भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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अ० ८ ] शारीरस्थानम् १३५ इस प्रकार से कुमार की यौवनावस्था के आने तक धर्म, अर्थ, कौशल उत्पन्न होने तक रक्षा करनी चाहिये । इति पुत्राशिषा समृद्धिकरं कर्म व्याख्यातम् । तदाचरन् यथोक्तै- र्विधिभिः पूजा यथेष्टं लभतेऽनसूयक इति ॥ ६६ ॥ पुत्र को चाहने वालों के लिये फलकारक और समृद्धिकारक कर्म का उप- देश कर दिया है। बच्चों को देखकर चित्त में बुरा भाव न रखने और पुत्र को अत्यन्त उत्तमता को चाहने वाला मनुष्य यथोक्त विधि से इन कर्मों का करता हुआ, यथेष्ट फल और पूजा ( आदर ) को प्राप्त करता है ॥ ६६ ॥ तत्र श्लोकौ । पुत्राशिषा कर्म समृद्धिकारकं यदुक्तमेतन्महदर्थसंहितम् । तदाचरन् ज्ञो विधिभिर्यथातथ पूजां यथेष्ट लभतेऽनसूयकः ॥७०॥ शरीरं चिन्त्यते सर्वं दैवमानुषसम्पदा । सर्वभावैर्यतस्तस्माच्छारीर स्थानमुच्यते ॥ ७१ ॥ पुत्र की प्रार्थनानुरूप फलकारक, समृद्धिकारक, बहुत अर्थ से परिपूर्ण जो कार्य कहा है, जो बुद्धिमान् मनुष्य इस कर्म को विधिपूर्वक करता है वह परम समृद्धि को देख कर न कुढने वाला भला आदमी यथेष्ट आदर को प्राप्त करता है । देवता और मनुष्यों के उत्तम २ लक्षणो सहित सब प्रकार मे यहा सम्पूर्ण शरीर का विचार करते है । इसलिये यह शारीरस्थान महाप्रकरण कहा जाता है ॥ ७०-७१ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते शारीरस्थाने जातिमूत्रीयशारीर नामाष्टमोऽध्याय. ॥ ८ ॥ ॥ इति शारीरस्थानं समाप्तम् ॥