चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ८] शारीरस्थानम १२७ दशम्यां निश्यतीताया सपुत्रा स्त्री सर्वगन्धोषधैर्गौरसर्षपैश्च स्नाता लघ्वहतशुचिवस्त्रं परिधाय पवित्रेट्ट लघु-विचित्र-भूषणवती च संस्पृश्य मङ्गलान्युचितामर्चयित्वा च देवता शिखिनः शुक्लवाससोऽव्यङ्गांश्च ब्राह्मणान् स्वस्ति वाचयित्वा, कुमारमहतेन शुचिवाससाऽऽच्छादयेत् प्राक्शिरसमुदक्शिरसं वा सवेश्य, 'देवतापूर्वं द्विजातिभ्यः प्रणमती'- त्युक्त्वा, कुमारस्य पिता द्वे नामनी कारयेन्नाक्षत्रिकं नामाभिप्रायिकं च । तत्राभिप्रायिकं नाम घोषवदाद्यन्तस्थान्तमूष्मान्तं वा वृद्धत्रिपु- रुषानुकमनवप्रतिष्ठितं, नाक्षत्रिकं तु नक्षत्र-देवतासमानाख्यं द्व्यक्षरं चतुरक्षरं वा ॥ ५१ ॥ दसवें दिन स्त्री पुत्र के साथ सम्पूर्ण गन्ध युक्त ओषधियों से तथा श्वेत सरसों के उबटन से स्नान करके लघु (हल्के), नवीन और पवित्र वस्त्र को धारण करे । पवित्र, मन चाहे लघु, विचित्र आभूषणों को धारण करे । मङ्गल जनक (घी, दही आदि) वस्तुओं को स्पर्श करके, इष्ट देव की पूजा करके शिखा वाले, शुक्ल वस्त्र पहिने, व्यङ्गरहित, शोभन आकृतिवाले ब्राह्मणों से स्व- स्ति पाठ करावे, कुमार के लिये नवीन वस्त्रों का सङ्ग्रह करे । शिशु का सिर पूर्व दिशा अथवा उत्तर दिशा की ओर करके, कहे कि बालक देवा और विद्वानों को नमस्कार करता ह ऐसा कह कर शिशु का पिता नक्षत्र देवता वाला [ जिस नक्षत्र में कुमार उत्पन्न हुआ है उस नक्षत्र के सकेत वाला ] शिशु का नाम करे । बच्चे के दो प्रकार के नाम करे, एक नक्षत्र-देवता के नाम पर और दूसरा अभिप्राय अर्थात् अर्थयुक्त । इनमें अभिप्राय वाला नाम घोषवर (वर्ग का चौथा अक्षर-घ, झ, ढ, ध, भ,), अन्तस्थ (य र ल व ) और उष्मान्त (श, ष, स, ह,), और कुल के वृद्ध तीन पुरुषों के नामों में से किसी एक के समान, निन्दारहित नाम करना चाहिये । नक्षत्र देवतावाला नाम नक्षत्र देवता के समान होना चाहिये । नाम दो अक्षर वाला अथवा चार अक्षरों वाला रखना चाहिये ॥ ५१ ॥ कृते च नामकर्मणि कुमारं परीक्षितुमुपक्रमेतायुषः प्रमाणज्ञान- हेतोः। तत्रेमान्यायुष्मतां कुमाराणां लक्षणानि भवन्ति । तद्यथा एके- कजा मृद्वोऽल्पाः स्निग्धाः सुबद्धमूलाः कृष्णाः केशाः प्रशस्यन्ते, स्थिरा बहला त्वक् प्रकृत्या, प्रकृतिसुसम्पन्नमीषत्प्रमाणातिवृत्तमनुरूपमात- पत्रोपमं शिरः, व्यूढं दृढं समं सुश्लिष्ट-शङ्ख-सन्ध्यूर्ध्व-व्यञ्जनमुपचितं बिलनमर्धचन्द्राकृति ललाटं, बहलौ विपुलसमपीठौ नीचैर्वृद्धौ पृष्ठतोऽ-