चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 141, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें१२६ चरकसंहिता [ अ० ८ सर्पिस्तैलाभ्यामभ्यज्य वेष्टयेदुदरं महता वाससा, तथा 'तस्या न वायु- रुदरे विकृतिमुत्पादयत्यनवकाशत्वात् । जीर्णे तु स्नेहे पिप्पल्यादिभिरेव सिद्धा यवागू सुस्निग्धा द्रवा मात्रशः पाययेत्, उभयतः कालमच्छेन चोष्णोदकेन परिषेचयेत्प्राक्स्नेहयवागूरानाभ्याम् । एव पञ्चरात्रं सप्तरात्रं वानुपाल्य ततः क्रमेणाप्याययेत् । स्वस्थवृत्तमेतावत्सूतिकायाः ॥ ४९ ॥ जच्चा स्त्री को भूख लगने पर शक्ति के अनुसार खूब यत्न से स्नेहपान कराना चाहिये । घी, तैल, वसा या मज्जा ५ जो स्नेह जच्चा के प्रकृति के अनुकूल हो, उसके साथ पिप्पलीमूल, चविका, चित्रक और सोंठ का चूर्ण मिला कर देना चाहिये । स्नेहपान करते समय पेट पर घी या तैल मल कर भारी वस्त्र लपेट देना चाहिये । इस प्रकार करने से उदर में वायु विकार उत्पन्न नहीं होते, क्योंकि वायु को अवकाश नहीं मिलता । स्नेह के जीर्ण होने पर पिप्पलीमूल आदि से सिद्ध की हुई, घृत युक्त, पतली यवागू को थोड़ी मात्रा में प्रातः और सायं दोनो समय देना चाहिये । स्नेह और यवागू पिलाने से पूर्व निर्मल गरम पानी से स्नान करवा देना चाहिये । इस प्रकार पांच या सात रात्रि तक इस विधि को बरत कर पीछे क्रम से [ साधारण आहार-विहार ] बढ़ाना चाहिये । यह सूतिका स्त्री का स्वस्थवृत्त है ॥ ४९ ॥ तस्यास्तु खलु यो व्याधिरुत्पद्यते स कृच्छ्रसाध्यो भवत्यसाध्यो वा गर्भवृद्धि क्षयित-शिथिल-सर्वशरीर-धातुत्वात्प्रवाहण-वेदना-क्लेदन-रक्त- निःस्रुति-विशेष-शून्य-शरीरत्वाच्च, तस्मात्ता यथोक्तेन विधिनोपचरत् । भौतिक जीवनीय-बृहणीय-मधुर-वातहर-सिद्धैरभ्यङ्गोत्सादन-परिषेका- वगाहनान्नपान-विधिभिर्विशेषतश्चोपचरेत् । विशेषतो हि शून्यशरीराः स्त्रियः प्रजाता भवन्ति ॥ ५० ॥ प्रसूता स्त्री को विपरीत आहार विहार के कारण जो रोग उत्पन्न हो जाता है, वह कष्टसाध्य अथवा असाध्य होता है । क्योंकि गर्भ की वृद्धि के कारण अन्य धातुओं का पोषण न होने से सब धातु क्षीण और शिथिल हो जाते हैं । इसी प्रकार गर्भ के प्रवाहण के कारण उत्पन्न वेदना, क्लेदन ( स्राव ), तथा रक्त के विशेष रूप में निकलने से सम्पूर्ण शरीर शून्य, नि सज्ञ बना होता है । भूतहर गुग्गुलु, महापैशाचादि घृत, जीवनीय, बृहणीय, मधुर और वातहर ओषधियों से सिद्ध स्नेह-पान, अभ्यग, उत्सादन, परिषेक, अवगाहन, खान- पान विधि विशेष रूप से बरतनी चाहिये । इस विधि के सेवन से अचेत हुई स्त्रियों में भी चेतना आ जाती है ॥ ५० ॥