चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० १७ ] सूत्रस्थानम् २१६
अ० १७ ] सूत्रस्थानम् २१६ और विद्रधि ये पित्त की अधिकता से होती हैं और ये साध्य हैं, ये थोड़ी चर्बीवालों में होती हैं। जिस प्रमेह रोगी के मर्म (हृदय, बस्ति, और नाभि) में, कन्धे, गुदा, हाथ, स्तन, सन्धियों और पांव में पिड़कायें उत्पन्न होती हैं, वह प्रमेह का रोगी नहीं बचता। इसी प्रकार अन्य दूसरी और भी पिड़कायें हैं जो लाल, पीली, काली, पाण्डुर (धूसर) पीले रंग की, राख अर्थात् भस्म के समान; काले बालों की छाया जैसी, कुछ मृदु, कुछ कठिन, कुछ बड़ी, कुछ छोटी, कुछ मन्द वेग, कुछ तीव्र वेग, कोई थोड़ी वेदनावाली, कोई बहुत दर्दवाली होती हैं। इन वात, पित्त, कफ की विद्रधियों को इनके अपने-अपने लक्षणों से पहिचान कर उपद्रवों के उत्पन्न होने से पूर्व ही चिकित्सा करनी चाहिये ॥ १०३-१०९ ॥ तृट्-श्वास-मांस-संकोथ-मोह-हिक्का-मद-ज्वराः । वीसर्प-मर्म-संरोधाः पिडकानामुपद्रवाः ॥ ११० ॥ उपद्रव—प्यास, श्वास, मांस का संकोच, मूर्च्छा, हिचकी, मद और ज्वर, वीसर्प, और हृदय आदि मर्म का अवरोध, ये पिडकाओं के उपद्रव हैं ॥ ११० ॥ क्षयः स्थानं च वृद्धिश्च दोषाणां त्रिविधा गतिः । ऊर्ध्वं चाधश्च तिर्यक् च विज्ञेया त्रिविधाऽपरा ॥ १११ ॥ इत्युक्ता विधिभेदेन दोषाणां त्रिविधा गतिः । त्रिविधा चापरा कोष्ठ-शाखा-मर्मास्थि-सन्धिषु ॥ ११२ ॥ चय-प्रकोप-प्रशमाः पित्तादीनां यथाक्रमम् । भवन्त्येकैकशः षट्सु कालेष्वभ्रागमादिषु ॥ ११३ ॥ गतिः कालकृता चैषा चयाद्या पुनरुच्यते । गतिश्च द्विविधा दृष्टा प्राकृती वैकृती च या ॥ ११ ॥ पित्तादेवोष्मणः पक्तिर्नराणामुपजायते । तच्च पित्तं प्रकुपितं विकारान् कुरुते बहून् ॥ ११५ ॥ प्राकृतस्तु बलं श्लेष्मा विकृतो मल उच्यते । स चैवौजः स्मृतः काये स च पाप्मोपदिश्यते ॥ ११६ ॥ सर्वा हि चेष्टा वातेन स प्राणः प्राणिनां स्मृतः । तेनैव रोगा जायन्ते तेन चोपरुध्यते ॥ ११७ ॥ नित्यसंनिहितामित्रं समीक्ष्याऽऽत्मानमात्मवान् । नित्यं युक्तः परिचरेदिच्छन्नायुरनित्वरम् ॥ ११८ ॥ दोषों की गति तीन प्रकार की होती है—क्षय (घटना), स्थान (सम रहना), और वृद्धि (बढ़ना), अथवा (ऊर्ध्व) ऊपर जाना, (अधः) नीचे जाना और (तिर्यक्), तिरछा जाना ये दूसरी प्रकार की दोषों की गति हैं। विधि
२२० चरकसंहितः [ अ० १७ भेद से दोषों की तीन प्रकार की गति कह दी, एक और प्रकार से भी तीन प्रकार की गति होती है यथा—कोष्ठ, शाखा, एवं मर्मास्थि और सन्धि इनमें दोषों का संचय, प्रकोप और शमन यह तीन प्रकार की गति हैं। यथा--छः ऋतुओं में एक-एक दोष की तीनों जातियां होती हैं। यथा—वर्षा ऋतु में पित्त का संचय, शरद् ऋतु में प्रकोप और हेमन्त में शान्ति। ग्रीष्म में वायु का संचय, वर्षा में प्रकोप तथा शरद् में शान्ति। हेमन्त में कफ का संचय वसन्त में प्रकोप और ग्रीष्म में कफ की शान्ति होती है। दोषों के संचय आदि की गति दो प्रकार की है। यथा—प्राकृत और वैकृत। पित्त का वर्षा ऋतु में संचय होना प्राकृत गति है और वसन्त में संचय होना वैकृत गति है। इसी प्रकार कफ का हेमन्त में संचय होना प्राकृत और वर्षा में संचय होना वैकृत है, वायु का ग्रीष्म ऋतु में संचय होना प्राकृत और शरद् में संचय होना वैकृत है। प्राकृत-स्वास्थ्यावस्था, वैकृत रुग्णावस्था है, इस प्रकार से पित्त आदि दोषों की भी दो प्रकार की गति है। मनुष्यों का पाचन पित्त की ही गरमी से होता है और वह पित्त विकृत होकर बहुत से रोगों को उत्पन्न करता है। प्राकृत स्वास्थ्यावस्था में स्थित कफ शरीर का बल, और ओजरूप होता है, परन्तु यही विकृत, रुग्णावस्था में मल और पाप्मा अर्थात् पापरोग उत्पन्न करता है। वायु के कारण ही शरीर की सब चेष्टाएं, क्रियायें होती हैं। यही वायु प्राणियों का प्राण है। इस के विकृत होने पर रोग उत्पन्न होते हैं, और इन्हीं रोगों से इसी विकृत वायु से मनुष्य मर जाता है। मनुष्य को चाहिये कि वह समझ ले कि शत्रु (वैकृत, पित्त, वायु, कफ ये दोष ) सदा समीप में खड़े हैं, इसलिये अपने कल्याण में मन को लगाकर प्रशस्त मन से परीक्षा करके नित्य ही न जानेवाली दीर्घ आयु की सदा इच्छा करता हुआ दीर्घायु होने का प्रयत्न करे । १११-११८। तत्र श्लोकौ । शिरोरोगाः सहहृद्रोगा रोगा मानविकल्पजाः । क्षयाः सपिडकाश्चोक्ता दोषाणां गतिरेव च ॥ ११९ ॥ कियन्तःशिरसीयेऽस्मिन्नध्याये तत्त्वदर्शिना । ज्ञानार्थं भिषजां चैव प्रजानां च हितैषिणा ॥ १२० ॥ शिरोरोग, हृदय के रोग, दोषों के परिमाण भेद से होनेवाले रोग, दोषों के क्षय से, पिड़कायें, दोषों की गति, इन सब बातों का तत्त्वदर्शी महर्षि ने 'कियन्तःशिरसीय' अध्याय में, वैद्यों के ज्ञान और प्रजाओं की मंगलकामना से उपदेश किया है ॥ ११९-१२० ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने रोगचतुष्के कियन्तःशिरसीयो नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
अ० १८ । सूत्रस्थानम् २२१
अ० १८ । सूत्रस्थानम् २२१ अष्टादशोऽध्यायः।
अथातस्त्रिशोथीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ इसके आगे 'त्रिशोथीय अध्याय' का व्याख्यान करेंगे, जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ त्रयः शोथा भवन्ति वात-पित्त-श्लेष्म-निमित्ताः । ते पुनर्द्विविधाः निजागन्तुभेदेन। तत्राऽऽगन्तवश्छेदन-भेदन-क्षणन-भञ्जन-पिच्छनोत्पे- षण-प्रहार-वध-बन्धन-वेष्टन-व्यधन-पीडनादिभिर्वा भल्लातक-पुष्प-फल- रसात्मगुप्ता-शूक-कृमिशूकाहितपत्र-लता-गुल्म-संस्पर्शनैर्वा स्वेदन-परि- सर्पणावमूत्रणैर्वा विषिणां, सविषाविष-प्राणि-दंष्ट्रा-दन्त-विषाण-नख- निपातैर्वा सागर-विष-वात-हिम-दहन-संस्पर्शनैर्वा शोथाः समुपजायन्ते । ते पुनर्यथास्वं हेतुजैर्व्यञ्जनैरादावुपलभ्यन्ते निजव्यञ्जनैकदेशविपरीतैः, बन्ध-मन्त्रागद-प्रलेप-प्रताप-निर्वापणादिभिश्चोपक्रमैरुपक्रम्यमाणाः प्रशा- न्तिमापद्यन्ते ॥ ३ ॥ शोथ (सूजन) तीन प्रकार का है। १. वात से, २. पित्त से और ३. कफ से। यह तीन प्रकार का शोथ फिर दो प्रकार का है। ( १ ) शरीर में उत्पन्न होने वाला निज और ( २ ) बाहर कारण से उत्पन्न होने वाला आगन्तु । इन में आगन्तु शोथ छेदन ( दो खण्ड करना ), भेदन ( फाड़ना ), क्षणन ( चूर्ण करना ), भञ्जन ( तोड़ना, सर्जरी करना ), पिच्छन ( बहुत दबाना ), उत्पेषण ( शिला पर पीसने की भांति पीसने ) से, वेष्टन ( रज्जु आदि से लपेटना ), प्रहार ( चोट ), वध ( मारने ) से, बन्धन ( बांधना ), व्यधन ( बाँधना ),पीड़न और ( दबाने ) आदि से उत्पन्न होता है अथवा भिलावे के पुष्प या फल अथवा रसके लाने से, आत्मगुप्ता ( कौंच की फली ), शूक, कृमिशूक ( रोयें वाला कीड़ा ), अहितपत्र ( बिच्छू बूटी के पत्र ), लता (बेल) गुल्म ( झंकार झाड़ी ) के स्पर्श से आगन्तु शोथ उत्पन्न होता है अथवा विषयुक्त प्राणियों के पसीने से, शरीर पर चलने फिरने से, इन के मूत्रों से, विषैले प्राणियों के जाढ़, दांत, सींग, नख आदि के प्रहार से, कृत्रिम विषयुक्त वायु, बरफ या अग्नि के स्पर्श से आगन्तु शोथ उत्पन्न होता है। ये आगन्तु शोथ प्रथम कारणों से उत्पन्न लक्षणों से प्रकट होते हैं। आगन्तु शोथ या रोग में व्यथा प्रथम उत्पन्न होती है, और पीछे शरीर के दोषों से सम्बन्धित होते हैं।
रोपणादि से चिकित्सा करने पर शान्त हो जाते हैं ॥ ३ ॥
२२२ चरकसंहिता [ अ० १८ ये शोथ बन्धन (सुखप्रद लेप आदि की पट्टी बांधने से), मन्त्र से, औषध, प्रलेप, प्रताप, निर्वापण (सेक आदि द्वारा वायु को निकालने से) एवं शोधन रोपणादि से चिकित्सा करने पर शान्त हो जाते हैं ॥ ३ ॥ निजाः पुनः स्नेह-स्वेदन-वमन-विरेचनास्थापनानुवासन-शिरोविरे- चनानामयथावत्प्रयोगात् मिथ्यासंसर्जनाद्वा छर्द्यलसक विसूचिका-श्वा- स-कासातीसार-शोष-पाण्डुरोग-ज्वरोदर-प्रदर-भगन्दरार्शो-विकारातिक- र्षणैर्वा कुष्ठ-कण्डू-पिडकादिभिर्वा छर्दि-क्षवथूद्गार-शुक्र-वात-मूत्र-पुरी- ष-वेग-विधारणैर्वा कर्म-रोगोपवासातिकर्शितस्य वा सहसाऽतिगुर्वम्ल- लवण-पिष्टान्न-फल-शाक-राग-दधि-हरीतक-मद्य-मन्दक-विरूढ-नव-शूक- शमी-धान्यानूपौदकपिशितोपयोगात् मृत्पङ्क-लोष्ट-भक्षणाल्लवणातिभक्ष- णाद्वा गर्भ-संपीडनादाम-गर्भ-प्रपतनात् प्रजातानां च मिथ्योपचारादु- दीर्णदोषत्वाच्च शोथाः प्रादुर्भवन्तीत्युक्तः सामान्यो हेतुः ॥ ४ ॥ 'निज' अर्थात् शरीर के अन्दर स्वतः उत्पन्न होनेवाले शोथ—स्नेह, स्वेद, वमन, विरेचन, आस्थापना, अनुवासन और शिरोविरेचन के अति या हीन अथवा मिथ्या योग से, इन कर्मों के पीछे अपथ्य से, वमन, अलसक, विषू- चिका, श्वास, कास, अतिसार, शोष, पाण्डु रोग, ज्वर, उदर रोग, प्रदर, भग- न्दर, अर्श रोग से, संशोधन कर्म से, कुष्ठ, खाज, पिड़का आदि से, छींक, वमन, डकार, शुक्र, वायु और मल के उपस्थित वेगों को रोकने से और संशोधन कर्मों से उत्पन्न रोगों से, उपवास से, शरीर के बहुत कर्षण से, एक- दम से बहुत भारी, खट्टे, नमकीन पदार्थों के खाने से, पोठी से बने भोजनों से, फल, शाक, राग (रायता) षाडव, (खीर आदि), दही, हरी भाजी, मद्य, मन्दक-धीमे पड़े उतरे मद्य को पीने से, अंकुरित अन्न, नवीन अन्न से, शूक धान्य-चावल गेहूँ आदि, शमीधान्य उड़द मूंग आदि, जलचर प्राणियों के मांस के सेवन से, मिट्टी, कीचड़, मिट्टी का ढेला इनके खाने से नमक के अधिक खाने से, गर्भ पर दबाव पड़ने से, गर्भपात से, प्रसव के पश्चात् उचित परिचर्या न होने से, दोषों के बढ़ने से शोथ उत्पन्न होता है । ये शरीर जन्य शोथों के सामान्य लक्षण हैं ॥ ४ ॥ अयं त्वत्र विशेषः-शीत-रूक्ष-लघु-विशद-श्रमोपवासातिकर्षण-क्ष- पणादिभिर्वायुः प्रकुपितस्त्वङ्-मांस-शोणितादीन्यभिभूय शोथं जनयति । स क्षिप्रोत्थानप्रशमो भवति तथा श्यावारुणवर्णः प्रकृतिवर्णो वा, चलः स्पन्दनः खर-परुष-भिन्न-त्वग्लोमा छिद्यत इव भिद्यत इव पीड्यत
अ० १८ ] सूत्रस्थानम् २२३
अ० १८ ] सूत्रस्थानम् २२३
इव सूचीभिरिव तुद्यते पिपीलिकाभिरिव संसृप्यते सर्षप-कल्कावलिप्त इव चिमिचिमायते संकुच्यते आयम्यत इति वातशोथः ॥ ५ ॥ उष्ण-तीक्ष्ण-कटुक-क्षार-लवणाम्लाजीर्ण-भोजनैरग्न्यातप-प्रतापैश्च पित्तं प्रकुपितं त्वङ्मांसशोणितान्यभिभूय शोथं जनयति। स क्षिप्रो- त्थानप्रशमो भवति कृष्ण-पीत-नील-ताम्रावभास उष्णो मृदुः कपिल- ताम्र-लोमा उष्यते दूयते दह्यते धूप्यते ऊष्मायते स्विद्यति क्लियते न च स्पर्शमुष्णं वा सुषूयत इति पित्तशोथः ॥ ६ ॥ गुरु-मधुर-शीत-स्निग्धैरतिस्वप्न-व्यायामादिभिश्च श्लेष्मा प्रकुपितः त्वङ्-मांस-शोणितादीन्यभिभूय शोथं जनयति । स कृच्छ्रोत्थानप्रशमो भवति, पाण्डुः श्वेतावभासः स्निग्धः श्लक्ष्णो गुरुः स्थिरः स्त्यानः शुक्लाग्ररोमा स्पर्शोष्णसहश्चेति श्लेष्मशोथः ॥ ७ ॥ यथास्वकारणकृतिसंसर्गाद् द्विदोषजास्त्रयः शोथा भवन्ति ॥८॥ यथास्वकारणकृतिसन्निपातात्सान्निपातिक एकः ॥ ६ ॥ एवं भेदप्रकृतिभिस्ताभिर्भिद्यमानो द्विविधस्त्रिविधश्चतुर्विधः सप्त- विधश्च शोथ उपलभ्यते, पुनश्चैक एव, उत्सेधसामान्यादिति ॥ १० ॥ इनमें इतना विशेष है कि—शीत, रूक्ष, लघु, विशद अन्न, खानपान, परिश्रम, उपवास, वमन विरेचनादि कर्मों के बहुत करने और उपवास आदि से वायु कुपित होकर त्वचा, मांस, रक्त और मेद आदि, धातुओं पर अधिकार कर शोथ को उत्पन्न करता है। यह वातजन्य शोथ जल्दी ही उत्पन्न होता और जल्दी ही शान्त हो जाता है। इस का रंग काला सा या लाल-काला अथवा स्वाभाविक रंग का रहता है। यह शोथ गतिशील, धड़कन युक्त, कर्कश, कठोर, त्वचा फटती सी जाती है, और बाल टूट जाते हैं। रोगी को ऐसा प्रतीत होता है कि कोई चीरखा रहा हो, भेदन कर रहा हो, दबा रहा हो, सुई चुभाने का सा दर्द होता है, चिउंटियां सी चलती हैं, सरसों पीसकर लेप करने जैसी चिरमराइट लगती है, सिकुड़ता और फैलता है, यह वातजन्य शोथ के लक्षण हैं । गरम, तीक्ष्ण, कडुवे, क्षार, नमकीन और खट्टे पदार्थों के खाने से, अजीर्ण अवस्था में भोजन करने से, आग और धूप के ताप के बहुत सेवन से, पित्त कुपित होकर त्वचा, मांस, रक्त पर प्रबल होकर शोथ उत्पन्न करता है। यह शोथ जल्दी ही उत्पन्न होता और जल्दी शान्त हो जाता है। इसका रंग काला, पीला, नीला ताम्बे के समान, स्पर्श गरम और कोमल बाल भूरे या ताम्बे के रंग के हो जाते हैं। यह शोथ गरम होता, जलता सा है, पीड़ा देता
२३४ चरकसंहिता [अ० १८ है, तपाता है, गरम सा लगता है, पसीना आता है, नरमा जाता है, न तो स्पर्श और न गरमी को सहन करता है। यह पित्तजन्य शोथ है। भारी, मधुर, शीत, स्निग्ध भोजनों से, बहुत सोने से, व्यायाम न करने से, श्लेष्मा कुपित होकर त्वचा, मांस, रक्त पर अधिकार करके शोथ उत्पन्न करता है। यह शोथ देर में उत्पन्न होता और देर में ही शान्त होता है। इसका रंग धूसर (धुमैला) या श्वेत, चिकना, स्नेहयुक्त, भारी, स्थिर (न हिलने वाला), गाढ़ा, बालों का अग्र भाग श्वेत हो जाता है, स्पर्श को और गरमी को सहन कर लेता है, यह कफशोथ है। अपने अपने कारणों से दो दोष कुपित होकर दो दोषों के लक्षणों वाले शोथ को उत्पन्न करते हैं। इस प्रकार से संसर्ग जन्य शोथ ३ प्रकार के हैं। तीनों दोषों के कारणों के मिलने से उत्पन्न सान्निपातिक शोथ एक प्रकार का है, इस में तीनों दोषों के लक्षण होते हैं। इस प्रकार प्रकृति भेद से शोथ दो प्रकार के (निज और आगन्तु), तीन प्रकार के (वातज, पित्तज, कफज), चार प्रकार के (वातजन्य, पित्तजन्य, कफजन्य, सन्निपातजन्य), सात प्रकार के (वातज, पित्तज, कफज, वातपैत्तिक, वातश्लैष्मिक, पित्तश्लैष्मिक और सान्निपातिक) होते हैं। परन्तु सूजन की दृष्टि से शोथ एक ही प्रकार का है, सूजन का होना सब शोथों में सामान्य है ॥५-१०॥ भवन्ति चात्र—शूयन्ते यस्य गात्राणि स्वपन्तीव रुजन्ति च । पीडितान्युन्नमन्त्याशु वातशोथं तमादिशेत् ॥ ११ ॥ यश्चाप्यरुणवर्णाभः शोथो नक्तं प्रणश्यति । स्नेहोष्णमर्दनाभ्यां च प्रणश्येत्स च वातिकः ॥ १२ ॥ यः पिपासाज्वरार्त्तस्य दूयतेऽथ विदह्यते । खिद्यते क्लिद्यते गन्धी स पैत्तः श्वयथुः स्मृतः ॥१३॥ यः पीत-नेत्र-वक्त्रत्वक् पूर्वं मध्यात् प्रशूयते । तनुत्वक् चातिसारी च पित्तशोथः स उच्यते ॥ १४ ॥ यः शीतळः सक्तगतिः कण्डूमान् पाण्डुरेव च । निपीडिता नोन्नमति श्वयथुः स कफात्मकः ॥ १५ ॥ यस्य शस्त्रकुशच्छेदाच्छोणितं न प्रवर्तते । कृच्छ्रेण पिच्छलान् स्रवति स चापि कफसंभवः ॥ १६ ॥ निदानाकृतिसंसर्गाच्छ्वयथुः स्याद् द्विदोषजः । सर्वाकृतिः सन्निपाताच्छोथो व्यामिश्रहेतुजः ॥ १७॥
अ० १८ ] १५ सूत्रस्थानम् २३५
अ० १८ ] १५ सूत्रस्थानम् २३५ सूजन होने पर जिसका शरीर सोया हुआ, (चेतना, स्पर्श ज्ञान का अभाव) सा प्रतीत हो, पीड़ा होती हो, दबाने पर फिर जल्दी से ऊपर उठ जाता हो, उसे वातजन्य शोथ समझना चाहिये और जिस शोथ का रंग लाल, काला हो, जो सूजन रात्रि में नष्ट हो जाती है, एवं स्वेदन, उष्ण क्रिया अथवा मर्दन से हां जाता है, वह वातजन्य शोथ है। जिस शोथ में रोगी को प्यास बहुत लगे, ज्वर की पीड़ा हो, जलन हो, पकता हो, पसीना आता हो, नरम पड़ता हो, गन्ध आती हो, वह पित्तजन्य शोथ है। जिस में कि त्वचा, नेत्र, मूत्र पीले हो जाते हों, और जो कि प्रथम बीच में से सूजता हो, त्वचा जिसमें पतली हो और रोगी को अतिसार हो तो उसे पित्तजन्य शोथ समझना चाहिये। जो सूजन ठण्डी, पसीना न हो, जो हिले जुले नहीं, जिसमें खाज उठती हो, जिसका रंग धूसर हो, दबाने से फिर ऊपर उठ जाये, वह सूजन कफजन्य है। जिस में कि शस्त्र या कुशा से काटने पर रक्त नहीं बहता, अथवा कठिनाई से थोड़ा थोड़ा चिकना स्राव बहता है, वह सूजन भी कफजन्य है। दो दोषों के कारणों से दो दोषों के लक्षणों वाला संसर्गजन्य (द्विदोषज) शोथ होता है। सब दोषों के मिलने से सब लक्षणों वाला सन्निपातजन्य शोथ होता है ॥ ११-१७ ॥ यस्तु पादाभिनिर्वृत्तः शोथः सर्वाङ्गगो भवेत् । जन्तोः स च सुकष्टः स्यात्प्रसूतः स्त्रीमुखाच्च यः ॥ १८ ॥ यश्चापि गुह्यप्रभवः स्त्रियो वा पुरुषस्य वा । स च कष्टतमो ज्ञेयो यस्य च स्युरुपद्रवाः ॥ १६ ॥ जो सूजन पुरुषों के पांव से आरम्भ करके और स्त्रियों के मुख से प्रारम्भ होकर सम्पूर्ण शरीर में फैल जाता है वह कष्टसाध्य होता है और जो शोथ स्त्री या पुरुष के गुह्य भाग से प्रारम्भ होकर सारे शरीर में फैलता है, अथवा जिस शोथ में उपद्रव हो, वह शोथ तो अति अधिक कष्टसाध्य है ॥ १८-१६ ॥ छर्दिः श्वासोऽरुचिस्तृष्णा ज्वरोऽतीसार एव च । सप्तकोऽयं सदौर्बल्यः शोथोपद्रवसंग्रहः ॥ २० ॥ उपद्रव—वमन, श्वास, अरुचि, प्यास, ज्वर, अतीसार और निर्बलता संक्षेप में ये सात शोथ के उपद्रव हैं ॥ २० ॥ यस्य श्लेष्मा प्रकुपितो जिह्वामूलेऽवतिष्ठते । आशु संजनयेच्छोथं जायतेऽस्योपजिह्विका ॥ २१ ॥ यस्य श्लेष्मा प्रकुपितः काकले व्यवतिष्ठते । आशु संजनयेच्छोफं करोति गलशुण्डिकाम् ॥ २२ ॥
२२६ चरकसंहिता [ अ० १८ यस्य श्लेष्मा प्रकुपितो गलबाह्येऽवतिष्ठते । शनैः संजनयेच्छोथं गलगण्डोऽस्य जायते ॥ २३ ॥ यस्य श्लेष्मा प्रकुपितस्तिष्ठत्यन्तर्गले स्थितः । आशु संजनयेच्छोथं जायतेऽस्य गलग्रहः ॥ २४ ॥ उपजिह्विका रोग— जब कफ कुपित होकर जिह्वा की जड़ में एकत्र होकर शोथ उत्पन्न करता है, उसे ‘उपजिह्विका’ कहते हैं। गलशुण्डिका—जब कफ कुपित होकर काकल गलग्रन्थि का आश्रय लेकर शोथ उत्पन्न करता है, तब इस रोग को 'गलशुण्डिका' कहते हैं। जब कफ कुपित होकर गले के बाहर आकर शोथ उत्पन्न करता है, तब इसे 'गलगण्ड' कहते हैं। यह सूजन बहुत धीरे धीरे होता है। जब कफ कुपित होकर गले के अन्दर रहकर शीघ्र ही सूजन उत्पन्न करता है, उसे 'गलग्रह' ( गले का रुक जाना, स्वर का बंट जाना ) कहते हैं ॥२१-२४॥ यस्य पित्तं प्रकुपितं सरक्तं त्वचि सर्पति । शोथं सरागं जनयेद्विसर्पस्तस्य जायते ॥ २५ ॥ यस्य पित्तं प्रकुपितं त्वचि रक्तेऽवतिष्ठते । शोथं सरागं जनयेत् पिडका तस्य जायते ॥ २६ ॥ यस्य पित्तं प्रकुपितं शोणितं प्राप्य शुष्यति । तिलका विप्लवो व्यङ्गो नीलिका चास्य जायते ॥ २७ ॥ यस्य पित्तं प्रकुपितं शङ्खयोरवतिष्ठते । श्वयथुः शङ्खको नाम दारुणस्तस्य जायते ॥ २८ ॥ यस्य पित्तं प्रकुपितं कर्णमूलेऽवतिष्ठते । ज्वरान्ते दुर्जयोऽन्ताय शोथस्तस्योपजायते ॥ २९ ॥ जब पित्त कुपित होकर रक्त के साथ मिलकर त्वचा में फैलता है, तब लाल रंग की सूजन उत्पन्न होती है, इस को 'विसर्प' कहते हैं। जब पित्त कुपित होकर रक्त के साथ त्वचा में स्थिर हो जाता है, तब लाल रंग के उत्पन्न शोथ को 'पिडका' (फुन्सी) कहते हैं। जब कुपित पित्त रक्त में पहुंच- कर शुष्क हो जाता है तब नीलिका, तिल, व्यंग, चर्मकील, लसन, झांई आदि रोग होते हैं। जब कुपित पित्त शंखप्रदेश ( कनपटी ) में आकर रुक जाता है, तब 'शंखक' नाम का भयानक शोथ उत्पन्न होता है। जब कुपित पित्त कान की जड़ में आकर रुक जाता है, तब ज्वर के अन्त में भयंकर सूजन उत्पन्न होती है, यह सूजन मारक होती है ॥२५-२९॥
अ० १८ ] सूत्रस्थानम् २२७
अ० १८ ] सूत्रस्थानम् २२७ वातः प्लीहानमुद्धूय कुपितो यस्य तिष्ठति । शनैः परितुदन् पार्श्वं प्लीहा तस्याभिवर्धते ॥ ३० ॥ यस्य वायुः प्रकुपितो गुल्मस्थानेऽवतिष्ठते । शोथं सशूलं जनयन् गुल्मस्तस्योपजायते ॥ ३१ ॥ यस्य वायुः प्रकुपितः शोथशूलकरश्चरन् । वंक्षणाद्वृषणौ याति ब्रध्नस्तस्योपजायते ॥ ३२ ॥ यस्य वातः प्रकुपितस्त्वङ्मांसान्तरमाश्रितः । शोथं संजनयेत् कुक्षावुदरं तस्य जायते ॥ ३३ ॥ यस्य वातः प्रकुपितः कुक्षिमाश्रित्य तिष्ठति । नाधो व्रजति नाप्यूर्ध्वमानाहस्तस्य जायते ॥ ३४ ॥ रोगाश्चोत्सेधसामान्यादधिमांसार्बुदादयः । विशिष्टा नामरूपाभ्यां निर्देश्याः शोथसंग्रहे ॥ ३५ ॥ जब वायु कुपित होकर प्लीहा ( तिल्ली ) को ऊपर करती है, तब पार्श्वों को धीरे धीरे दबाती हुई प्लीहा बढ़ जाती है । जब वायु कुपित होकर ( हृदय, नाभि, बस्ति और दोनों पार्श्व ) गुल्म स्थानों का आश्रय ले लेती है तब शूलयुक्त सूजन उत्पन्न होती है, इसे 'गुल्म' कहते हैं । जब वायु कुपित होकर सूजन और दर्द को उत्पन्न करती हुई वंक्षण ( जंघासन्धि ) प्रदेश से अण्ड कोष में जाती है, तब 'ब्रध्न' रोग होता है । जब वायु कुपित होकर त्वचा और मांस के बीच में उदर के अन्दर पहुंचकर आश्रय लेकर शोथ उत्पन्न करती है, तब 'उदर' रोग उत्पन्न हो जाता है । जब वायु कुपित होकर उदर का आश्रय लेकर स्थिर हो जाती है, न तो नीचे जाती है और न उपर जाती है, इस को 'आनाह' कहते हैं । अधिमांस, अर्बुद आदि रोग में सूजन की समानता होने से, नाम और रूप से भिन्न होने पर भी इनका इसे शोथसंग्रह में निर्देश करना चाहिये ॥ ३०-३५ ॥ वात-पित्त-कफा यस्य युगपत्कुपितास्त्रयः । जिह्वामूलेऽवतिष्ठन्ते विदहन्तः समुच्छ्रिताः ॥ ३६ ॥ जनयन्ति भृशं शोथं वेदनाश्च पृथग्विधाः । तं शीघ्रकारिणं रोगं रोहिणीकेति निर्दिशेत् ॥ ३७ ॥ त्रिरात्रं परमं तस्य जन्तोर्भवति जीवितम् । कुशलेन त्वनुक्रान्तः क्षिप्रंसंपद्यते सुखी ॥ ३८ ॥ सन्ति ह्येवंविधा रोगाः साध्या दारुणसंमताः । ये हन्युरनुपक्रान्ता मिथ्याचारेण वा पुनः ॥ ३९ ॥
२२८ चरकसंहिता [ अ० १८ साध्याश्चाप्यपरे सन्ति व्याधयो मृदुसंमताः । यत्नायत्नकृतं येषु कर्म सिध्यत्यसंशयम् ॥ ४०॥ असाध्याश्चापरे सन्ति व्याधयो याप्यसंज्ञिताः । सुसाध्वपि कृतं येषु कर्म यात्राकरं भवेत् ॥ ४१ ॥ जिस पुरुष के वात, पित्त, कफ ये तीनों इकट्ठे मिलकर कुपित होकर जिह्वा की जड़ में स्थित होते हैं और जलन और बहुत सूजन उत्पन्न करते हैं, तथा नाना प्रकार की पीड़ायें देते हैं इस शीघ्रकारी रोग को 'रोहिणी' कहते हैं । इस रोग के कारण मनुष्य केवल तीन दिन जीवित रहता है । इस बीच में यदि कुशल वैद्य से शीघ्र चिकित्सा कराई जाये तो मनुष्य बच जाता है । इस प्रकार के बहुत से भयानक परन्तु साध्य रोग हैं, जिनकी चिकित्सा न करने अथवा मिथ्या वा अशुद्ध चिकित्सा करने से मनुष्य मर जाता है । दूसरे कोमल रोग ऐसे सुखसाध्य हैं, जिनमें कि यत्नपूर्वक या अयत्नपूर्वक (योग्य या अयोग्य वैद्य) के चिकित्सा करने से भी निश्चित रूप में आराम होजाते हैं । दूसरे असाध्य रोग हैं, जिनको 'याप्य' कहा है । जिन रोगों में भली प्रकार चिकित्सा करने पर भी जो याप्य रहते हैं, वे कुछ समय के लिये अच्छे हो जाते हैं ॥४१॥ सन्ति चाप्यपरे रोगाः कर्म येषु न सिध्यति । अपि यत्नकृतं वैद्यैर्न तान् विद्वानुपाचरेत् ॥ ४२ ॥ साध्याश्चैवाऽप्यसाध्याश्च व्याधयो द्विविधाः स्मृताः । मृदु-दारुण भेदेन ते भवन्ति चतुर्विधाः ॥ ४३ ॥ एक और प्रकार के रोग हैं, जिनमें किसी प्रकार की भी चिकित्सा सफल नहीं होती । इन रोगों में मूढ़ लोग ही उत्साह से काम करते हैं, परन्तु विद्वान् इनकी चिकित्सा नहीं करते । रोग दो प्रकार के हैं-'साध्य' और 'असाध्य' । और मृदु और दारुण भेद से (दोनों) चार प्रकार के होजाते हैं । मृदु-साध्य, दारुण-साध्य, मृदु-असाध्य और दारुण-असाध्य ॥ ४२-४३ ॥ त एवापरिसंख्येया भिद्यमाना भवन्ति हि । रुजा-वर्ण-समुत्थान-स्थान-संस्थान-नामभिः ॥ ४४ ॥ व्यवस्थाकरणं तेषां यथास्थूलेषु संग्रहः । तथा प्रकृतिसामान्यं विकारेषूपदिश्यते ॥ ४५ ॥ विकारनामाकुशलो न जिह्रीयात्कदाचन । न हि सर्वविकाराणां नामतोऽस्ति ध्रुवा स्थितिः ॥ ४६ ॥ स एव कुपितो दोषः समुत्थानविशेषतः ।
अ० १८ ] सूत्रस्थानम् २२६
अ० १८ ] सूत्रस्थानम् २२६ स्थानान्तरगतश्चैव जनयत्यामयान् बहून् ॥ ४७ ॥ तस्माद्विकारप्रकृतीरधिष्ठानान्तराणि च । समुत्थानविशेषांश्च बुद्ध्वा कर्म समाचरेत् ॥ ४८ ॥ यो ह्येतत्त्रिविधं ज्ञात्वा कर्माण्यारभते भिषक् । ज्ञानपूर्वं यथान्यायं स कर्मसु न मुह्यति ॥ ४९ ॥ ये रोग रुजा ( पीड़ा ), वर्ण, समुत्थान अर्थात् कारण ( जैसे रूक्ष भोजन या रात्रि जागरण आदि के कारण से वायु कुपित होकर भिन्न चिकित्सा से शान्त होता है ), स्थान ( आमाशय, रसादि ), संस्थान ( आकृति गुल्म, अर्बुद आदि ), नामभेद इन भेदों के कारण भेद होने से असंख्य बन जाते हैं । चिकित्सा कार्य में व्यवहार करने के लिये स्थूल संग्रह ( अष्टोदरीय संग्रह ) किया है। इसलिये चिकित्सा कार्य में प्रकृति की समानता से यह रोग वातजन्य, यह पित्तजन्य, यह कफजन्य इत्यादि रोगों की व्यवस्था बांधनी चाहिये । रोगों को नाम से न जानने वाला वैद्य कभी भी चिकित्सा कार्य में लज्जा न उठावे । सब रोगों की नाम द्वारा स्थिति नहीं, (सब रोगों के नाम नहीं) हैं। कोई एक दोष कारण विशेष से कुपित होकर अन्य स्थान पर पहुंचकर नाना प्रकार के रोगों को उत्पन्न कर देता है। इसलिये रोग के स्वभाव को, उस के अधिष्ठान को, उस के भेदों को और रोग के विशेष कारणों को जानकर चिकित्सा कार्य करना चाहिये । जो वैद्य इन तीन बातों को जानकर चिकित्सा का कार्य ज्ञानपूर्वक उचित रूप से करता है, वह चिकित्सा कार्य में मोहित नहीं होता, वह भूल नहीं करता ॥४४-४६॥ नित्याः प्राणभृतां देहे वात-पित्त-कफास्त्रयः । विकृताः प्रकृतिस्था वा तान् बुभुत्सेत पण्डितः ॥ ५० ॥ उत्साहोच्छ्वास-निःश्वास-चेष्टा धातुगतिः समा । समो मोक्षो गतिमतां वायोः कर्माविकारजम् ॥ ५१ ॥ दर्शनं पक्तिरूष्मा च क्षुत्तृष्णा देहमार्दवम् । प्रभा प्रसादो मेधा च पित्तकर्माविकारजम् ॥ ५२ ॥ स्नेहो बन्धः स्थिरत्वं च गौरवं वृषता बलम् । क्षमा धृतिरलोभश्च कफकर्माविकारजम् ॥ ५३ ॥ वाते पित्ते कफे चैव क्षीणे लक्षणमुच्यते । कर्मणः प्राकृताद्धानिर्वृद्धिर्वाऽपि विरोधिनाम् ॥ ५४ ॥
२३० चरकसंहिता [ अ० १८ दोष-प्रकृति-वैशेष्यं नियतं वृद्धिलक्षणम् । दोषाणां प्रकृतिर्हानिर्वृद्धिश्चैवं परीक्ष्यते ॥ ५५ ॥ इति ॥ शरीरधारियों के शरीर में वात, पित्त और कफ ये तीनों नित्य सदा रहते हैं । वे या तो विकृत अवस्था में रहते हैं, या प्रकृत अर्थात् स्वाभाविक रूप में रहते हैं । विद्वान् को चाहिये कि वह इन को पहिचाने, जाने कि विकृतावस्था में हैं, या प्रकृतावस्था में । काम करने में उत्साह, सांस का अन्दर और बाहर आना, चेष्टा, रस, रक्त आदि धातुओं की गति को समान रखना, पुरीष, मल-मूत्र आदि गमन शील वस्तुओं को ठीक प्रकार से बाहर करना, ये अविकृत वायु के कर्म हैं । देखना, अन्न का पचन, देहकी, उष्णिमा, भूख प्यास का लगना, शरीर की कोमलता, कान्ति, मन की प्रसन्नता, और बुद्धि का होना ये अविकृत पित्त के कार्य हैं । चिकनाई, सन्धियों का बन्धन, स्थिरता, भारीपन, पुरुषत्व, बल, सहन शक्ति, मन की स्थिरता, धैर्य, लोभ का न होना ये अविकृत कफ के कार्य हैं । वात, पित्त, कफ इन के क्षीण होने पर लक्षण कहते हैं— स्वाभाविक कर्मों में न्यूनता आती है अथवा स्वाभाविक कर्मों के विरोधी कार्यों की वृद्धि होती है ( यथा वायु के क्षीण होने पर उत्साह के विपरीत विषाद बढ़ता है, पित्त के क्षीण होने पर नहीं दीखता, कफ के क्षीण होने पर रूक्षता बढ़ती है ) । वृद्धि का लक्षण कहते हैं—दोष की प्रकृति ( स्वभाव ) का वैषम्य ( बढ़ना ) वृद्धि का लक्षण होता है । यथा—कफ की स्निग्धता, मधुरता और शीतलता यह प्रकृति है, इसका अति स्निग्ध, अति शीत होना वृद्धि है । इस प्रकार दोषों की प्रकृति, हानि और वृद्धि की परीक्षा करनी चाहिये ॥ ५०-५५ ॥ तत्र श्लोकाः । संख्यां निमित्तं रूपाणि शोथानां साध्यतां न च । तेषां तेषां विकाराणां शोफांस्तांस्तांश्च पूर्वजान् ॥ ५६ ॥ विधिभेदं विकाराणां त्रिविधं बोध्यसंग्रहम् । प्राकृतं कर्म दोषाणां लक्षणं हानिवृद्धिषु ॥ ५७ ॥ वीत-राग-रजो-दोष-लोभ-मान-मद-स्पृहः । व्याख्यातवांस्त्रिशोफीये रोगाध्याये पुनर्वसुः ॥ ५८ ॥ शोथों की संख्या, कारण, लक्षण, साध्यासाध्य इनसे उत्पन्न रोगों को और जिन रोगों में शोथ प्रथम होता है उनको, रोगों के विधि, भेद से तीन प्रकार की प्रकृति का ज्ञान, दोषों के स्वाभाविक कर्म, वृद्धि और हानि के लक्षण, यह सब
अ० १८ ] सूत्रस्थानम् २३१
अ० १८ ] सूत्रस्थानम् २३१ मोह, रज दोष, लोभ, मान, मद, स्पृहा इन से रहित पुनर्वसु महर्षि ने 'त्रिशो- थीय' अध्याय में कह दिया ॥५६-५८॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने रोगचतुष्के त्रिशोधीयो नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥ ऊनविंशोऽध्यायः । अथातोऽष्टोदरीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब 'अष्टोदरीय' अध्याय की व्याख्या करेंगे, ऐसा भगवान् आत्रेय ने उपदेश किया है। इह खल्वष्टावुदराणि, अष्टौ मूत्राघाताः, अष्टौ क्षीरदोषाः, अष्टौ रेतोदोषाः, सप्त कुष्ठानि, सप्त पिडकाः, सप्त वीसर्पाः, षडतीसाराः, षडुदावर्ताः, पञ्च गुल्माः, पञ्च प्लीहदोषाः, पञ्च कासाः, पञ्च श्वासाः, पञ्च हिक्काः, पञ्च तृष्णाः, पञ्च छर्दयः, पञ्च भक्तस्यानशनस्थानानि, पञ्च शिरोरोगाः, पञ्च हृद्रोगाः, पञ्च पाण्डुरोगाः, पञ्चोन्मादाः, चत्वारोऽप- स्माराः, चत्वारोऽक्षिरोगाः, चत्वारः कर्णरोगाः, चत्वारः प्रतिश्यायाः, चत्वारो मुखरोगाः, चत्वारो ग्रहणीदोषाः, चत्वारो मदाः, चत्वारो मूर्च्छायाः, चत्वारः शोषाः, चत्वारि क्लैब्यानि, त्रयः शोथाः, त्रीणि किलासानि, त्रिविधं लोहितपित्तं, द्वौ ज्वरौ, द्वौ व्रणौ, द्वावायामौ, द्वे गृध्रस्यौ, द्वे कामले, द्विविधमार्मं, द्विविधं वातरक्तं, द्विविधान्यर्शांसि, एक ऊरुस्तम्भः, एकः संन्यासः, एको महागदः, विंशतिः क्रिमिजातयः, विंशतिः प्रमेहाः, विंशतिर्योनिव्यापदः, इत्यष्टचत्वारिंशद्रोगाधिकरणा- न्यस्मिन् संग्रहे समुद्दिष्टानि ॥ ३ ॥ इस आयुर्वेद शास्त्र में आठ प्रकार के उदर रोग हैं, आठ मूत्राघात हैं, आठ प्रकार के दूध के दोष, आठ प्रकार के वीर्य दोष । सात प्रकार के कुष्ठ, सात पिडकायें, सात वीसर्प । छः प्रकार के अतीसार, छः उदावर्त्त । पांच गुल्म पांच प्लीहा के दोष, पांच कास, पांच श्वास, पांच हिचकियां, पांच तृष्णायें, पांच छर्दि-वमन, पांच प्रकार की अन्न में अरुचि, पांच प्रकार के शिरोरोग, पांच हृदय रोग, पांच प्रकार के पाण्डुरोग, पांच उन्माद । चार प्रकार के अपस्मार, चार नेत्ररोग, चार कर्णरोग, चार प्रकार के प्रतिश्याय, चार मुख रोग, चार
७३० चरकसंहिता [ अ० १९ प्रकार के ग्रहणी रोग, चार प्रकार के मद्ररोग, चार प्रकार की मूर्छा, चार प्रकार के शोष, चार प्रकार की क्लीबता तीन प्रकार का शोथ, तीन प्रकार का किलास, तीन प्रकार का रक्तपित्त, दो प्रकार का ज्वर, दो प्रकार के व्रण, दो प्रकार के आयाम, दो प्रकार की गृध्रसी, दो प्रकार का कामला, दो प्रकार की आम, दो प्रकार का वातरक्त, दो प्रकार का अर्श । एक प्रकार का अस्तम्भ, एक प्रकार का संन्यास, एक प्रकार का महामद; बीस प्रकार के कृमिभेद, बीस प्रकार के प्रमेह, बीस प्रकार के योनि रोग, इस प्रकार से इस स्थूल संग्रह में अड़तालीस प्रकार के रोगों की गणना है ॥ ३ ॥ इन को स्पष्ट करके कहते हैं— एतानि यथोद्देशमभिनिर्देश्यामः—अष्टावुदराणीति वात-पित्त-कफ- सन्निपात प्लीह-बद्ध-च्छिद्र-दकोदराणीति, अष्टौ मूत्राघाता इति वात- पित्त-कफ-सन्निपाताश्मरी-शर्कर-शुक्र-शोणितजा इति, अष्टौ क्षीरदोषा इति वैवर्ण्यं वैगन्ध्यं वैरस्यं पैच्छिल्यं फेनसङ्घातो रौक्ष्यं गौरवमति- स्नेहश्चेति, अष्टौ रेतोदोषा इति—तनु शुष्कं फेनिलमश्वेतं पूत्यतिपिच्छिल- मन्यधातूपहितमवसादि चेति ॥ ( १ ) ॥ आठ प्रकार के उदर रोग हैं—वातजन्य, पित्तजन्य, कफजन्य, सन्निपातजन्य प्लीहोदर, बद्धोदर, छिद्रोदर और दकोदर ये आठ । आठ मूत्राघात—वातजन्य, पित्तजन्य, कफजन्य, सन्निपातजन्य, अश्मरीजन्य, शर्कराजन्य, शुक्रजन्य और शोणितजन्य । स्त्रियों के दूध में आठ प्रकार के दोष हैं—वैवर्ण्य, वैगन्ध्य, वैरस्य, पैच्छिल्य, फेनसङ्घात ( झाग का बहुत आना ), रौक्ष्य ( रूखापन ), गौरव ( भारीपन पानी में नीचे बैठना ) और अति स्नेह ( चिकनाई की अधिकता ) वीर्य के दोष आठ हैं—तनु ( पतला ), शुष्क, फेनिल ( झागदार ), अश्वेत ( मैला, धूसर रंग ), पूति ( दुर्गन्धयुक्त ), अति पिच्छिल ( बहुत चिकना ), अन्य धातु से मिश्रित और अवसादि ( हीनसत्त्व ) ॥ (१) ॥ सप्त कुष्ठानीति कपालोदुम्बर-मण्डलर्ष्यजिह्व-पुण्डरीक-सिध्म-काक- णकानीति, सप्त पिडका इति शराविका कच्छपिका जालिनी सर्षप्यलजी विनता विद्रधिश्चेति, सप्त वीसर्पा इति वात-पित्त-कफाग्नि-कर्दम-ग्रन्थि- सन्निपाताख्याः ॥ ( २ ) ॥ सात प्रकार के कुष्ठ—कपाल, उदुम्बर, मण्डल, ऋष्यजिह्व, पुण्डरीक, सिध्म और काकणिका । सात पिड़कायें—शराविका, कच्छपिका, जालिनी, सर्षपी, अलजी, विनता और विद्रधि । सात विसर्प—वातजन्य, पित्त जन्य, कफजन्य, अग्नि, कर्दमक, ग्रन्थि और सन्निपातजन्य ॥ (२) ॥
अ० १६ ] सूत्रस्थानम् २३३
अ० १६ ] सूत्रस्थानम् २३३ षडतीसारा इति वात-पित्त-कफ-सन्निपात-भय-शोकजाः, षडुदावर्ता इति वात-मूत्र-पुरीष शुक्र-च्छर्दि-क्षवथुजाः ॥ ( ३ ) ॥ छः अतीसार हैं—वातजन्य, पित्तजन्य, कफजन्य, सन्निपातजन्य, भयजन्य और शोकजन्य । छः उदावर्त्त हैं—वातजन्य, मूत्रजन्य, पुरीषजन्य, शुक्रजन्य, छर्दिजन्य और क्षवथुजन्य ॥ ( ३ ) ॥ पञ्च गुल्मा इति वात-पित्त-कफ सन्निपात-रक्तजाः । पञ्च प्लीहदोषा इति गुल्मैर्व्याख्याताः । पञ्च कासा इति वात-पित्त-कफ-क्षत-क्षयजाः, पञ्च श्वासा इति महोर्ध्व-च्छिन्न-तमक-क्षुद्राः । पञ्च हिक्का इति महती गम्भीरा व्यपेता क्षुद्रा चान्नजा च । पञ्च तृष्णा इति वात-पित्ताम-क्षयोपस- र्गात्मिकाः । पञ्च छर्दय इति द्विष्टार्थसंयोग-वात-पित्त-कफ-सन्निपातो- त्रेकात्मिकाः । पञ्च भक्तस्यानशनस्थानानीति वात-पित्त-कफ-द्वेषायासाः, पञ्च शिरोरोगा इति पूर्वोद्देशमभिसमस्य वात-पित्त-कफ-सन्निपात- क्रिमिजाः । पञ्च हृद्रोगा इति शिरोरोगैर्व्याख्याताः । पञ्च पाण्डुरोगा इति वात-पित्त-कफ-सन्निपात-मृद्भक्षणजाः । पञ्चोन्मादा इति वात- पित्त-कफ-सन्निपातागन्तुनिमित्ताः ॥ ( ४ ) ॥ पांच गुल्म हैं—वातजन्य, पित्तजन्य, कफजन्य, सन्निपातजन्य और रक्त ( आर्त्तव ) जन्य । पांच प्रकार के प्लीहा दोष—गुल्म के समान ( वात, पित्त, कफ, सन्निपात और रक्तजन्य ) हैं। पांच प्रकार के कास-वातजन्य, पित्तजन्य, कफजन्य, क्षत ( उरः क्षत ) जन्य और क्षयजन्य । पांच प्रकार के श्वास— महा, ऊर्ध्व, छिन्न, तमक और क्षुद्र । पांच प्रकार की हिक्का ( हिचकी )— महती, गम्भीरा, व्यपेता, क्षुद्रा और अन्नजन्य । पांच प्रकार की प्यास (तृषा)— वातजन्य, पित्तजन्य, आमजन्य, क्षयजन्य और औपसर्गिक कारण से होने वाली । वमन भी पांच प्रकार का है—दूषित अन्न के खाने से, वातजन्य, पित्तजन्य, कफजन्य और सन्निपात से होने वाला । पांच प्रकार का अपचन— वातजन्य, पित्तजन्य, कफजन्य, द्वेष ( भोजन से द्वेष ) और आयास ( भोजन के पीछे सहसा श्रम करने से ) । पांच प्रकार के शिरोरोग—( 'अर्द्धावभेदको वा स्यात्' से आरम्भ करके 'कियन्तः शिरसीय' अध्याय में कह दिये गये हैं )। वातजन्य, पित्तजन्य, कफजन्य, सन्निपातजन्य और कृमिजन्य । पांच प्रकार के हृदय रोग—शिरोरोग की भांति हैं। पांच पाण्डुरोग— वातजन्य, पित्तजन्य, कफ- जन्य, सन्निपातजन्य और मिट्टी के खाने से उत्पन्न । पांच प्रकार का उन्माद- वातजन्य, पित्तजन्य, कफजन्य, सन्निपात और आगन्तुक कारण से ॥ ( ४ ) ॥
२३४ चरकसंहिता [ अ० १६ चत्वारोऽपस्मारा इति वात-पित्त-कफ-सन्निपात-निमित्ताः । चत्वारोऽक्षिरोगाः, चत्वारः कर्णरोगाः, चत्वारः प्रतिश्यायाः, चत्वारो मुखरोगाः, चत्वारो ग्रहणीदोषाः, चत्वारो मदाः, चत्वारो मूर्च्छार्या इत्यपस्मारैर्व्याख्याताः । चत्वारः शोषा इति साहस-संधारण-क्षय-विष- माशनजाः, चत्वारि क्लैब्यानीति बीजोपघाताद्ध्वजभङ्गाज्जरायाः शुक्रक्षयाच्च ॥ ( ५ ) ॥ चार अपस्मार-वातजन्य, पित्तजन्य, कफजन्य और सन्निपातजन्य । चार आंख के और चार कान के रोग, चार प्रतिश्याय, चार मुखरोग चार ग्रहणी दोष, चार मद, चार मूर्च्छायें, ये अपस्मार के समान ( वात, पित्त, कफ और सन्निपातजन्य ) हैं। चार प्रकार का शोष, साहस, सन्धारण (मल-मूत्र के उपस्थित वेगों का रोकना ) क्षय तथा विषम भोजनजन्य । चार प्रकार की नपुंसकता-बीज के ( वीर्य के ) दोष से, ध्वज ( साधन ) के दोषसे, जरा ( बुढ़ापे ) से और शुक्र के क्षय के कारण ॥ ( ५ ) ॥ त्रयः शोथा इति वात-पित्त-श्लेष्म-निमित्ताः, त्रीणि किलासानीति रक्त-ताम्र-शूक्लानि, त्रिविधं लोहित-पित्तमित्यूर्ध्वभागमधोभागमुभय- भागं च ॥ ( ६ ) ॥ शोथ तीन प्रकार का-वातजन्य, पित्तजन्य और कफजन्य । तीन प्रकार के किलास-रक्त ( लाल ), ताम्र और शुक्ल ( श्वेत ) । तीन प्रकार का रक्त- पित्त ऊर्ध्वगामि, अधोगामि और उभयगामि ( ऊर्ध्व एवं अधः दोनों मार्गों से जाने वाला ) ॥ ( ६ ) ॥ द्वौ ज्वराविति उष्णाभिप्रायः शीतसमुत्थश्च शीताभिप्रायश्चोष्णस- मुत्थः, द्वौ व्रणौ इति निजश्चागन्तुजश्च, द्वावायामाविति बाह्यश्चाभ्यन्त- रश्च, द्वे गृध्रस्याविति वाताद्वातकफाच्च, द्वे कामले इति कोष्ठाश्रया शाखा- श्रया च, द्विविधमाममित्यलसको बिसूचिका च, द्विविधं वातरक्तमिति गम्भीरमुत्तानं च, द्विविधान्यर्शांसीति शुष्काण्यार्द्राणि च ॥ ( ७ ) ॥ ज्वर दो प्रकार का-शीत से उत्पन्न हुआ, जिसमें उष्ण उपचार की इच्छा हो, यह एक प्रकार का, उष्णिमा से उत्पन्न हुआ जिसमें शीत उपचार की इच्छा हो, यह दूसरी प्रकार का । व्रण दो प्रकार के-निज (शारीरिक) और आगन्तुज ( बाह्य कारण से ) दो आयाम-बाह्य और आभ्यन्तर । दो प्रकार का गृध्रसी रोग-वातजन्य और वात-कफजन्य । कामला दो प्रकार का-कोष्ठाश्रित और शाखा- श्रित । आम दो प्रकार का-अलसक और विसूचिका ( हैजा ) । वातरक्त दो
अ० १९ ] सूत्रस्थानम् २३५
अ० १९ ] सूत्रस्थानम् २३५ प्रकार का-गम्भीर और उत्तान ( त्वचा के पृष्ठवृत्ति ), अर्श दो प्रकार के— शुष्क और आर्द्र ॥ ७ ॥ एक ऊरुस्तम्भ इति आमत्रिदोषसमुत्थानः, एकः संन्यास इति त्रिदोषात्मको मनःशरीराधिष्ठानसमुत्थः, एको महागद इति अतत्त्वा- भिनिवेशः ॥ ( ८ ) ॥ ऊरुस्तम्भ एक प्रकार का—आम-दोषमिश्रित त्रिदोष जन्य । संन्यास एक प्रकार का त्रिदोषजन्य, मन और शरीर में आश्रित । महागद एक प्रकार का अतत्त्वाभिनिवेश अर्थात् यथार्थ तत्त्व का न जानना यह मन का विकार है है और संसार के सब दुःखों का कारण है ॥ ८ ॥ विंशतिः क्रिमिजातय इति यूकाः पिपीलिकाश्चेति द्विविधा बहिर्म- लजाः, केशादाः लोमादा लोमद्वीपाः सौरसा औदुम्बरा जन्तुमातरश्चेति षट्शोणितजाः, अन्त्रादा उदरादा हृदयदराश्चुरवो दर्भपुष्पाः सौगन्धिका महागुदाश्चेति सप्त कफजाः, ककेरुका मकेरुका लेलिहाः सशूल्काः सौसुरादाश्चेति पञ्च पुरीषजा इति विंशतिः क्रिमिजातयः । विंशतिः प्रमेहा इति उदकमेहश्चेक्षुरसमेहश्च सान्द्रमेहश्च सान्द्रप्रसादमेहश्च शुक्क्रमेहश्च शुक्रमेहश्च शीतमेहश्च शनैर्मेहश्च सिकतामेहश्च लालामेह- श्वेति दश श्लेष्मनिमित्ताः, क्षारमेहश्च कालमेहश्च नीलमेहश्च लोहि- तमेहश्च माञ्जिष्ठामेहश्च हरिद्रामेहश्चेति षट् पित्तनिमित्ताः, वसामेहश्च मज्जमेहश्च हस्तिमेहश्च मधुमेहश्चेति चत्वारो वातनिमित्ता इति विंशतिः प्रमेहाः । विंशतिर्योनिव्यापद इति वातिकी पैत्तिकी श्लैष्मिकी सान्निपातिकी चेति चतस्रः, दोष-दूष्य-संसर्ग-प्रकृति-निर्देशैरवशिष्टाः षोडश निर्दिश्यन्ते, तद्यथा—रक्तयोनिश्चारजस्का चाचरणा चातिच- रणा च प्राक्चरणा चोपप्लुता चोदावर्तिनी च कर्णिनी च पुत्रघ्नी चान्त- र्मुखी च सूचीमुखी च शुष्का च वामिनी च षण्डयोनिश्च महायोनि- श्चेति विंशतिर्योनिव्यापदः । केवलश्चायमुद्देशो यथोद्देशमभिनिर्दिष्ट इति ॥ ४ ॥ कृमियों की जातियां बीस प्रकार की हैं, यथा—यूक ( जूं ) और पिपीलि- काएं ( ढोग ) ये दो प्रकार के कृमि बाह्य मल ( पसीने आदि ) से उत्पन्न होते हैं । केशाद लोमाद, लोमद्वीप, सौरस, औदुम्बर और जन्तुमाता ये छः रक्तजन्य, अन्त्राद, उदराद, हृदयचर, चुरु, दर्भपुष्प, सौगन्धिक, महागुद ये सात कफजन्य, कके रुक, लेलिह, सशूलक, और सोसुराद ये पांच पुरीषजन्य हैं । ये बीस प्रकार के कमि हैं ।
२३६ चरकसंहिता [ अ० १६ प्रमेह बीस प्रकार के हैं । शुक्लमह, शुक्रमेह, शीतमेह, शनैर्मेह, सिकतामेह, लालामेह, उदकमेह, इक्षुमेह, सान्द्रमेह, सान्द्रप्रसादमेह ये दस प्रमेह कफजन्य, क्षारमेह, कालमेह, नीलमेह, लोहितामेह, मंजिष्ठामेह, हरिद्रामेह ये छः प्रमेह पित्तजन्य, वसामेह, मज्जामेह, हस्तिमेह और मधुमेह ये चार प्रमेह वातजन्य हैं । इस प्रकार से बीस प्रकार के प्रमेह हैं । योनिरोग बीस प्रकार के यथा वातिकी, पैत्तिकी, श्लैष्मिकी और सान्निपातिकी ये चार और बाकी सोलह दोषवातादि, दूष्य रक्तादि इनके संसर्ग से तथा प्रकृति निर्देश से होते हैं यथा—रक्तयोनि, अरजस्का, अचरणा, अतिचरणा, प्राक् चरणा,,उपप्लुता, परिप्लुता, उदावर्तिनी, कर्णिनी, पुत्रघ्नी, अन्तर्मुखी, सूचीमुखी, शुष्का, वामिनी, षण्डयोनि और महा- योनि ये बीस प्रकार के योनिरोग हैं। यहां पर केवल रोगों की नाम गणना ही की गई है, आगे विस्तार से यथास्थान कहेंगे ॥ ४ ॥ सर्वएव विकारा निजा नान्यत्र वातपित्तकफेभ्यो निर्वर्तन्ते, यथा हि शकुनिः सर्वं दिवसमपि परिपतन् स्वां छायां नातिवर्तते,तथा स्वधा- तुवैषम्यनिमित्ताः सर्वविकारा वातपित्तकफात्रातिवर्तन्ते, वातपित्त- श्लेष्मणां पुनः स्थान-संस्थान-प्रकृति-विशेषानभिसमीक्ष्य तदात्मकानपि च सर्वविकारांस्तानेवोपद्दिशन्ति बुद्धिमन्त इति ॥ ५ ॥ कहे या न कहे हुए सब प्रकार के रोग (शारीरिक रोग) वात पित्त कफ को छोड़कर नहीं हो सकते । वातपित्त कफ के कारण ही सब शारीरिक रोग होते हैं । जिस प्रकार कि सारे दिन भर उड़ता रहने पर भी पक्षी अपनी छाया का अतिक्रमण (उल्लंघन) नहीं कर सकता, उसी प्रकार शरीर के धातुओं की विषमता से उत्पन्न होनेवाले सब रोग बात पित्त और कफ को नहीं छोड़ सकते । बात, पित्त और कफ ही स्थान (रसादि बस्ति आदि), संस्थान (आकृति लक्षण), प्रकृति (कारण) इनकी विशेषताओं को देखकर, एवं वातादि जन्य सब विकारों को इन्हीं से उत्पन्न उक्तबुद्धिमान् कहते हैं ॥ ५ ॥ भवतश्चात्र— स्वधातुवैषम्यनिमित्तजा ये विकारसङ्घा बहवः शरीरे । न ते पृथक् पित्तकफानिलेभ्य आगन्तवस्त्वेव ततो विशिष्टाः ॥६॥ आगन्तुरन्वेति निजंविकारं निजस्तथाऽऽगन्तुमपि प्रवृद्धः । तत्रानुबन्धं प्रकृतिं च सम्यक् ज्ञात्वा ततः कर्म समारभेत ॥७॥ प्रायः जितने रोग शरीर के अन्दर शरीर की धातुओं की विषमता से उत्पन्न होते हैं, वे पित्त, कफ और वायु से पृथक् नहीं होते । आगन्तुक रोग इन वात पित्त, कफ से पृथक् हैं ।
अ० २० ] सूत्रस्थानम् २३७
अ० २० ] सूत्रस्थानम् २३७ निज (स्वतःशरीर में उत्पन्न हुए) रोग को आगन्तुज रोग अनुयान करता है। इसी प्रकार आगन्तुज (अभिघातजन्य) रोग के पीछे (कारण को लेकर), निज (अर्थात् शारीरिक लक्षणों से लक्षित) रोग भी हो जाता है। जैसे चोट लगने के पीछे ज्वर हो जाता है इसलिये अनुबन्धन (अप्रधान, मुख्य) और प्रकृति (मूल कारण को भली प्रकार जानकर चिकित्साकर्म आरम्भ करना चाहिये ॥ ६-७॥ तत्र श्लोकौ —विंशकाश्चैककाश्चैव त्रिकाश्चोक्तास्त्रयस्त्रयः । द्विकाश्चाष्टौ चतुष्काश्च दश द्वादश पञ्चकाः ॥ ८ ॥ चत्वारश्चाष्टका वर्गाः षट्कौ द्वौ सप्तकास्त्रयः । अष्टोदरीये रोगाणामध्याये संप्रकाशिताः ॥ ९ ॥ इस 'अष्टोदरीय' नामक अध्याय में बीस प्रकार के तीन, एक प्रकार के तीन, तीन प्रकार के तीन, दो प्रकार के आठ, चार प्रकार के दस, बारह प्रकार के पांच, चार प्रकार के आठ छः प्रकार के दो और सात प्रकार के तीन रोग कहे हैं ॥८-९॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने रोगचतुष्के अष्टोदरीयो नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥ —-•-— विंशोऽध्यायः । ━•━ अथातो महारोगाध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब इसके आगे महारोगाध्याय नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे- जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥२॥ चत्वारो रोगा भवन्ति—आगन्तु-वात-पित्त-श्लेष्म-निमित्ताः । तेषां चतुर्णामपि रोगाणां रोगत्वमेकविधं, रुक्सामान्यात् । द्विविधा पुनः प्रकृतिरेषां, आगन्तु-निज-विभागात् । द्विविधं चैषामधिष्ठानं, मनःशरीर- विशेषात् । विकाराः पुनरेषामपरिसंख्येयाः, प्रकृत्यधिष्ठान-लिङ्गायतन- विकल्प-विशेषात् , तेषामपरिसंख्येयत्वात् ॥ ३ ॥ मूलानि तु खल्वागन्तोन॑ख-दशन-पतनाभिचाराभिशापभिषङ्ग- व्यध-बन्ध-पीडनरज्जु-दहन-मन्त्राशनि-भूतोपसर्गादीनि. निजस्य तु मुखं वात-पित्तश्लेष्मणां वैषम्यम् ॥ ४ ॥
२३८ चरकसंहिता [ अ० २० द्वयोस्तु खल्वागन्तुनिजयोः प्रेरणमसात्म्येन्द्रियार्थसंयोगः, प्रज्ञा- पराधः, परिणामश्चेति ॥ ५ ॥ सर्वेऽपि तु खल्वेतेऽभिप्रवृद्धाश्चत्वारो रोगाः परस्परमनुबध्नन्ति, न चान्योन्यसंदेहमापद्यन्ते ॥ ६ ॥ आगन्तुर्हि व्यथापूर्वसमुत्पन्नो जघन्यं वातपित्तश्लेष्मणां वैषम्यमा- पादयति, निजे तु वातपित्तश्लेष्माणः पूर्वं वैषम्यमापद्यन्ते, जघन्यं व्यथामभिनिर्वर्तयन्ति ॥ ७ ॥ तेषां त्रयाणामपि दोषाणां शरीरे स्थानविभाग उपदेक्ष्यते, तद्यथा— बस्तिः पुरीषाधानं कटिः सक्थिनी पादावस्थीनि च वातस्थानानि, तत्रापि पक्वाशयो विशेषेण वातस्थानं, स्वेदो रसो लसीका रुधिरमामा- शयश्च पित्तस्थानानि, तत्राप्यामाशयो विशेषेण पित्तस्थानं, उरः शिरो ग्रीवा पर्वाण्यामाशयो मेदश्च श्लेष्मणः स्थानानि, तत्राप्युरो विशेषेण श्लेष्मणः स्थानम् ॥ ८ ॥ सर्वशरीरचरास्तु वातपित्तश्लेष्माणो हि सर्वस्मिन् शरीरे कुपिता- कुपिताः शुभाशुभानि कुर्वन्ति--प्रकृतिभूताः शुभान्युपचय-बल-वर्ण- प्रसादादीनि, अशुभानि पुनर्विऋतिमापन्नानि विकारसंज्ञकानि ॥ ९ ॥ तत्र विकारः—सामान्यजा, नानात्मजाश्च । तत्र सामान्यजाः पूर्व- मष्टोदरीये व्याख्याताः, नानात्मजांस्त्विहाध्यायेऽनुव्याख्यास्यामः, तद्यथा—अशीतिर्वातविकाराः, चत्वारिंशत्पित्तविकाराः विंशतिः श्लेष्मविकाराः ॥ १० ॥ रोग चार प्रकार के हैं आगन्तुज, वात, पित्त, कफजन्य, । इन चारों में ही रुक्-पीड़ा सामान्य है, इसलिये एक प्रकार है, वेदना की समानता होने से । इन चारों प्रकार के रोगों की प्रकृति दो प्रकार की है; आगन्तुज और निज शरीर में उत्पन्न होने वाले । इन रोगों के अधिष्ठान, आश्रय दो प्रकार के हैं, मन और शरीर । किन्तु रोग असंख्य है । क्योंकि प्रकृति, कारण नाम आदि अधिष्ठान ( दूष्य, रस, रक्तादि ), लिंग ( लक्षण ), आयतन ( बाह्य हेतु—दुष्ट आहार-बिहार ) इनके भेद असंख्य हैं । इसलिये रोग भी अगणित प्रकार के हो जाते हैं । आगन्तुज रोगों के मुख्य कारण दान्त का लगना, गिरना, अभिचार ( मारण आदि ), अभिशाप-शाप देना, अभिषङ्ग, अभिघात ( चोट का- लगना ) वध ( मारना ), बन्धन ( बाँधना ), दबाना, रस्सी से बांधना, जलाना, शस्त्र का लगना, बिजली का गिरना, ये सूक्ष्मभूत त्रस के उपद्रव के कारण हैं । जिन शारीरिक जन्य रोगों के मुख्य कारण वात,