चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५२ चरकसंहिता [ अ० ४
नागर-चित्रक-चव्य-विडङ्ग-मूर्वा-गुडूची-वचा-मुस्त-पिप्पली-पटोला- नीति दशेमानि तृप्तिघ्नानि भवन्ति ॥ ( ११ ) ॥ नागर (सोंठ), चित्रक (चीतामूल), चव्य (चविका), विडंग (वायविडंग), मूर्वा (मोरवेल), गुडूची (गिलोय), वचा (वच), मुस्त (नागर मोथा), पिप्पली, पटोल (परवल) ये दस 'तृप्तिघ्न' अर्थात् श्लेष्मा जनित तृप्ति को नाश करने वाली हैं ॥ कुटज-बिल्व-चित्रक-नागरातिविषाभया-धन्वयासक-दारुहरिद्रा-वचा- चव्यानीति दशेमान्यर्शोघ्नानि भवन्ति ॥ ( १२ ) ॥ कुटज (कुड़ा), बिल्व (बेलगिरी), चित्रक (चीतामूल), नागर (सोंठ), अतिविषा (अतीस), अभया (बड़ी हरड़), धन्वयासक (धमासा), दारु- हरिद्रा (दारुहल्दी), वच और चव्य (चविका) ये दस औषधियां 'अर्शोघ्न' अर्थात् बवासीर रोग के नाशक हैं ॥ खदिराभयामलक-हरिद्रारुष्कर-सप्तपर्णारग्वध-करवीर-विडङ्ग-जा- तिप्रवाला इति दशेमानि कुष्ठघ्नानि भवन्ति ॥ ( १३ ) ॥ खदिर (खैर), अभया (जंगी हरड़), आमलक (आंवला), हरिद्रा- (हल्दी), अरुष्कर (भिलावा), सप्तपर्ण (सातवन), आरग्वध (अमलतास), करवीर (कनेर), विडंग (वायविडंग), और जातिप्रवाल (चमेली के नवीन कोमल पत्ते) ये दस कुष्ठघ्न अर्थात् कोढ़ रोग के नाशक हैं ॥ चन्दन-नलद-कृतमाल-नक्तमाल-निम्ब-कुटज-सर्षप-मधुक-दारुहरि- द्रा-मुस्तानीति दशेमानि कण्डूघ्नानि भवन्ति ॥ ( १४ ) ॥ चन्दन (लाल चन्दन), नलद (जटामांसी), कृतमाल (अमलतास) नक्त- माल (करंज), निम्ब (नीम के पत्ते), कुटज (कूड़े की छाल), सर्षप (सरसों), मधुक (मुलैहटी), दारु हरिद्रा (दारु हल्दी), और मुस्त (नागर मोथा), ये दस औषधियां 'कण्डूघ्न' अर्थात् खाज नाशक हैं ॥ अक्षीव-मरिच-गण्डीर-केबुक-विडङ्ग-निर्गुण्डी-किणिही-श्वदंष्ट्रा-वृष- पर्णिकाखुपर्णिका इति दशेमानि क्रिमिघ्नानि भवन्ति ॥ ( १५ ) ॥ अक्षीव (सहजन), काली मरिच, गण्डीर (जिमीकन्द), केबुक, विडंग (वायविडंग), निर्गुण्डी (सम्भालु), किणिही (अपामार्ग), श्वदंष्ट्रा (गोखरू), वृषपर्णी, आखुपर्णिका (मूसाकानी), ये दस कृमिघ्न अर्थात् कृमिनाशक हैं ॥