चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ८ ] शारीरस्थानम् १२१ पृथ्वी, जल आकाश, अग्नि, वायु, विष्णु और प्रजापति तुझ सगर्भा का सदा पालन करे और तुझे शल्यरहित करें । हे शुभ सुन्दर मुख वाली ! तू बिना किसी कठिनाई के क्लेशरहित गर्भ का प्रसव कर । तू स्कन्द से अभिरक्षित, स्कन्द के समान तेजवाले पुत्र को उत्पन्न कर ॥ ४१ ४२ ॥ ताश्चैना यथोक्तगुणाः स्त्रियोऽनुशिष्युः—अनागतावीर्मा प्रवाहिष्ठाः, या ह्यनागतावीः प्रवाहयते व्यर्थमेवास्यास्तत्कर्म भवति । प्रजा चास्या अविकृता विकृतिमापन्ना वा श्वास-कास-शोष-प्लीह-प्रसक्ता वा भवति । यथा हि क्षवथूद्गार-वात-मूत्र-पुरीष-वेगान् प्रयतमानोऽप्यप्राप्तकालान्न लभते कृच्छ्रेण वाप्यवाप्नोति तथाऽनागतकालं गर्भमपि प्रवाहमाणा, तथा चैषामेव क्षवथ्वादीनां संधारणमुपघातायोपपद्यते तथा प्राप्तका- लस्य गर्भस्याप्रवाहणं, सा यथानिर्देशं कुरुष्वेति वक्तव्या, तथा च कुर्वती शनैः शनैः पूर्वं प्रवाहेत ततोऽनन्तर बलवत्तरं, तस्या च प्रवाह- माणायां स्त्रियः शब्दं कुर्युः 'प्रजाता प्रजाता धन्यं धन्यं पुत्र'-मिति, तथाऽस्या हर्षेणाऽऽप्यायन्ते प्राणाः ॥ ४३ ॥ पूर्वोक्त गुणो वाली स्त्रिया इस स्त्री को शिक्षा देवे कि बिना वेदनाओं के उत्पन्न हुए प्रवाहण ( जोर ) मत करना । जो स्त्री वेदनाओं के उत्पन्न हुए बिना प्रवाहणकरती (जोर लगाती) है उसका श्रम व्यर्थ जाता है । इस स्त्री की स्वस्थ प्रजा विकृत हो जाती है अथवा इस संतान को श्वास, कास, शोष, प्लीहा आदि रोग लग जाते है । जिस प्रकार कि न उपस्थित हुए छींक, उद्गार, वायु, मूत्र और मल के वेगों को बलपूर्वक बाहर नहीं कर सकते अथवा कठिनाई से थोड़ा बाहर करते हैं, उसी प्रकार बिना समय के गर्भ को प्रवाहण करने से बाहर नहीं निकाल सकते । जिस प्रकार कि छींक आदि के उपस्थित वेग को रोकने से पीड़ा होती है, उसी प्रकार बाहर आते हुए गर्भ को रोकने में भी कष्ट होता है । इसलिये उसे निर्देशानुसार करने के लिए कहना चाहिये । इस प्रकार विधि अनुसार करने मे प्रथम धीरे धीरे बल लगावे । इसके पीछे अधिक बल लगावे । बल लगाते ( प्रवाहण के ) समय स्त्रिया शब्द करें, “पैदा हुआ, पैदा हुआ भाग्यशाली पुत्र, भाग्यशाली पुत्र पैदा हुआ ।” इस प्रकार प्रसन्नता के द्वारा प्राणों को बल प्राप्त होता है, उसका उत्साह बना रहता है ॥ ४३ ॥ यदा च प्रजाता स्यात्तदैनामवेक्षेत काचिदस्या अपरा प्रपन्ना अप्र- पन्ना वेति । तस्याश्चेदपरा न प्रपन्ना स्यादथैनामन्यतमा स्त्री दक्षिणेन पाणिना नाभेरूपरिष्टाद्बलवनिष्पीड्य सव्येन पृष्ठत उपसंगृह्य सुनिर्धूतं