चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१४६ चरकसंहिता [ अ० ३ मरणोन्मुख रोगी के वर्ण, स्वर गन्ध और रस का पृथक् पृथक् वर्णन कर दिया है, अब स्पर्श सम्बन्धी लक्षणों को कहते हैं ॥ ३ ॥ स्पर्शप्राधान्येनैवाऽऽतुरस्याऽऽयुष प्रमाणविशेषं जिज्ञासुः प्रकृति- स्थेन पाणिना केवलमस्य शरीरं स्पृशेत् विमर्शयेद्वाऽन्येन ॥ ४ ॥ परिमृशता तु खल्वातुरशरीरमिमे भावास्तत्र तत्रावबोद्धव्या भवन्ति। तद्यथा—सततं स्पन्दमानानां शरीरदेशानां स्तम्भः, नित्योष्मणां शीती- भावः, मृदूनां दारुणत्वं, श्लक्ष्णाना खरत्व, स्थूलाना वृषणादीनां सता- मसद्भावः, सन्धीनां स्रस-भ्रंश-च्यवनानि¹। मासशोणितयोर्वीतीभावो दारुणत्व, स्वेदानुबन्धः स्तम्भो वा। यच्चान्यदपि किंचिदीदृश स्पर्शाना लक्षणमनिमित्तं स्यात् । इति लक्षणानां संग्रहः स्पर्शानाम् ॥ ५ ॥ स्पर्श की प्रधानता से रोगी के आयु का परिणाम जानने की इच्छा से, वैद्य अपने स्वस्थ हाथ से रोगी के सम्पूर्ण शरीर को स्पर्श करे अथवा किसी दूसरे व्यक्ति से ( जिसका स्वस्थ हाथ हो ) स्पर्श करवावे । स्पर्श करते हुए रोगी के शरीर में निम्न बाते जाननी चाहिये। यथा—निरन्तर स्पन्दन करने वाले शरीर के भागों का स्पन्दन करने से रुक जाना, शरीर मे जो अग सदा गरम रहते हैं उनका शीतल हो जाना, कोमल अंगों का कठोर हो जाना, चिकने अगो का कर्कश हो जाना, वृषण आदि स्थूल अगों का लुप्त हो जाना, सन्धियों का स्रसन ( गिर जाना ), भ्रंशन ( खिसक जाना ), च्यवन ( दूसरे स्थानों में चले जाना ), मास और रक्त का बहुत क्षीण हो जाना और कठोर ( घट्ट ) बन जाना, पसीने का अधिक आना या बिल्कुल न आना। इसी प्रकार के अन्य अकारण स्पर्श जन्य लक्षण जो भी उत्पन्न हों उनकी स्पर्श द्वारा परीक्षा करनी चाहिये। ये सक्षेप में स्पर्श-लक्षणों का संग्रह किया है ॥ ४-५ ॥ तद् व्यासतोऽनुव्याख्यास्यामः—तस्य चेत्परिमृश्यमानं पृथक्त्वेन पाद-जङ्घोरु-स्फिगुदर-पार्श्व-पृष्ठेषिका-पाणि-ग्रीवा-ताल्वोष्ठ-ललाटं स्विन्नं शीतं स्तब्धं दारुणं वीत-मास-शोणितं वा स्यात्, परासुरयं पुरुषो नचिरात्काल मरिष्यतीति विद्यात् ॥ ६ ॥ उसीको विस्तार से आगे कहते हैं । रोगी के भिन्न २ अगों मे स्पर्श करने से यदि पाव, जघा, ऊरु, नितम्ब, उदर, पार्श्व, पृष्ठ वश के मणके, हाथ, ग्रीवा, तालु, ओष्ठ, ललाट ये अवयव पसीने से युक्त, शीतल या जड़ या कठोर अथवा मास या रक्त से रहित हो तो समझ लेना चाहिये कि रोगी पुरुष बहुत दिनों तक नहीं जीयेगा, उसकी मृत्यु शीघ्र ही होगी ॥ ६ ॥ १ 'स्रसभ्रंशधावनानि' इति पाठः ।