भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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५६४ चरकसंहिता [ अ० ८ क्षोभ और मन के विकार वाले, जल्दी ही डरने वाले, स्नेह और द्वेष करने वाले, सुनते ही ग्रहण करने वाले, परन्तु स्मृति ( याददास्त ) के कच्चे होते हैं । शीतल होने से शीत को न सहन करने वाले, निरन्तर शीत, कम्प और उद्वेग तथा स्तम्भवृत्ति ( जड़ ) बने रहते हैं । कठोरता से—कठिन केश, श्मश्रु, लोम, नख, दाँत, मुख, हाथ, पांव वाले होते हैं। वायु के विशद होने से उनके हाथ-पाँव फटते हैं, सन्धि बन्धनों में से निरन्तर शब्द निकला करता है, सन्धियाँ चलती रहती हैं, चैन से नहीं बैठते, कुछ न कुछ करते ही रहते हैं। इन गुणों के कारण वात प्रकृति के मनुष्य प्रायः अल्प बल, अल्प आयु, अल्पसंतान, अल्प साधन और अल्प धन वाले होते हैं ॥ १०० ॥ संसर्गात्संसृष्टलक्षणाः। सर्वगुणसमुदितास्तु समधातवः। इत्येवं प्रकृतिनः परीक्षेत ॥ १०१ ॥ दोषों के मिश्रित होने से लक्षण भी मिले जुले होते हैं। सब गुणों के मिलने से समधातुप्रकृति के होते हैं। इस प्रकार प्रकृति से परीक्षा करनी चाहिये ।१०१। विकृतितश्चेति—विकृतिरुच्यते विकारः। तत्र विकारं हेतु-दोष- दूष्य-प्रकृति-देश-काल-बल-विशेषैर्लिङ्गतश्च परीक्षेत, न ह्यन्तरेण हेत्वा- दीनां बलविशेषं व्याधिबलविशेषोपलब्धिः। यस्य हि व्याधेर्दोष-दूष्य- प्रकृति-देश-काल-बल-साम्यं भवति, महच्च हेतु लिङ्गबलं स व्याधिर्बल- वान् भवति । तद्विपर्ययाच्चाल्पबलः, मध्यबलस्तु दोषादीनामन्यतम- सामान्याद्धेतुलिङ्गमध्यबलत्वाच्चोपलभ्यते ॥ १०२ ॥ विकृति से परीक्षा करनी चाहिये। विकृति का अर्थ विकार है। धातुओं की विषमता का नाम 'विकार' है। इसकी हेतु, दूष्य, (रक्त आदि), दोष (वात आदि), प्रकृति (वात-प्रकृति आदि), देश, काल के बल तथा पूर्वरूप से परीक्षा करनी चाहिये। हेतु आदि के बल विशेष को जाने बिना रोग के विशेष बल का ज्ञान नहीं होता। जिस रोग में दोष, दूष्य, प्रकृति, देश, काल, समान हों तथा हेतु और पूर्वरूप के लक्षण भी बलवान् हों, उस रोग को बलवान् समझना चाहिये। इस लिये यह असाध्य है। इनसे विपरीत हो तो निर्बल सम- झना चाहिये। जिस रोग में दोष-दूष्य आदि में से कोई एक असमान हो, तथा हेतु और पूर्वरूप के लक्षण भी मध्यम बल हो तो उस रोग को मध्यम बल समझना चाहिये ॥१०२॥ सारतश्चेति—साराण्यष्टौ पुरुषाणां बलमानविशेषज्ञानार्थमुप- दिश्यन्ते। तद्यथा—त्वग्रक्त-मांस-मेदोस्थि-मज्ज-शुक्र-सत्त्वानि ।।१०३।।