चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 172, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें१५८ चरकसंहिता [ अ० ५ पराजय हो, दोनों जूतों को खो देवे, या धूल या चमड़े पर गिरे, स्वप्न में हर्ष हो, क्रोधित पितरों से धिक्कारा जावे, दात, चन्द्रमा, सूर्य, नक्षत्र, देवता, दिया या आख अथवा पर्वत को गिरता देखे, या उनका नष्ट होना अथवा फटना आदि स्वप्न में देखे, लाल फूलों से भरा जगल देखे, वध करने अथवा अन्य पाप कर्म के स्थान या चिता मे या गाढे अन्धकार मे घुसे, नीद में लाल माला पहिन कर, जोर से हंसता हुआ, नगा होकर दक्षिण दिशा में जावे, बन्दरों से युक्त घने जंगल मे जावे तो ये स्वप्न रोगियो को विनाश या भारी कष्ट के लिये होते है । कषाय, भगर्वे वस्त्र पहिने, उग्र, नगे, दण्ड धारण किये, काले लाल आँखों वाले ऐसे अशुभ मनुष्यों का दर्शन, काली, पापी, अनाचारी, लम्बे बाल, नख और स्तनों वाली, लाल माला तथा लाल वस्त्र पहिने हुई ऐसी स्त्री का दर्शन कालनिंशा के समान है ( ये सब दारुण, भयकर स्वप्न है, जिनको देख कर रोगी मर जाता है। नीरोग मनुष्य यदि इस प्रकार के स्वप्न देखे तो उसका जीवन सन्देह में पड़ जाता है। इस प्रकार के अशुभ स्वप्नों को देख कर कोई विरला ही बचता है) ॥२७-४०॥ मनोवहानां पूर्णत्वादोषैस्तैर्बलवत्तरैः । स्रोतसा दारुणान् स्वप्नान् काले पश्यति दारुणे ॥ ४१ ॥ नातिप्रसुप्तः पुरुषः सफलानफलानपि । इन्द्रियेशेन मनसा स्वप्नान् पश्यत्यनेकधा ॥ ४२ ॥ स्वप्न दर्शन का कारण- जिस समय कुपित हुए तीनों वात आदि दोष शरीर के मनोवह स्रोतों को भर देते हैं, उस समय मनुष्य को शुभ या अशुभ स्वप्नों का दर्शन होता है। जिस समय मनुष्य पूर्ण गहरी नींद में नहीं होता है, उस समय सफल या निष्फल होने वाले अनेक स्वप्नों को इन्द्रियों के स्वामी चित्त के द्वारा देखा करता है ॥ ४१-४२ ॥ दृष्टं श्रुतानुभूतं च प्रार्थितं कल्पितं तथा । भाविकं दोषजं चैव स्वप्नं सप्तविध विदु ॥ ४३ ॥ स्वप्न के भेद-स्वप्न सात प्रकार के हैं। जैसे- (१) दृष्ट, आख से देखा, (२) श्रुत, कान से सुना, (३) अनुभूत, शेष इन्द्रियों से जाना, (४) प्रार्थित, देवता से मागा या चाहा हुआ (५) कल्पित, मन से कल्पना किया, (६) भाविक, भावी शुभ अशुभ फल का सूचक, (७) दोषज, तीव्र वात आदि दोष से उत्पन्न ये सात प्रकार के स्वप्न हैं ॥ ४३ ॥