चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 174, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें१६० चरकसंहिता [ अ० ६ अग्निवेश ने पूछा—हे महामुने ! वे कौन से रोगी शरीर हैं, जिनमें चिकित्सा कर्म सफल नही होता, जिनको वैद्य छोड़ दे और चिकित्सा न करे ॥३॥ इत्यात्रेयोऽग्निवेशेन प्रश्न पृष्टः सुदुर्बचम् । आचचक्षे यथा तस्मै भगवांस्तन्निबोधत ॥ ४ ॥ इस प्रकार अग्निवेश के प्रश्न पूछने पर भगवान् आत्रेय ने उसे उपदेश किया, उसको आप भी सुनो और जानो ॥ ४ ॥ यस्य वै भाषमाणस्य रुजत्यूर्ध्वमुरो भृशम् । अन्नं च च्यवते भुक्तं स्थित चापि न जीर्यति ॥ ५ ॥ बलं च हीयते यस्य तृष्णा चाभिप्रवर्धते । जायते हृदि शूल च तं भिषक् परिवर्जयेत् ॥ ६ ॥ हिक्का गम्भीरजा यस्य शोणितं चातिसार्यते । न तस्मै भेषजं दद्यात्स्मरन्नात्रेयशासनम् ॥ ७ ॥ आनाहश्चातिसारश्च यमेतौ दुर्बलं नरम् । व्याधितं विशतो रोगौ दुर्लभं तस्य जीवितम् ॥ ८ ॥ आनाहश्चैव तृष्णा च यमेतौ दुर्बल नरम् । विशतो विजहत्येनं प्राणा नातिचिरान्न्ररम् ॥ ६ ॥ ( १ ) जिस पुरुष के बोलते समय छाती के ऊपर का भाग बहुत दर्द करे, खाया हुआ अन्न पेट में न ठहरे ओर पेट में गया हुआ अन्न न पचे, जिसका बल दिन प्रति दिन कम हो रहा है और प्यास बढ़ती जा रही है, तथा हृदय में में वेदना होती है, ऐसे रोगी को वैद्य छोड़ देवे । ( २ ) भगवान् आत्रेय के उपदेश को स्मरण रख-कर जिस रोगी को नाभि प्रदेश से हिचकी उत्पन्न हो और जिसको रक्तातिसार हो, इन दोनों को औषध नहीं दे । ( ३ ) जिस निर्बल रोगी को आनाह ( पेट का फूलना ) और अतिसार ( पहले पानी वाले दस्त ) रोग उत्पन्न हो जायें, उसका जीना कठिन है । ( ४ ) जिस निर्बल रोगी को आनाह ( पेट का अफारा ) और तृष्णा रोग उत्पन्न हो जाता है, वह शीघ्र ही प्राणों को छोड़ देता है ॥ ५-६ ॥ ज्वरः पौर्वाह्निको यस्य शुष्ककासश्च दारुणः । [ ज्वरो यस्यापराह्ने तु श्लेष्मकासश्च दारुणः । ] बलमांसविहीनस्य यथा प्रेतस्तथैव सः ॥ १० ॥