चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंओ३म् चरकसंहिता शारीरस्थानम् प्रथमोऽध्यायः अथातः कतिधापुरुषीयं शारीरं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ इसके आगे 'कतिधापुरुषीय' नामक शारीर-स्थान की व्याख्या करते हैं, ऐसा भगवान् आत्रेय ने उपदेश किया है ॥ २ ॥ अग्निवेश उवाच— कतिधा पुरुषो धीमन् धातुभेदेन भिद्यते । पुरुषः कारणं कस्मात्, प्रभवः पुरुषस्य कः ॥ ३ ॥ किमज्ञो ज्ञः स नित्यः किं किमनित्यो निदर्शितः । प्रकृतिः का विकाराः के किं लिङ्गं पुरुषस्य च ॥ ४ ॥ भगवान् आत्रेय से अग्निवेश पूछते हैं—हे धीमन् गुरो ! धातुभेद से पुरुष का कितने प्रकार से भेद किया है । इस संसार में पुरुष को प्रधान कारण किस लिये कहा जाता है ? पुरुष का उत्पत्ति कारण क्या है ? यह पुरुष ज्ञान से रहित मूढ है या ज्ञानी हैं ? यह पुरुष नित्य है या अनित्य ? प्रकृति क्या वस्तु हे ? विकार कौन से हैं ? पुरुष के लक्षण क्या हैं, ( जिनसे इसका अनुमान होता है ) ॥ ३-४ ॥ निष्क्रियं च स्वतन्त्रं च वशिनं सर्वगं विभुम् । वदन्त्यात्मानमात्मज्ञाः क्षेत्रज्ञं साक्षिणं तथा ॥ ५ ॥ आत्मा को जानने वाले ब्रह्मवादी आत्मा को क्रियाहीन, स्वतन्त्र, सब को वश में करने वाला, सर्वव्यापक,विभु (महान्) क्षेत्रज्ञ, और साक्षी कहते हैं ॥५॥ निष्क्रियस्य क्रिया तस्य भगवन् ! विद्यते कथम् । स्वतन्त्रश्चदनिष्टासु कथं योनिषु जायते ॥ ६ ॥