भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 135, कुल 616 में से

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१२० चरकसंहिता [ अ० ८ ~~ ~~~ ~~ ~~~ ~ ~~~ ~ न्मुसलग्रहणं परिहार्यमृषयो मन्यन्ते, जृम्भणं चङ्क्रमणं च पुनरनु- ज्ञेयमिति ॥ ३८॥ भगवान् आत्रेय का कहना है कि यह ठीक नहीं है । क्योंकि गर्भिणी स्त्री के लिये कठोर व्यायाम करना सब अवस्थाओं में निषिद्ध है। खास कर प्रसव के समय जब कि शरीर के सब धातु, दोष अस्थिर होते हैं, उस समय सुकुमार शरीर वाली स्त्री का मूसल लेकर धान कूटने से वायु कारण को पा कर प्राणों का नाश कर दे और उस समय गर्भिणी विशेष रूप से चिकित्सा के लिये कृच्छ्रसाध्य होती है । इसलिये ऋषियों का मत है कि मूसल ग्रहण नहीं करना चाहिये । अगड़ाई या चलना फिरना अवश्य करना चाहिये ॥ ३८ ॥ अथास्यै दद्यात्कुष्ठैला लाङ्गलीकी-वचा-चित्रक-चिरबिल्व-चूर्णमुपा- घ्रातुं सा तन्मुहुर्मुहुरुपजिघ्रेत्, तथा भूर्जपत्रधूमं शिशपाधूमं वा, तस्या- श्चान्तरान्तरा कटी-पार्श्व-पृष्ठ-सक्थि-देशानीषदूष्णेन तैलेनाभ्यज्यानुसु- खमवमृद्नीयान्, इत्यनेन तु कर्मणा गर्भोऽवाक्प्रतिपद्यते ॥३६॥ इसको सूंघने के लिये कूट, इलायची, कलिहारी, वच, चित्रक, करज और चविका इनका चूर्ण देना चाहिये । इस चूर्ण को स्त्री बार बार सूँघे । इसी प्रकार भोज पत्र के या शीशम के पत्तों का धुवा देना चाहिये । बीच बीच में गर्भिणी की कटि, पार्श्व, पीठ, टांगो को गुनगुने तैल से धीरे धीरे मलना चाहिये । इस प्रकार करने से गर्भ नीचे की ओर आ जाता है ॥ ३६ ॥ स यदा जानीयाद्विमुच्य हृदयमुदरमस्यास्त्वाविशति, बस्तिशिरोऽ- वगृह्णाति, त्वरयन्त्येनामाव्यः, परिवर्तते अधो गर्भ इति, अस्यामव- स्थायां पर्यङ्कमेनामारोप्य प्रवाहितुमुपक्रामयेत्, कर्णे चास्या मन्त्रमिम- मनुकूला स्त्री जपेत् ॥ ४० ॥ जिस समय यह पता लगे कि गर्भ उदर से पृथक् हो गया, गर्भ का शिर बस्ति में घुस रहा है, प्रसवकाल की वेदनाये जल्दी जल्दी होने लगी हैं, गर्भ नीचे की ओर घूम रहा है तब इस अवस्था में स्त्री को पलंग पर लेटा कर प्रवाहण ( बलपूर्वक मूत्र करने का सा जोर लगाने ) के लिये कहे । इस स्त्री के कानों में एक परिचित हितैषिणी स्त्री निम्नलिखित मंत्र का जप करे ॥४०॥ 'क्षितिर्जलं वियत्तेजो वायुर्विष्णुः प्रजापतिः । सगर्भां त्वां सदा पान्तु वैशल्यं च दिशन्तु ते ॥४१॥ प्रसुव त्वमविक्षिष्टमविक्षिष्टा शुभानने । कार्तिकेयद्युति पुत्रं कार्तिकेयाभिरक्षितम्' ॥४२॥ इति

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