भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 159

१४४ चरकसंहिता [ अ० २ आप्लुतानाप्लुते काये यस्य गन्धाः शुभाशुभाः । व्यत्यासेनानिमित्ताः स्युः स च पुष्पित उच्यते ॥ १२ ॥ ( २ ) इसी प्रकार जिस मनुष्य के शरीर से अच्छी या बुरी, किसी एक फूल की गन्ध के समान गन्ध आये, इसको भी ‘पुष्पित’ कहा जाता है । संक्षेप से, ( ३ ) जिस पुरुष के शरीर से नाना प्रकार की अशुभ गन्धों को वैद्य सूँघ ले उसे भी 'पुष्पित' ही जाने । ( ४ ) स्नान किये अथवा बिना ही स्नान किये जिसके शरीर से सुगन्ध या दुर्गन्ध आये, वह पुष्पित' कहा जाता है [ अर्थात् स्नान करने पर अशुभ और स्नान न करने पर शुभ गन्ध आये तो 'पुष्पित' समझना चाहिये ] ॥ १२ ॥ तद्यथा चन्दनं कुष्ठं तगरागुरूणी मधु । माल्यं मूत्रपुरीषे च मृतानि कुणपानि च ॥ १३ ॥ ये चान्ये विविधात्मानो गन्धा विविधयोनयः । तेऽप्येनेनानुमानेन विज्ञेया विकृतिं गताः ॥ १४ ॥ इदं चाप्यतिदेशार्थं लक्षणं गन्धसंश्रयम् । वक्ष्यामो यदभिज्ञाय भिषङ् मरणमादिशेत् ॥ १५ ॥ वियोनिर्विदुरो यस्य गन्धो गात्रेषु दृश्यते । इष्टो वा यदि वाऽनिष्टो न स जीवति ता समाम् ॥ १६ ॥ एतावद् गन्धविज्ञानम् । चन्दन, कूठ, तगर, मधु, फूल, मूत्र, मल, मुर्दे या दूसरे सड़े गन्ध अथवा नाना प्रकार के जो अन्य नाना पदार्थों से उत्पन्न होते हैं उन गन्धों को भी अनुमान से विकारजन्य जानना चाहिये । गन्ध के आश्रित लक्षणों को भी विस्तार से कहेगे; जिनको जान कर वैद्य रोगी के मरण को बतला सके । जिस रोगी के शरीर से बिना कारण के स्थिर गन्ध अथवा अच्छी या बुरी गन्ध आती हो, वह एक सालमें अवश्य मर जाता है । गन्ध-विज्ञान प्रकरण इतना ही है ॥१६॥ रसज्ञानमतः परम् । आतुराणां शरीरेषु वक्ष्यामो विधिपूर्वकम् ॥ १७ ॥ यो रसः प्रकृतिस्थानां नराणां देहसंभवः । स एषा चरमे काले विकारान् भजते द्वयम् ॥ १८ ॥ कश्चिदेवास्य वैरस्यमत्यर्थमुपपद्यते । स्वादुत्वमपरश्चापि विपुलं भजते रसः ॥ १९ ॥