भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 176, कुल 616 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 176

१६२ चरकसंहिता [ अ० ६

(१०) जिसकी छाती में सचित हुआ बहुत कफ नीले पीले रक्त के साथ
निरन्तर निकलता रहता है, ऐसे रोगी को दूर से ही छोड़ दे।
(११) जिसका मूत्र गाढा हो, शरीर पर रोमाच हो अगों पर सूजन आ
जाये खासी और ज्वर से पीड़ित शरीर का मास क्षीण हो गया हो, ऐसे रोगी
को वैद्य जान बूझ कर दूर से ही छोड दे।
(१२) जिस कृश, बलहीन पुरुष के तीनों दोष कुपित होकर भिन्न २
पीड़ा के कारण हो उस पुरुष की चिकित्सा नहीं करनी चाहिये। [ कही 'कोष्ठा
भिलक्षिताः' पाठ है, वहा अर्थ है—तीनो दोष कोठे में देखे जायें ]।
(१३) जिस निर्बल मनुष्य को सूजन के पीछे ज्वर और अतिसार हों,
अथवा ज्वर और अतिसार के पीछे जिसको सूजन हो जाय, वह उसकी मृत्यु
का कारण होता है ॥ १५-१८ ॥
पाण्डुरश्च कृशोऽत्यर्थं तृष्णयाऽभिपरीप्लुतः ।
डम्बरी कुपितोच्छ्वासः प्रत्याख्येयो विजानता ॥ १९ ॥
(१४) पाण्डु रोगी, अति कृश, अत्यन्त प्यास से पीड़ित हो, डम्बरी
अर्थात् जिसकी आखें स्थिरता से घूर कर देखें और जिसका श्वास कुपित हो,
ऐसा रोगी भी जवाब देने योग्य है, चिकित्सा के लिये अयोग्य है ॥ १९ ॥
हनुमन्याग्रहस्तृष्णा बलह्रासोऽतिमात्रया ।
प्राणाश्चोरसि वर्तन्ते यस्य तं परिवर्जयेत् ॥ २० ॥
ताम्यत्यायच्छते शर्म न किञ्चिदपि विन्दति ।
क्षीणमांसबलाहारो मुमूर्षुरचिरान्नरः ॥ २१ ॥
(१५) जिस रोगी को हनुग्रह (जबाड़ी का बन्द होना), मन्याग्रह
(गर्दन की मन्या नामक शिराओं का अकड़ना), तृष्णा और शक्ति का अति
ह्रास हो, तथा जिसकी छाती में सास रुक रहे हों, ऐसे रोगी को छोड़ देना चाहिये।
(१६) जिस रोगी में बेहोशी रहती हो, जिसको किसी भी प्रकार चैन न
पडती हो, जिस रोगी के मास, बल और आहार क्षीण हो गये हों वह रोगी
जल्दी ही मर जाता है ॥ २०-२१ ॥
विरुद्धयोनयो यस्य विरुद्धोपक्रमा भृशम् ।
वर्धन्ते दारुणा रोगाः शीघ्रं शीघ्रं स हन्यते ॥ २२ ॥
बलं विज्ञानमारोग्य ग्रहणी मांसशोणितम् ।
एतानि यस्य क्षीयन्ते क्षिप्रं क्षिप्रं स हन्यते ॥ २३ ॥