, (अवबोध), धारण (मन से धारण करना), प्रतिभान (प्रतिभा, प्रत्युत्पन्नमति) और बोलने की शक्ति का होना—इन गुणों को श्रेय- स्कर कहते हैं और इन निम्नलिखित गुणों को अश्रेयस्कर अर्थात् दोषयुक्त कहते हैं। जैसे—क्रोध करना, अपाण्डित्य, भीरुता, अन- भ्यास दत्तचित्त न होना, ये दोष हैं। इन दोनों प्रकार के गुणों को अपने में तथा प्रतिवादी में तुलना करके न्यून-अधिक रूप से देखना चाहिये ॥१७॥ तत्र त्रिविधः परः संपद्यते, -प्रवरः प्रत्यवरः समो वा गुणविनिश्चे- पतः, नत्वेव कात्स्न्र्येन ॥ १८ ॥

५६६ चरकसंहिता [अ० ८ इनमें प्रतिवादी तीन प्रकार का होता है—(१) प्रवर (उत्तम), (२) प्रत्यवर (हीन) और (३) सम (समान)। ये भेद श्रुत, विज्ञान आदि गुणों के परिमाण से होते हैं, कुल, शील आदि भेद से नहीं ॥ १८॥ परिषत्तु खलु द्विविधा,-ज्ञानवती, मूढपरिषद्व; सेव द्विविधा सती त्रिविधा पुनरनेन कारणविभागेन-सुहृत्परिषद्, उदासीनपरिषद, प्रति- निविष्टपरिषद्चेति ॥ १६ ॥ परिषद् अर्थात् सभा दो प्रकार की होती है, ज्ञानवती और मूढ। यही दो प्रकार की परिषद् शत्रु, मित्र और उदासीन कारण से तीन प्रकार की हो जाती है। (१) सुहृत्परिषद्, (२) उदासीन-परिषद्, (३) प्रतिकूल-निविष्टपरिषत् (विरोधियों की परिषद्) ॥ १६ ॥ तत्र प्रतिनिविष्टायां परिषदि ज्ञान-विज्ञान-वचन-प्रतिवचन शक्तिसंप- न्नायामपि मूढायां वा न कथंचित्केनचित्सह जल्पो विधीयते, मूढायां तु सुहृत्परिषदि उदासीनायां वा ज्ञान-विज्ञान-वचन-प्रतिवचन-शक्तिमन्त- रेणाप्यदीप्रयशसा महाजनद्विष्टेन सह जल्पो विधीयते, तद्दिष्टेन च सह कथयता आविद्धदीर्घसूत्रसंकुलैर्वाक्यदण्डकैः कथयितव्यं, अतिहृष्टं मुहु- र्मुहुरुपहसता परं, निरूपयता च परिषदमाकारैः, ब्रुवता चास्य वाक्यावका- शो न देयः। कष्टशब्दं च ब्रुवता वक्तव्यो 'नोच्यते' इति, अथवा पुनः 'हीना ते प्रतिज्ञा'इति, पुनश्चाऽऽहूयमानः प्रतिवक्तव्यः-‘परिसंवत्सरो भव, शिक्ष- स्व तावत्, पर्याप्तमेतावत्ते', सकृदपि हि परिक्षेप्तिकं निहतं निहतमाहु- रिति नास्य योगः कर्तव्यः कथंचित्; अप्येवं श्रेयसा सह विगृह्य वक्तव्य- मित्याहुरेके; न त्वेवं ज्यायसा सह विग्रहं प्रशंसन्ति कुशलाः ॥ २० ॥ इनमें से शत्रु-परिषद् अथवा मूढ़-परिषत् में ज्ञान-विज्ञान, वचन-प्रतिवचन की शक्ति होने पर भी किसी उत्तम, हीन वा समान व्यक्ति के साथ किसी भी प्रकार से जल्प (विवाद) नहीं करना चाहिये। मूढ़परिषद् में, वा मित्रपरि- षद् में, या उदासीन-परिषद् में ज्ञान-विज्ञान और वचन-प्रतिवचन शक्ति के बिना भी, प्रज्वलित कीर्ति से रहित और अनेक जनों के द्वेषपात्र (जिसका पक्ष कोई नहीं करे) ऐसे पुरुष के साथ जल्प किया जा सकता है। इस प्रकार के पुरुष के साथ संभाषण करते हुए, टेढ़ेमेढ़े लम्बे सूत्रों से युक्त लम्बे २ वाक्यों से भाषण करना चाहिये। खूब प्रसन्न होते हुए, प्रतिवादी की बार-बार हंसी करते हुए, आकार-चेष्टा आदि से परिषद् का ध्यान खींचते हुए और बोलने को उद्यत हुए प्रतिवादी को बोलने का अवसर नहीं देना चाहिये। दुर्बोध अर्थ या

अ० ८ ] विमानस्थानम् ५६७

अ० ८ ] विमानस्थानम् ५६७ वाक्य को कहते हुए उससे बोलने के लिये कहना चाहिये कि 'नहीं कहते अथवा तेरी प्रतिज्ञा हीन है।' और यदि वह फिर वाद-विवाद के लिये बुलावे तो उसको कहना चाहिये कि—"एक साल और अधिक गुरु के पास पढ़, तेरे लिये इतना ही पर्याप्त है।" एक बार पराजित हुए प्रतिवादी को पराजित ही कहते हैं। अतः फिर इसके पक्ष का ग्रहण नहीं करना चाहिये । एक बार प्रति- पक्षी को पराजित करके पुनः उसे अवसर नहीं देना चाहिये । कुछ आचार्यों का मत है कि इस प्रकार अपने से श्रेष्ठ से भी प्रतिलोम जल्प कर लेना चाहिये परन्तु बुद्धिमान् मनुष्य अपने से श्रेष्ठ के साथ प्रतिलोम (विगृह्य) संभाषण की इच्छा नहीं करते ॥ २० ॥ प्रत्यवरेण तु सह समानाभिभतेन वा विगृह्य जल्पतः सुहृत्परिषदि कथयितव्यं, अथवाऽप्युदासीनपर्षदि अवधान-श्रवण ज्ञान-विज्ञानापधा- रण-वचन-शक्ति-संपन्नायां कथयता चावहितेन परस्य साद्गुण्यदोषबलम- वेक्षितव्यं; संवेक्ष्य च यत्रेमं श्रेष्ठं मन्येत, नास्य तत्र जल्पं योजयेदना- विष्कृतमयोगं कुर्वन्; यत्र त्वेनमवरं मन्येत तत्रैवेनमाशु निगृह्णीयात् । अपने से हीन या अपने समान प्रतिवादी के साथ सुहृत्परिषद्, उदासीन परिषद् या मूढ़ परिषद् में विगृह्य संभाषण करना चाहिये । अथवा उदासीन परिषद् में अवधान, श्रवण, ज्ञान, विज्ञान, उच्चारण, वचन, प्रतिवचन शक्ति, आदि गुणों तथा क्रोध आदि दोषों की अपने में और दूसरे में तुलना करके सावधानी से संभाषण करना चाहिये और परीक्षा करके जिस बात में प्रतिवादी को अपने से श्रेष्ठ समझे, उस विषय में अपनी अयोग्यता को प्रकट न करते हुए जल्प का प्रयोग नहीं करना चाहिये और जिस विषय में प्रतिवादी को अपने से हीन समझे, उसमें इसको शीघ्रता से पकड़ लेना चाहिये । तत्र खल्विमे प्रत्यवराणामाशु निग्रहे भवन्त्युपायाः; तद्यथा—श्रुत- हीनं महता सूत्रपाठेनाभिभवेत्, विज्ञानहीनं पुनः कष्टशब्देन वाक्येन, वाक्यधारणाहीनमाविद्धदीर्घसूत्रसंकुलैर्वाक्यदण्डकैः, प्रतिभाहीनं पुन- र्वचनेनैकविधेनानेकार्थवाचिना, वचनशक्तिहीनमर्धोक्तस्य वाक्यस्याऽऽ- क्षेपेण, अविशारदमपह्नपेण, कोपनमायासेनेन, भीरुं वित्रासनेन, अन- वहितं नियमेन । इत्येवमेतैरुपायैः परमवरमभिभवेत् ॥ २१ ॥ प्रतिवादी को शीघ्र निग्रह करने के लिये निम्न उपाय हैं। जैसे—जिसने शास्त्र न पढ़ा हो उसको बड़े लम्बे २ सूत्र सुना कर पराजित करे । विशेष ज्ञान से हीन अतिदुर्बोध अर्थ वाले, क्लिष्ट शब्दों से बने वाक्यों का प्रयोग करे ।

५६८ चरकसंहिता [अ० ८ अनभ्यस्त शास्त्र वाले या अल्पबुद्धि के लिये वक्र, लम्बे २ सूत्रों से बने वाक्यों का प्रयोग करे। प्रतिभा से हीन के लिये अनेकार्थवाची, अनेक प्रकार के वचनों का प्रयोग करे। वचन-शक्ति से हीन को आधे ही वाक्य पर टोक दे। अपण्डित या अचतुर को (जिसने कभी पहिले सभा नहीं देखी हो) लज्जाजनक वाक्यों से पराजित करना चाहिये, क्रोधी व्यक्ति को तंग करके, डरपोक को भय दिखला कर, जो सावधान न हो उसको मन के नियमन करने वाले वचनों से पराजित करे। इन नाना उपायों द्वारा प्रतिवादी का शीघ्र पराजय करे ॥२१॥ तत्र श्लोकौ—विगृह्य कथयेद्युक्त्या युक्तं च न निवारयेत् । विगृह्यभाषा तीव्रं हि केषांचिद् द्रोहमावहेत् ॥ २२ ॥ नाकार्यमस्ति क्रुद्धस्य नावाच्यमपि विद्यते। कुशला नाभिनन्दन्ति कलहं सहिताः सताम् ॥ २३ ॥ एवं प्रवृत्ते वादे कुर्यात् ॥ २४ ॥ प्रतिलोम संभाषण करने का प्रकार—दूसरे के साथ विगृह्य-संभाषण करते हुए युक्तिपूर्वक भाषण करे। युक्ति प्रमाणानुकूल दूसरे के वचन का निषेध नहीं करे। जल्प कई पुरुषों में तीव्र क्रोध उत्पन्न कर देता है। क्रुद्ध व्यक्ति के लिये कुछ भी अकार्य नहीं होता, वह कुछ भी कर सकता है। उसके लिये कुछ भी अवाच्य नहीं, वह सब कुछ बुरा-भला भी कह सकता है। इसलिये बुद्धिमान् पुरुष सज्जनों की सभा में कलह को अच्छा नहीं समझते। वाद चलने पर इस प्रकार करे ॥ २२-२४ ॥ प्रागेव तावदिदं कर्तुं यतेत—संधाय परिषदाऽयनभूतमात्मनः प्रक- रणमादेशयितव्यं यद्वा परस्य भृशदुर्गं स्यात्, पक्षमथवा परस्य भृशं विमुखमानयेत् परिषदि, परिषदि चोपसंहितायामशक्यमस्माभिर्वक्तुम्, एषैव ते परिषदयथेष्टं यथायोगं यथाभिप्रायं वादं वादमर्यादां च स्थाप- यिष्यतीत्युक्त्वा तूष्णीमासीत ॥ २५ ॥ वाद प्रारम्भ होने से पूर्व निम्न बातें करने का यत्न करे। यथा—परिषद् (सभ्यों) से मिलकर अपने अभ्यास किये हुए प्रकरण या विषय का निर्देश करे। अथवा जो प्रकरण वा विषय दूसरे को बहुत दुर्बोध हो उसे कहे अथवा दूसरे का पक्ष जो बहुत अधिक झगड़ा उत्पन्न करने वाला हो, वहां पर सभ्यों के बीच कहे। यदि परिषद् अपने विरोध में जान पड़े तो कहे कि—'इस परि- षद् को तो तुमने पहिले ही मिलकर अपने पक्ष में कर लिया है, इसलिये हमारा बोलना असम्भव है। यह तो तुम्हारी घर की ही सभा है। जैसा चाहोगे, जैसा

अ० ८ ] विमानस्थानम् ५६६

अ० ८ ] विमानस्थानम् ५६६ बने, जैसा अभिप्राय हो, वह वैसा वाद, और वैसी वाद-मर्यादा को स्थापित करेगी,—ऐसा कह कर चुप हो जाये ॥ २५ ॥ तत्रे॒दं वादमर्यादालक्षणं भवति—इदं भवति वाच्यमिदमवाच्य- मेवं सति पराजितो भवतीति ॥ २६ ॥ वाद की मर्यादा—यह कहना, यह नहीं कहना, इस प्रकार से पराजय होता है, यह तीन वाद-मर्यादा के लक्षण कहाते हैं ॥२६॥ इमानि तु खलु पदानि वादमार्गज्ञानार्थमधिगम्यानि भवन्ति । तद्यथा—वादः, द्रव्यं, गुणाः, कर्म, सामान्यं, विशेषः, समवायः, प्रतिज्ञा, स्थापना, प्रतिष्ठापना, हेतुः, दृष्टान्तः, निगमनं, उत्तरं, सिद्धान्तः, उपनयः, शब्दः, प्रत्यक्षं, अनुमानमैतिह्यमौपम्यं, संशयः, प्रयोजनं, सव्यभिचारं, जिज्ञासा, व्यवसायः, अर्थप्राप्तिः, संभवः, अनुयोज्यं, अननुयोज्यं, अनुयोगः, प्रत्यनुयोगः, वाक्यदोषः, वाक्यप्रशंसा, छलम्हेतुरतीतकालमुपालम्भः, परिहारः, प्रतिज्ञाहानिरभ्यनुज्ञा, हेत्वन्तरमर्थान्तरं, निग्रहस्थानमिति ॥ २७ ॥ वाद के मार्ग को समझने के लिये वैद्यों को निम्न चवालीस बातें समझ लेनी चाहियें । यथा—वाद, द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय, प्रतिज्ञा, स्थापना, प्रतिष्ठापना, हेतु, दृष्टान्त, उपनय, निगमन, उत्तर, सिद्धान्त, शब्द, प्रत्यक्ष, अनुमान, ऐतिह्य, औपम्य, संशय, प्रयोजन, सव्यभिचार, जिज्ञासा, व्यवसाय, अर्थप्राप्ति, संभव, अनुयोज्य, अननुयोज्य, अनुयोग, प्रत्य- नुयोग, वाक्यदोष, वाक्यप्रशंसा, छल, हेतु, अतीतकाल, उपालम्भ, परिहार, प्रतिज्ञाहानि, अभ्यनुज्ञा, हेत्वन्तर, अर्थान्तर और निग्रहस्थान ॥ २७ ॥ तत्र वादो नाम—यत् परः परेण सह शास्त्रपूर्वकं विगृह्य कथयति । स वादो द्विविधः संग्रहेण—जल्पो वितण्डा च । तत्र पक्षाश्रितयोर्वचनं जल्पः, विपर्ययो वितण्डा । यथा—एकस्य पक्षः—पुनर्भवोऽस्तीति, नास्तीत्यपरस्य । तौ च हेतुभिः स्वस्वपक्षं स्थापयतः, परपक्षमुद्भावयतः, एष जल्पः । जल्पविपर्ययो वितण्डा, वितण्डा नाम—परपक्षे दोष- वचनमात्रमेव ॥ २८ ॥ वाद का लक्षण—शास्त्र के अनुसार जो परस्पर विगृह्य भाषण है वह वाद ॐ कहाता है । यह संक्षेप से दो प्रकार का है । जल्प और वितण्डा । इनमें ॐ वाद का लक्षण—'प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भः सिद्धान्ताविरुद्धः पञ्चा- वयवोपपन्नः पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहो वादः । न्यायदर्शन १ । २ । ४२ ।