चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ८ ] ६ शरीरस्थानम् १२६ लम्बाई और विस्तार से युक्त, चिकनी, पतली, स्वाभाविक वर्ण से युक्त जीभ प्रशस्त है । चिकना, ठीक प्रमाण में बढ़ा, गरमी से युक्त, लाल तालु प्रशस्त है। नदी के आवाज के समान महान्, स्निग्ध, प्रतिध्वनि युक्त, गम्भीर और धीर स्वर प्रशस्त है। न तो बहुत मोटे और न बहुत पतले, मुख को ढापने वाले लाल ओठ प्रशस्त है। बड़ी हनु (जबाड़े) गाल बहुत बड़े न हों, छोटी ग्रीवा प्रशस्त है। चौड़ी उन्नत छाती प्रशस्त है। गूढ छिपे हुए जत्रु (अश सन्धि) पृष्ठ वश, उत्तम है—जत्रु और पृष्ठ वंश की अस्थिया छूने पर प्रतीत न हो। दूर दूर अन्तरवाले स्तन प्रशस्त हैं। कक्षा से बाहर निकले स्थिर पार्श्व प्रशस्त है। गोल, परिपूर्ण, लम्बे बाहू, टागे और अगुलिया प्रशस्त हैं। बड़े २ भरे हुए हाथ और पाव प्रशस्त है । स्थिर गोल, स्निग्ध ताम्र रग के उन्नत, कछुए के समान उठे हुए नख प्रशस्त हैं। दक्षिण आवर्त्त वाली और उन्नत नाभि प्रशस्त है। छाती से एक तिहाई कम, समान, उपचित मास वाली कटि प्रशस्त है। गोल, स्थिर, उन्नत मास वाले न तो बहुत उन्नत और न बहुत नीचे कूल्हे प्रशस्त है। गोल, स्थिर, मास से भरी टागें प्रशम्त हैं। न तो बहुत बढे हुए और न बहुत घटे हुए, हरिणी की जंघा के समान छिपी सिग, अस्थि, और सन्धि वाली जघाए प्रशस्त है न तो बहुत मोटे, और न बहुत दवे हुए गुल्फ प्रशस्त हैं। पूर्वोक्त गुणो से युक्त, कछुवे के आकार के (मेहराबदार) पाव प्रशस्त हैं। स्वाभाविक रूप में वायु, मूत्र, मल का आना और नींद, जागरण, आयास, हास्य, रोदन, स्तनपान आदि बातों का प्रकृतिसिद्ध, स्वाभाविक रूप मे होना उत्तम है। इनके अति- रिक्त और जो बातें यहा पर नहीं कही, वे भी स्वाभाविक रूप मे होनी चाहियें यही इष्ट है। प्राकृतिक बातों से विपरीत होना बुरा, अनिष्टकारक है। ये दीर्घायु कुमारों के लक्षण हैं ॥ ५२ ॥ अतो धात्रीपरीक्षामुपदेक्ष्यामः—अथ ब्रूयात् धात्रीमानयतेति, समानवर्णां यौवनस्थां निभृतामनातुरामव्यङ्गामव्यसनामविरूपामजु- गुप्सितां देशजातीयामक्षुद्रामक्षुद्रकर्मिणीं कुलेजातां वत्सलां जीवद्वत्सां पुंवत्सा दोग्ध्रीमप्रमत्ता१मशायिनीमनुच्चारशायिनीमनन्त्यावशायिनी कुशलोपचारां शुचिमशुचिद्वेषिणीं स्तनस्तन्यसंपदुपेतामिति ॥ ५३ ॥ इसके अनन्तर धात्री की परीक्षा का उपदेश करते हैं। अब आज्ञा देवे कि धात्री (धाई) को लाओ धात्री माता की समान जाति वाली, युवती, नम्र- १. 'अप्रमत्तामनन्त्यावशायिनीं' इतिपाठः ।