भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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साथ, गौ, ब्राह्मण के पीछे चलती हुई स्त्री भली प्रकार से सूतिकागार में प्रवेश करे, वहा पर प्रसव काल की प्रतीक्षा करे ॥ ३४ ॥ तस्यास्तु खल्विमानि लिङ्गानि प्रजननकालमभितो भवन्ति । तद्यथा—क्लमो गात्राणा, ग्लानिराननस्य, अक्ष्णोः शैथिल्यं, विमुक्त- बन्धनत्वमिव वक्षसः, कुक्षेरवस्स्रंसनं, अधो गुरुत्व, वङ्क्षण-बस्ति-कटी- कुक्षि-पार्श्व-पृष्ठ-निस्तोदो, योनेः प्रस्रवणं, अनन्नाभिलाषश्चेति । ततोऽन- न्तरमावीनां प्रादुर्भावः प्रसेकश्च गर्भोदकस्य ॥ ३५ ॥ प्रमव काल उपस्थित होने पर निम्न लक्षण उपस्थित होते हैं। जैसे— शरीर में श्रान्ति, चेहरे और आखों में ग्लानि (विवर्णता), बन्धन मुक्त होता प्रतीत होता है, गर्भाशय का नीचे को आना, निचले अगो में भारीपन वंक्षण, बस्ति, कटि, कुक्षि, पार्श्व और पीठ में वेदना, योनि मे स्राव और भोजन में अनिच्छा होती है। इसके अनन्तर प्रसव काल की वेदना आरम्भ हो जाती है और गर्भ का जल बहने लगता है ॥ ३५ ॥ आवीप्रादुर्भावे तु भूमौ शयनं विदध्यान्मृद्वास्तरणोपपन्नम् । तद- ध्यासीत सा । तां ता समन्ततः परिवार्य यथोक्तगुणाः स्त्रिय पर्युपा- सीरन्नाश्वासयन्त्यो वाग्भिर्ग्राहिणीभिः सान्त्वनीयाभिः ॥ ३६ ॥ प्रसव काल की वेदनाओं के आरम्भ होने पर भूमि पर कोमल बिस्तर लगा देना चाहिये । इस बिस्तर पर वह बैठ कर जाये । इसको चारों ओर से स्त्रिया (पूर्वोक्त गुणोवाली) घेर ले और शान्ति और आश्वासन देनेवाले वचनों से सान्त्वना देती रहे ॥ ३६ ॥ सा चेदावाभिः संक्लिश्यमाना न प्रजायेताथैन ब्रूयात्—उत्तिष्ठ मुसलमन्यतरत् गृहीष्व, अनेनतदुदूखलं धान्यपूर्ण मुहुर्मुहुरभिर्जाह मुहु- र्मुहुरवजृम्भस्व चङ्क्रमस्व चान्तरन्तरा, इत्येवमुपदिशन्त्येके ॥ ३७ ॥ वेदनाओ के कारण पीड़ित होने पर भी यदि बच्चा पैदा न हो तो इसको आदेश करे कि उठ, दोनों में से किसी एक मूसल को लेकर धान्य से परिपूर्ण ऊखल को बार बार कूट, बार बार अगडाई और जभाई ले, बार बार बीच मे चल फिर । ऐसा कई आचार्य कहते हैं ॥ ३७ ॥ तन्नेत्याह भगवानात्रेयः—दारुण व्यायाम-वर्जनं हि गर्भिण्याः सततमुपदिश्यते, विशेषतश्च प्रजननकाले प्रचलित-सर्वधातु-दोषाया- सुकुमार्या नार्या मुसल-व्यायाम समीरितो वायुरन्तरं लब्ध्वा प्राणान् हिस्यात्, दुष्प्रतीकारा हि तस्मिन् काले विशेषेण भवति गर्भिणी, तस्मा-