भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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इन्द्रियस्थानम् प्रथमोऽध्यायः । अथातो वर्णस्वरीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ इसके आगे 'वर्णस्वरीय इन्द्रिय' नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे, जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ [ शारीरस्थान के पीछे चिकित्सास्थान आना आवश्यक है । परन्तु चिकि- त्सा साध्य-रोगो मे ही कही जाती है, असाध्य रोगों मे नहीं । क्योंकि असाध्य रोग मे चिकित्सा करने से धन, विद्या और यश की हानि और बदनामी होती है । इन्द्रिय का अर्थ है रिष्ट । जब रोगी मरणासन्न होता है उस समय के विशेष लक्षणों को 'रिष्ट' वा 'अरिष्ट' कहा जाता है । विना रिष्ट ज्ञान के साध्य और असाध्य का ज्ञान भी नही हो सकता । इस लिये चिकित्सा के पूर्व इन्द्रिय- स्थान कहा गया है । ] इह खलु वर्णश्च स्वरश्च गन्धश्च रसश्च स्पर्शश्च चक्षुश्च श्रोत्रं च घ्राणं च रसनं च स्पर्शनं च सत्त्वं च भक्तिश्च शौचं च शीलं चाचारश्च स्मृति- श्चाऽऽकृतिश्च बलं च ग्लानिश्च तन्द्रा चाऽऽरम्भश्च गौरवं च लाघवं चाऽऽ- हारगुणाश्चाऽऽहारपरिणामश्चोपायश्चापायश्च व्याधिश्च व्याधिपूर्वरूपं च वेदनाश्चोपद्रवाश्च छाया च प्रतिच्छाया च स्वप्नदर्शनं च दूताधिकारश्च पथि चौत्पातिकाश्चाऽऽतुरकुले भावावस्थान्तराणि च भेषजसंवृत्तिश्च भेषज-विकार युक्तिश्चेति परीक्ष्याणि प्रत्यक्षानुमानोपदेशैरायुषः प्रमाण- विशेषं जिज्ञासमानेन भिषजा ॥ ३ ॥ रोगी के आयुष्य को विशेष रूप से जानने की इच्छा रखने वाले वैद्य के लिये आवश्यक है कि वह प्रत्यक्ष, अनुमान और आप्त ( शब्द ) प्रमाण द्वारा रोगी के वर्ण, स्वर, गन्ध, रस, स्पर्श, चक्षु, श्रोत्र, घ्राण, रसना, स्पर्श, सत्त्व ( मन ), भक्ति ( इच्छा ), शौच, शील, आचार, स्मृति, आकृति, बल, ग्लानि, तन्द्रा ( नींद ), आरम्भ, [ अरिष्ट-व्याधि में उत्पत्ति का प्रारम्भ ], भारीपन, लघुता, आहार, आहार का परिणाम, उपाय ( उपगमन ), अपाय (अपगमन),