भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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अ० ६ ] शारीरस्थानम् ८५ कथंभूतश्च निष्क्रामति, कैश्चायमाहारोपचारैर्जातः सद्यो हन्यते, जातस्तु कैरव्याधिरभिवर्धते, किं चास्य देवादिप्रकोपनिमित्ता बिकाराः सम्भवन्ति, आहोस्विन्न, किचास्य कालाकालमृत्योर्भावाभावयोर्भगवान्ध्यवस्यति, किंवास्य परमायुः, कानि चास्य परमायुषो निमित्तानीति ॥ १८ ॥ गर्भ के सम्बन्ध में प्रश्न—इस प्रकार से उपदेश करते हुए भगवान् आत्रेय को अग्निवेश ने कहा—हे भगवन् ! आपने शरीर के अधिकरण में जा कुछ कहा वह सुन लिया । ( १ ) अब बतलाइये कि गर्भाशय मे गर्भ का प्रथम कौन सा अंग बनता है ? (२) गर्भ का मुख किधर रहता है और (३) गर्भा- शय के भीतर गर्भ किस स्थिति में रहता है ? ( ४ ) किस आहार से जीता है और ( ५ ) किस प्रकार से बाहर आता है ? ( ६ ) किन २ प्रकार के आहार उपचारां से उत्पन्न हुआ यह शीघ्र मर जाता है ? ( ७ ) उत्पन्न होकर नीरोग अवस्था मे किन से बढ़ता है ? ( ८ ) क्या इस गर्भ को देवता आदि के प्रकोप के कारण होनेवाले विकार होते हैं वा नहीं ? ( ६ ) क्या इस गर्भ में भी काल मृत्यु और अकाल-मृत्यु के होने और न होने का भगवान् निश्चय करता है । (१०) इस गर्भ की परम आयु क्या है और (११) परमायु के क्या कारण हैं ॥१८॥ तमेवमुक्तवन्तमग्निवेशं भगवान् पुनर्वसुरात्रेय उवाच—पूर्वमुक्तमे- तद् गर्भावक्रान्तौ यथाऽयमभिनिर्वर्तते कुक्षौ, यच्चास्य यदा संतिष्ठतेऽ- ङ्गजातम् । विप्रतिपत्तिवादास्त्वत्र बहुविधा सूत्रकारिणामृषीणां सन्ति सर्वेषां, तानपि निबोधोच्यमानान्—शिरः पूर्वमभिनिर्वर्तते कुक्षाविति कुमारशिरा भरद्वाजः पश्यति, सर्वेन्द्रियाणां तदधिष्ठानमिति कृत्वा । हृदयमिति काङ्कायनो बाह्लीकभिषक्, चेतनाधिष्ठानत्वात् । नाभिरिति भद्रकाप्यः, आहारागम इति कृत्वा । पक्वाशयगुदमिति भद्रशौनक, मारुताधिष्ठानत्वात् । हस्तपादमिति वडिशः, तत्करणत्वात्पुरुषस्य । इन्द्रियाणीति जनको वैदेह, तान्यस्य बुद्धयधिष्ठानानोति कृत्वा । परो- क्षत्वादचिन्त्यमिति मारीचि कश्यपः, सर्वाङ्गनिर्वृत्तिर्युगपदिति धन्व- न्तरि, तदुपपन्नं सिद्धत्वात्, सर्वाङ्गानां तस्य हृदयं मूलमधिष्ठानं च केषांचिद्भावानां, न च तस्मात्पूर्वाभिनिर्वृत्तिरेषा, तस्माद्धृदयप्रभृतीनां सर्वाङ्गाना तुल्यकालाभिनिर्वृत्तिः । सर्वभावा ह्यन्योन्यप्रतिबद्धाः । तस्माद्यथाभूतं दर्शनं साधु ॥ १६ ॥ इस प्रकार से कहते हुए अग्निवेश को भगवान् पुनर्वसु आत्रेय ने कहा— जिस प्रकार से गर्भ गर्भाशय में बढ़ता है यह बात पीछे 'गर्भावक्रान्ति' अध्याय