भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 13, कुल 616 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 13

[ ५२ ]

[बायाँ स्तम्भ] रोगो में शस्त्रचिकित्सा । उपसहार । चतुर्दशोऽध्यायः (पृ० ५४६-५८८) अर्शश्चिकित्सितम्— प्रश्न और उप- देश । अर्श रूप । अर्शभेद । अर्श संज्ञा विवेक । सहज र्श । लक्षण उत्पत्ति । कारण । वातादिजन्य अशो की विशे- षता । वातजन्य अर्श के कारण । पित्त- जन्य अर्श के कारण-कफ प्रधान अर्श के लक्षण । कारण । पूर्वरूप । असा- ध्यता । चिकित्सा । अर्श पर शस्त्र के अयुक्त प्रयोग से हानियो की सम्भावना, शुष्क अर्शो की चिकित्सा । आठ प्रलेप, दूषित रक्त पर जलोका प्रयोग । पाचन योग । दश योग । तक्रारिष्ट । तक्र का सर्वोपरि प्रयोग । मास रस का प्रयोग । तक्रों और यूषों का प्रयोग । अनेक योग । तीन घृत-चव्यघृत । नागराद्य- घृत । पिप्पलाद्य घृत । मास रस । शाक । अनुवासन । अनेक योग-अभया- रिष्ट । दन्त्यरिष्ट । फलारिष्ट । शर्करा- सव । कनकारिष्ट । शुष्क अर्शों की सिद्ध फल-चिकित्सा । स्रावी अर्शों की सिद्ध-चिकित्सा । रक्तपित्तोल्बण स्रावी चिकित्सा-अन्ययोग कुटजादि रस क्रिया, अनेक योग और पथ्य अर्श के मस्सों का प्रतिसारण । पिच्छाबस्ति । ह्रीवेरादि घृत । सुनिषण्णकचाङ्गेरीघृत । उपसंहार । पञ्चदशोऽध्यायः (पृ० ५८६-६३२) ग्रहणीचिकित्सितम्—जाठर अग्नि वा देहाग्नि की प्रधानता । देहाग्नि द्वारा आहार पाचन की चूल्हे पर रखी भात की हडिया से तुलना । आहार से रस का बनना । उससे इन्द्रियो का तर्पण ।


[दायाँ स्तम्भ] भौम आदि पाच प्रकार की उष्माए, उन द्वारा पाच प्रकार के गुणों का पाक, सात अग्नियो द्वारा सात देह धातुओ के दो प्रकार के पाक, किट्ट और प्रसाद । प्रसादज धातु, रस द्वारा धातुओ के पोषण मे ४ प्रकार के न्यायो का वर्णन । उपधातुओ की उत्पत्ति । किट्ट का रूप । आहार रसो को धातुओ मे बदलने का काल क्रम । धातु-परिवर्तन के सम्बन्ध से चक्रपाणि का मत-अचि सन्तान और शब्दसन्तान का दृष्टान्त । आहर रस से रक्तादि बनने के सम्बन्ध मे अग्निवेश का प्रश्न । आत्रेय का उत्तर । रस को फैलाने मे विक्षेपक व्यान का कार्य, निरन्तर गतिशील रस के स्रोतों में रुक जाने से व्याधियों की उत्पत्ति । तीन प्रकार की अग्नियों मे जाठराग्नि की मुख्यता । अजीर्ण के सामान्य कारण । सामान्य लक्षण । घोर अन्नविष की उत्पत्ति, उसके द्वारा अनेक रोगो की उत्पत्ति । विषमाग्नि के द्वारा धातु-वैष- म्य और देह-शोष । समाग्निसे धातु- सरता दुर्बलाग्नि द्वारा अन्न का विदग्ध होना, उसका गुदद्वार से विरेचन, ग्रहणी रोग का स्वरूप, ग्रहणी के लक्षण, ग्रहणी के पूर्वरूप, ग्रहणी का स्थान और निरुक्ति। ग्रहणी रोग के ४ प्रकार । वातजन्य ग्रहणी लक्षण । पैत्तिक ग्रहणी-लक्षण । कफजन्य ग्रहणी-लक्षण। ग्रहणी दोष। सन्निपातजन्य ग्रहणी । ग्रहणी चिकित्सा । आम दोष में चिकित्सा-दशमूलाद्य घृत । त्र्यूषणाद्य घृत । पञ्चमूलाद्य चूर्ण । अन्य