भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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८६ चरकसंहिता [ अ० ६ में कह चुके हैं। इस गर्भ की अगरचना मे सूत्रकार ऋषियो के बहुत प्रकार के मतभेद हैं । उन सब को भी सुनो—कुमारशिरा भरद्वाज का दर्शन है कि गर्भाशय में गर्भ का प्रथम शिर बनता है, क्योंकि यही शिर सब इन्द्रियो का आश्रय स्थान है । बाह्लीक भिक्कू काङ्कायन का मत यह है कि सबसे प्रथम हृदय बनता है, क्योंकि हृदय ही चेतना का स्थान है। भद्रकाप्य का कथन है कि सबसे प्रथम नाभि बनती है क्योकि आहार प्राप्ति का यहा मार्ग है । भद्रशौनक का मत है कि प्रथम पक्वाशय, गुदा बनती है, क्योकि यही वायु का स्थान है। बडिश का कथन है कि प्रथम हाथ पाव बनते हैं, क्योकि ये ही पुरुष के करण (साधन) हैं। वैदेह जनक ऋषि का मत है कि इन्द्रियाँ सबसे प्रथम बनती हैं, क्योंकि ये इन्द्रियाँ ही बुद्धि (ज्ञान) का आश्रय स्थान हैं। मारीचि कश्यप का कहना है कि परोक्ष हान के कारण कौन सा अग प्रथम बनता है यह कुछ नहीं कहा जा सकता, यह अचिन्त्य विषय है । धन्वन्तरि का मत है कि सब अग एक साथ मे बनते है । यह बात ठीक भी है। ऐसा ही प्रमाणो से सिद्ध होता है । गर्भ के सब अगों का तथा कुछ अन्य वस्तुओं का मूल आश्रयस्थान हृदय है। इसलिये इस हृदय से पूर्व अन्य अग नहीं बन सकते । अतः हृदय आदि सब अगो का निर्माण एक साथ में ही होता है । सब पदार्थ परस्पर एक दूसरे के साथ सम्बन्धित हैं । इसलिये यह यथार्थ दर्शन (धन्वन्तरि का मत) ही ठीक है ॥ १९ ॥ गर्भस्तु खलु मातुः पृष्ठाभिमुख ऊर्ध्वशिराः संकुच्याङ्गान्यस्ते जरायुवृतः कुक्षौ ॥२०॥ गर्भाशय में गर्भ माता की पीठ की ओर मुख किये हुए रहता है। गर्भ का शिर ऊपर (गर्भाशय के शिखर में) रहता है और अङ्ग सकुचित अवस्था में रहते हैं ॥२०॥ व्यपगत-पिपासा-बुभुक्षस्तु खलु गर्भः परतन्त्रवृत्तिः, मातरमाश्रित्य वर्तयत्युपस्नेहोपस्वेदाभ्या गर्भस्तु सदसद्भूताङ्गावयवः, तदनन्तर ह्यस्य लोमकूपायनै रुपस्नेहः कश्चिन्नाभिनाड्ययनैः । नाभ्या ह्यस्य नाडी प्र- सत्ता, सा नाभ्या चापरा, अपरा चास्य मातुः प्रसक्ता हृदये, मातृहृदयं ह्यस्य तामपरामभिस्रववे सिराभिः स्यन्दमानाभिः, स तस्य रसो बलवर्णकरः सपद्यते, स च सर्वरसवानाहारः स्त्रिया ह्यापन्नगर्भायास्त्रिधा रसः प्रतिपद्यते स्वशरीरपुष्टये स्तन्याय गर्भवृद्धये च, स तेनाहारेणो- पष्टब्ध परतन्त्रवृत्तिर्मातरमाश्रित्य वर्तयत्यन्तर्गतः ॥२१॥