चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ३ ] १० इन्द्रियस्थानम् १४५ अब रोगी के शरीर में रस ज्ञान को विधिपूर्वक कहते हैं। मनुष्यों के शरीर में प्रकृति-अवस्था में जो रस रहता है, वह रस मृत्यु के समय दो रूपों में से किसी एक रूप में बदल जाता है। अर्थात् किसी रोगी के मुख का स्वाद बहुत अधिक बदल जाता है, बिगड़ जाता है और किसी के मुख का स्वाद बहुत अधिक मात्रा में स्वादु बन जाता ।। १७-१६ ।। तमनेनानुमानेन विद्याद्विकृतिता गतम् । मनुष्यो हि मनुष्यस्य कथं रसमवाप्नुयात् ॥ २० ॥ विकृत हुए रस को अनुमान द्वारा जानना चाहिये। क्योंकि इसके सिवाय मनुष्य दूसरे मनुष्य की रस-परीक्षा और किस प्रकार से कर सकता है ? ॥२०॥ मक्षिकाश्चैव यूकाश्च दंशाश्च मशकैः सह । विरसादपसर्पन्ति जन्तोः कायान्मुमूर्षतः ॥ २१ ॥ अत्यर्थरसिकं कायं कालपक्वस्य मक्षिकाः । अभिस्नातानुलिप्तस्य भृशमायान्ति सर्वशः ॥ २२ ॥ मरणोन्मुख मनुष्य के शरीर पर से विरसता के उत्पन्न होने से मक्खिया, जुए, डास और मच्छर आदि भी दूर भागने लगते हैं। मरणासन्न रोगी का शरीर बहुत मधुर हो, तो स्नान करके चन्दन लगा देने पर भी मक्खिया इसके शरीर पर मडराती हैं ॥ २१-२२ ॥ तत्र श्लोकः-यान्येतानि मयोक्तानि लिङ्गानि रसगन्धयोः । पुष्पितस्य नरस्यैतत्फलं मरणामादिशेत् ॥ २३ ॥ पुष्पित मनुष्य के शरीर में जो रस और गन्ध के लक्षण कहे हैं, इनसे मनुष्य का मरण-फल समझना चाहिये ॥ २३ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने पुष्पितकेन्द्रियं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ तृतीयोऽध्यायः अथातः परिमर्शनीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ इसके आगे अब 'परिमर्शनीय इन्द्रिय' नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ वर्णे स्वरे च गन्धे च रसे चोक्तं पृथक् पृथक् । लिङ्गं मुमूर्षतां सम्यक् स्पर्शेष्वपि निबोधत ॥ ३ ॥