चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 164, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें१५० चरकसंहिता [ अ० ४ ] योऽग्निं प्रकृतिवर्णस्थं नीलं पश्यति निष्प्रभम् । कृष्णं वा यदि वा शुक्लमग्नौ वसति १ सप्तमीम् ॥ ११ ॥ मरीचीनसतो मेघान्मेघान्वाप्यसतोऽम्बरे । विद्युतो वा विना मेघात् पश्यन्मरणमृच्छति ॥ १२ ॥ मृण्मयीमिव यः पात्रीं कृष्णाम्बरसमावृताम् । आदित्यमीक्षते शुद्धं चन्द्रं वा न स जीवति ॥ १३ ॥ अपर्वणि यदा पश्येत्सूर्याचन्द्रमसोर्ग्रहम् । अव्याधितो व्याधितो वा तदन्तं तस्य जीवितम् ॥ १४ ॥ नक्तं सूर्यमहश्चन्द्रमग्नौ धूममुत्थितम् । अग्निं वा निष्प्रभं रात्रौ दृष्ट्वा मरणमृच्छति ॥ १५ ॥ प्रभावतः प्रभाहीनान्निष्प्रभान् वा प्रभावतः । खरा विलिङ्गान् पश्यन्ति भावान् प्राणाञ्जिहासवः ॥ १६ ॥ व्याकृतानि विवर्णानि विसरूपोपगतानि च । विनिमित्तानि पश्यन्ति रूपाण्यायुःक्षये नराः ॥ १७ ॥ यश्च पश्यत्यदृश्यान् वै दृश्यान् यश्च न पश्यति । तावुभौ पश्यतः क्षिप्रं यमालयमसंशयम् ॥ १८ ॥ अब इन्हीं का आगे विस्तार से वर्णन करते हैं— (१) जो रोगी आकाश को ठोस (कठिन) रूप में देखता है, अथवा पृथिवी को आकाश की भांति शून्यरूप मे देखता है, दोनों प्रकार का विपरीत दर्शन करता हुआ पुरुष मृत्युको प्राप्त होता है । (२) जिस रोगी को आकाश में बहने वाली (अदृश्य) वायु दिखाई देने लगे और जलती हुई आग दिखाई न देवे उस रोगी का आयु समाप्त हुआ जाने । (३) शुद्ध निर्मल जालरहित जल मे जाल(-तन्तु) देखे और स्थिर पानी को चलता (बहता) देखे वह भी शीघ्र ही प्राणत्याग करेगा । (४) जो रोगी मनुष्य जागता हुआ प्रेत, राक्षस अथवा अन्य किसी प्रकार का आश्चर्यकारक पदार्थ देखता है वह रोगी जीने में समर्थ नहीं है । (५) जो रोगी प्रकृति में स्थित (लाल, कपिल वर्ण की) अग्नि को नीली और कान्ति से रहित, काली या श्वेत वर्ण की देखता है, वह सातवीं रात्रि में स्वयं अग्नि (चिता) मे वास करता है । (६) जो रोगी आकाश में सूर्य की किरणों के न होने पर भी किरणों को, १. 'निशा व्रजति, इति च पाठ', वह सातवीं रात चढ बसता है ।