भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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अ० ६ ] इन्द्रियस्थानम् १५६ तत्र पञ्चविधं पूर्वमफलं भिषगादिशेत् । दिवास्वप्नमतिह्रस्वमतिदीर्घं तथैव च ॥ ४४ ॥ दृष्टः प्रथमरात्रे यः स्वप्नः सोऽल्पफलो भवेत् । न स्वपेद्यः पुनर्द्दष्ट्वा स सद्यः स्यान्महाफलः ॥ ४५ ॥ अकल्याणमपि स्वप्नं दृष्ट्वा तत्रैव यः पुनः । पश्येत्सौम्यं शुभाकारं तस्य विद्याच्छुभं फलम् ॥ ४६ ॥ इनमें से प्रथम पाच प्रकार के स्वप्नों को वैद्य व्यर्थ या निष्फल समझें । इसी प्रकार दिन का स्वप्न तथा रात में आया बहुत छोटा या बहुत बड़ा स्वप्न व्यर्थ होता है । रात्रि के प्रथम भाग में जो स्वप्न आता है, वह भी निष्फल होता है । जिस स्वप्न को देख कर फिर नींद न आये, वह स्वप्न शीघ्र ही बड़े फल को देनेवाला होता है । जो मनुष्य पहिले तो अशुभ स्वप्न को देखे, फिर इसी प्रसङ्ग में सौम्य और शुभ स्वप्न को देख ले तो इस स्वप्न का शुभ फल समझना चाहिये ॥ ४४-४६ ॥ तत्र श्लोकः—पूर्वरूपाण्यथ स्वप्नान् य इमान्वेत्ति दारुणान् । न स मोहादसाध्येषु कर्माण्यरभते भिषक् ॥ ४७ ॥ जो वैद्य इन पूर्वरूपों को तथा भयानक स्वप्नों को जानता है, वह कभी भी आलस्यवश प्रमाद से असाध्य अवस्था में चिकित्सा कर्म आरम्भ नहीं करता ॥ ४७ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने पूर्वरूपीयमिन्द्रिय नाम पञ्चमोऽध्यायः । षष्ठोऽध्यायः अथातः कतमानि शारीरीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ पूर्वरूपों के अनन्तर भावी व्याधि के आश्रय स्थानों के अरिष्ट लक्षण बतलाने के लिये 'कतमानि-शारीरीय' इन्द्रिय अध्याय का व्याख्यान करेंगे, जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ कतमानि शरीराणि व्याधिमन्ति महामुने । यानि वैद्यः परिहरेद्येषु कर्म न सिध्यति ॥ ३ ॥