चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ४ ] इन्द्रियस्थानम् १५१ मेघों के न होते हुए मेघों को आकाश मे देखे, अथवा बिना बादलों के बिजली को देखे, उसे मरणोन्मुख समझना चाहिये । ( ७ ) जो रोगी मेघ आदि से न छिपे, शुद्ध सूर्य या चन्द्रमा को काले वस्त्रों से टपे कटोरे वा मिट्टी के बर्त्तन के रूप मे देखता है, वह नहीं जीता । ( ८ ) जो मनुष्य ग्रहण-योग के बिना सूर्य या चन्द्रमा में ग्रहण देखता है, उस स्वस्थ या रोगी पुरुष की आयु समाप्त समझनी चाहिये । ( ६ ) जिस रोगी को रात्रि में सूर्य, दिन में चन्द्रमा और बिना आग के धुंवा तथा रात्रि मे प्रभा के बिना आग दीखे [ दिन मे आग का निष्प्रभ दीखना अरिष्ट नहीं ] उस रोगी को गतायु ( मृत ) समझना चाहिये । ( १० ) जिन पुरुषों ने अञ्जन आदि नहीं लगाया उनमें अञ्जन आदि देखे ( बिना कान्ति के पुरुषों में कान्ति का दीखना ), तथा प्रभावान् पुरुषों को निष्प्रभ देखना, इस प्रकार स्वाभाविक लक्षणों से रहित पुरुषों को प्राणों को छोड़ने वाला पुरुष ही देखता है । ( ११ ) आयु के क्षय होने पर रोगी मनुष्य पदार्थों के विकृत रूप, विपरीत रंग, अशुद्ध सख्या से युक्त, बिना कारण के आकृति मे परिवर्त्तन देखता है। ( १२ ) जो मनुष्य अदृश्य रूपों को देखता है और आख से दीखने वाले पदार्थों को नहीं देखता, वे दोनों निश्चय से शीघ्र ही यमलोक मे जाते हैं ॥६-१८॥ अशब्दस्य च यः श्रोता शब्दान् यश्च न बुध्यते । द्वावप्येतौ यथा प्रेतौ तथा ज्ञेयो विजानता ॥ १६ ॥ संवृत्त्याङ्गुलिभिः कर्णौ ज्वालाशब्दं य आतुरः । न शृणोति गतासुं तं बुद्धिमान् परिवर्जयेत् ॥ २० ॥ ( १३ ) जो मनुष्य बिना शब्द के शब्द सुने और शब्द को नहीं सुनता, इन दोनों मनुष्यों को प्रेत के समान गिनने चाहिये (मरे हुए समझने चाहिये) । ( १४ ) अगुलियों से कानों को बन्द करने पर जिस रोगी को कानों में ‘ज्वाला-शब्द’ ‘घनघन’ आवाज सुनाई न देवे उसे मरा हुआ समझना चाहिये, उसकी चिकित्सा न करे ॥ १६-२० ॥ विपर्ययेण यो विद्याद् गन्धाना साध्वसाधुताम् । न वा तान् सर्वशो विद्यात्तं विद्याद् विगतायुषम् ॥ २१ ॥ ( १५ ) जो मनुष्य शुभ गन्ध को अशुभ और अशुभ गन्ध को शुभ इस प्रकार विरुद्ध रूप से तथा जो मनुष्य सर्वथा गन्ध को नहीं पहिचानता, इन दोनों को मरणासन्न समझना चाहिये ॥ २१ ॥