भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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अ० ८] ३८ विमानस्थानम् ५६३ होता है। पित्त के उष्ण होने से पित्त-प्रकृति के मनुष्य उष्णिमा को न सहने वाले, शुष्क, कठोर, पीले शरीर वाले, बहुत पिप्लु (फुन्सियों), व्यंग (मुख व्यंग) और तिलपिड़का वाले, अधिक भूख और प्यास वाले होते हैं, इनके बाल शीघ्र ही पक जाते, गिर जाते हैं, तथा मुंह पर झुर्रियां आजाती हैं। ये प्रायः कोमल, थोड़ी एवं धूसर वर्ण दाढ़ी-मूंछ वाले, अल्प लोम तथा अल्पक्रोध वाले होते हैं। तीक्ष्ण गुण के कारण-तीक्ष्ण पराक्रम वाले, तीक्ष्ण अग्नि वाले, बहुत खाने पीने वाले, क्लेश को न सहन करने वाले, दन्दशूक अर्थात् बार-बार खाने वाले होते हैं। द्रव होने से-शिथिल एवं मृदु सन्धिनन्ध तथा मांस वाले होते हैं। इनको स्वेद-मूत्र और मल बहुत अधिक मात्रा में आता है। पित्त के अति दुर्गन्धयुक्त होने से इनके बाल, मुख, शिर और शरीर से बहुत दुर्गन्ध आती है। कटु अल्प होने से थोड़े शुक्र, मैथुन और न्यून संतान वाले होते हैं। इन गुणों के कारण पित्त प्रकृति का मनुष्य मध्यम बल, मध्यम आयु, मध्यम ज्ञान विज्ञान, मध्यम वित्त और मध्यम उपकरणों वाले होते हैं ॥९६॥ वातस्तु रूक्ष-लघु-चल-बहुशीघ्र-शीत-परुष-विशदः। तस्य रौक्ष्याद्वातला रूक्षापचिताल्पशरीराः, प्रतत-रूक्ष-क्षाम-भिन्न-मन्द-सक्त-जर्जर-स्वराः, जागरूकाश्च भवन्ति। लघुत्वाच्च लघु-चपल-गति-चेष्टाहार-व्यवहाराः चलत्वादनवस्थित-सन्ध्यस्थि-भ्रू-हन्वोष्ठ-जिह्वा-शिरः-स्कन्ध-पाणि-पादाः बहुत्वाद् बहुप्रलाप-कण्डरा-सिरो-वितानाः। शीघ्रत्वाच्छीघ्रसमारम्भ- क्षोभविकाराः, शीघ्रोत्त्रासरागविरागाः, श्रुतग्राहिणोऽल्पस्मृतयश्च। शैत्याच्छीतासहिष्णवः, प्रततशीतकोद्वेपकस्तम्भाः। पारुष्यात्परुष-केश- श्मश्रु-रोम-नख-दशन-वदन-पाणि-पादाङ्गाः। वैशद्यात्स्फुटिताङ्गावयवाः, सततसंधिशब्दगामिनश्च भवन्ति। त एवंगुणयोगाद्वातलाः प्रायेणाल्प- बलाश्चाल्पायुषश्चाल्पापत्याश्चाल्पसाधनाश्चाधनाश्च भवन्ति ॥ १०० ॥ वायु—रूक्ष, लघु, चल, प्रमाणादि भेद से अनेक प्रकार की, शीघ्रकारी, शीत, परुष, विशद (अपच्छिल) होती है। वायु के रूक्ष होने से वात प्रकृति के मनुष्य भी रूक्ष, कृश, एवं छोटे शरीर वाले, निरन्तर रूक्ष, क्षीण, फटे बांस के समान जर्जर, असंहत स्वर वाले, जागरणशील (थोड़ी नींद वाले) होते हैं। लघु होने से-शीघ्रकारी, अस्थिर गति, चेष्टा, आहार, व्यवहार वाले होते हैं। वात के चल होने से उनके भी सन्धि आँख, भौं, हनु, जबड़ा, ओठ, जीभ, कंधा, हाथ-पाँव अस्थिर होते हैं। बहुत प्रकार का होने से, बहुत बोलने वाले, बहुत सिराओं के जाल वाले; शीघ्रगामी होने से सब कामों में जल्दी करने वाले,