भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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५६२ चरकसंहिता [अ० ८ स्थिरशरीराः सान्द्रत्वादुपचितपरिपूर्णसर्वगात्राः मन्दत्वान्मन्द- चेष्टाहारविहाराः, स्तैमित्यादशीघ्रारम्भाल्पक्षोभविकाराः, गुरुत्वा- त्साराधिष्ठितावस्थितगतयः, शैत्यादल्पक्षुत्तृष्णासंतापस्वेददोषाः, पिच्छि- लत्वात् सुश्लिष्टसारसन्धिबन्धनाः, तथाऽच्छत्वात्प्रसन्नदर्शनाननाः प्रसन्नवर्णस्वराश्च । त एवंगुणयोगाच्छ्लेष्मला बलवन्तो वसुमन्तो वि- द्यावन्त ओजस्विनः शान्ता आयुष्मन्तश्च भवन्ति ॥ ९८ ॥ श्लेष्मा—कफ स्निग्ध, श्लक्ष्ण, मृदु, मधुर, सार, सान्द्र, मन्द, स्तिमित (घट्ट), गुरु, शीत, पिच्छिल और निर्मल होता है । कफ के स्नेह गुण के कारण श्लेष्मप्रकृति के मनुष्य स्निग्ध अंगों वाले श्लक्ष्ण होने से चिकने अंग वाले, कोमल होने से आंखों को आनन्ददायक, सुकुमार, गौरवर्ण होते हैं । मधुरता होने से अधिक शुक्र, मैथुनशक्ति और संतान वाले होते हैं । सार के कारण इनका शरीर संहत, दृढ़, स्थिर होता है । सान्द्रता के कारण से पुष्ट, सम्पूर्ण अंगों वाले; मन्द होने से चेष्टा, आहार और विहार में धीमे; स्तैमित्य (आलस्य) होने से देर में वाणी, मन शरीर के कार्य करने वाले एवं क्षोभ तथा मानस विकार वाले, गुरु होने के कारण हाथी के समान मन्द-मस्त चाल वाले, शीतता के कारण थोड़ी, भूख, प्यास, संताप तथा पसीने के दोष वाले; पिच्छिल होने से इनके मांसादि तथा सन्धि-बन्धन अच्छी प्रकार से संयुक्त होते हैं । निर्मल होने से प्रसन्नमुख, प्रसन्न और स्निग्ध वर्ण तथा स्वर वाले होते हैं। इन गुणों के कारण कफप्रकृति के मनुष्य बलवान्, धनवान्, विद्यावान्, ओजस्वी, शान्त और दीर्घायु होते हैं ॐ ॥ ९८ ॥ पित्तमुष्णं तीक्ष्णं द्रवं विस्रमम्लं कटुकं च तस्यौष्ण्यात्पित्तला भवन्ति उष्णसहाः, उष्णमुखाः, सुकुमारावदातगात्राः, प्रभूत- पिप्लुव्यङ्गतिलपिटकाः, क्षुत्पिपासावन्तः, क्षिप्रवलीपलितखालि- त्यदोषाः, प्रायो मृद्वल्पकपिलश्मश्रुलोमकेशाः, तैक्ष्ण्यात्तीक्ष्णपरा- क्रमाः, तीक्ष्णाग्नयः, प्रभूताशनपानाः, क्लेशासहिष्णवो, दन्दशूकाः; द्रवत्वाच्छिथिलमृदुसन्धिवन्धमांसाः, प्रभूतासृष्टस्वेदमूत्रपुरीषाश्च; विस्रत्वात्प्रभूतपूतिकक्षास्यशिरःशरीरगन्धाः; कट्वम्लत्वादल्पशुक- व्यवायापत्याः; त एवंगुणयोगात्पित्तला मध्यबला मध्यायुषो मध्यज्ञान- विज्ञानवित्तोपकरणवन्तश्च भवन्ति ॥ ९९ ॥ पित्त—उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, विस्र (सड़ी गन्ध वाला), अम्ल-कटु रस ॐ देखिये सुश्रुत शारीरस्थान ४र्थ अध्याय में इनके लक्षण