चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२ चरकसंहिता [ अ० १ वशी यद्यसुखैः कस्माद्भावैराक्रम्यते बलात्। सर्वाः सर्वगतत्वाच्च वेदनाः कि न वेत्ति सः ॥ ७ ॥ न पश्यति विभुः कस्माच्छैलकुड्यतिरस्कृतम् । क्षेत्रज्ञः क्षेत्रमथवा किं पूर्वमिति संशयः ॥ ८ ॥ ज्ञेयं क्षेत्रं विना पूर्वं क्षेत्रज्ञो हि न युज्यते । क्षेत्रं च यदि पूर्वं स्यात् क्षेत्रज्ञः स्यादशाश्वतः ॥ ६ ॥ साक्षिभूतश्च कस्यायं कर्ता ह्यन्यो न विद्यते । स्यात्कथं चाविकारस्य विशेषो वेदनाकृतः ॥ १० ॥ हे भगवन् ! यदि आत्मा क्रियाहीन है तो उसकी क्रियायें किस प्रकार से होती हैं ? क्रियाहीन क्रिया नहीं कर सकता ! आत्मा यदि स्वतन्त्र है तो फिर वह दुःखकारक, अनिष्ट दुःखदायी योनियों में किस लिये उत्पन्न होता है ? यदि आत्मा वशी है, तो वह दुःखदायक पदार्थों से क्यों बलात् पीड़ित होता है ? आत्मा यदि सर्वत्र व्यापक है तो सब शरीरों की समस्त वेदनाओं को क्यों नहीं जानता ? आत्मा यदि आकाश के समान व्यापक और महान् है तो पर्वत या दीवार से छिपे पदार्थों को क्यों नही देखता ? आत्मा 'क्षेत्रज्ञ' है। क्षेत्रज्ञ और क्षेत्र में पहिले कौन है, इसमें संशय है ? ज्ञेय क्षेत्र के बिना ज्ञाता क्षेत्रज्ञ हो ही नहीं सकता । और यदि पहिले क्षेत्र हो पीछे क्षेत्रज्ञ मानों तो क्षेत्रज्ञ अनित्य हो जाता है। आत्मा किसके कर्मो का साक्षी है ? [ दूसरे के कर्मों को देखने वाला लोक में साक्षी कहा जाता है ] । क्योंकि आत्मा से अतिरिक्त कोई दूसरा कर्त्ता नहीं है । आत्मा यदि 'निर्विकार' है तो वेदना से उत्पन्न सुख- दुःख आदि क्यों होते हैं ? ॥६-१०॥ अथ चाऽऽर्तस्य भगवंस्तिसृणां कां चिकित्सति । अतीतां वेदना वैद्यो वर्त्तमानां भविष्यतीम् ॥ ११ ॥ भविष्यन्त्या असंप्राप्तिरतीताया अनागमः । सांप्रतिक्या अपि स्थानं नास्त्यर्तैः संशयो ह्यतः ॥ १२ ॥ हे भगवन् ! वैद्य रोगी की अतीत, वर्त्तमान और भविष्य इन तीन प्रकार की वेदनाओं में से किस वेदना ( पीड़ा ) की चिकित्सा करता है ? क्योंकि भविष्य में होने वाली वेदनाये ( पीड़ायें ) अप्राप्त हैं, वे उपस्थित ही नहीं, उनकी चिकित्सा हो नहीं सकती। अतीत वेदनायें फिर नहीं आयेगी, वे तो जा चुकीं । शेष वर्त्तमान काल की वेदनाओं की भी स्थिति नहीं है, क्योंकि वे अनित्य है । इसलिये संशय है ॥११-१२॥