चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 143, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें१२८ चरकसंहिता [अ० ८ वनतौ सुश्लिष्ट-कर्ण पुत्रकौ महाच्छिद्रौ कर्णौ, ईषत्प्रलम्बिन्यावसद्भगते समे संहते महत्यौ भ्रुवौ, समे समाहितदर्शने व्यक्तभागविभागे बल- वती तेजसोपपन्ने स्वङ्ग-पाङ्गे चक्षुषी, ऋज्वी महोच्छ्वासा वंशसंपन्ने- षदनवताग्रा नासिका, महदृजु-सुनिषिष्टदन्तमास्य, आयामविस्तारोप- पन्ना श्लक्ष्णा तन्वी प्रकृतिवर्णयुक्ता जिह्वा, श्लक्ष्ण युक्तोपचयमूष्मोपपन्नं रक्तं तालु, महानदीनः स्निग्धोऽनुनादी गम्भीरसमुत्था धारः स्वरः, नातिस्थूला नातिकृशावास्यप्रच्छादनो रक्तावोष्ठौ, महत्यौ हनू, वृत्ता नातिमहती ग्रीवा व्यूढमुपचितमुरः, गूढ जत्रु पृष्ठवशश्च, विप्रकृष्टा- न्तरो स्तनौ, असपातिनी स्थिरे पार्श्वे, वृत्तपारेपूर्णापतो बाहू, सक्थिनी अङ्गुलयश्च, महदुपचित पाणिपाद, स्थिरा वृत्ताः स्निग्धास्ताम्रास्तुङ्गा कूर्माकारा करजाः, प्रदक्षिणावर्ती सोत्सङ्गा च नाभिः, उरस्त्रिभागाह्वाना समा समुपचिनमांसा कटी, वृत्तौ स्थिरोपचितमासौ नात्युन्नतौ स्फिचौ, अनुपूर्ववृत्तावुपचययुक्तावूरू, नात्युपचिते नात्यपचिते एणांपदे प्रगूढ- सिरास्थि सन्धी जङ्घे, नात्युपचितौ नात्यपचितौ गुल्फौ, पूर्वोपदिष्ट- गुणौ पादौ कूर्माकारौ, प्रकृतियुक्तानि वातमूत्रपुरीषाणि तथा स्वप्न- जागरणायास-स्मित-रुदित-स्तनग्रहणानि । यच्च किंचिदन्यदप्यनुक्तमस्ति तदपि सर्व प्रकृतिमुक्तमिष्टम्, विपरीत पुनरनिष्टम्। इति दीर्घायु- र्लक्षणानि ॥ ५२ ॥ नामकरण सस्कार हो चुकने पर आयु के प्रमाण ज्ञान के लिये कुमार की परीक्षा करना चाहिये । आयुष्य वाले कुमारो के निम्न लक्षण होते ह। यथा— एक एक पृथक्, कोमल, छोटे, स्निग्ध, दृढमूल वाले काले बाल उत्तम हैं। स्थिर, स्वाभाविक त्वचा प्रशस्त है। प्रकृति (छ अगुल ऊंचा, ३२ अगुल चौड़ा ) सम्पन्न, शरीर के अनुरूप, छाते के समान गोल शिर प्रशस्त है। चाड़ा दृढ, समान शंख सधि से भली प्रकार जुड़ा, ऊपर को उठा, बलवान्, अर्द्धच- न्द्राकार ललाट प्रशस्त है । बड़े, विशाल, समान पीठ वाले, नीचे की ओर बड़े, पीछे से नीचे, खूब मिले कर्णपुत्रक, प्रशस्त है । बहुत बड़े छिद्रों वाले, थोड़े लटकते हुए कान (जैसे कि कान भगवान् बुद्ध की मूर्त्तियों मे बने होते हैं) प्रशस्त है। परस्पर न मिलीं परन्तु परस्पर समान एक दूसरे के तुल्य बड़ी भोंहे प्रशस्त हैं। समान तुल्य, उत्तम दृष्टि युक्त, काला और श्वेत भाग स्पष्ट दीखता हो, बलवान्, तेज से युक्त, अपने अग और उपाग युक्त आखें प्रशस्त हैं। सीधी, बड़े उच्छ्वास से युक्त, उन्नत वश वाली आगे से थोड़ी, झुकती नासिका प्रशस्त है। महान्, सरल, खूब एक समान जुड़े हुए दान्तों वाला मुख उत्तम है।