भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 178, कुल 616 में से

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पृष्ठ 178

१६४ चरकसंहिता [ अ० ७ एताश्चान्याश्च याः काश्चित्प्रतिच्छाया विगर्हिताः । सर्वा मुमूर्षतां ज्ञेया न चेल्लक्ष्यनिमित्तजाः ॥ ६ ॥ ( १ ) जिस रोगी मनुष्य की प्रतिबिम्ब छाया दूसरे मनुष्य की आंख की पुतली में अथवा अन्य की प्रतिबिम्ब रूप छाया जिस रोगी मनुष्य की पुतली में पड़ना बन्द हो जाये वैद्य ऐसे पुरुष की चिकित्सा करने की इच्छा न करे। जिस मनुष्य को चांदनी, धूप, दीपक के प्रकाश, पानी और शीशे (दर्पण) में अपनी छाया और प्रतिबिम्ब में विकृति दिखाई दे, वह प्रेत के समान होता है। जिस मनुष्य को अपनी छाया छिन्न-भिन्न, अनिश्चित प्रतिबिम्ब वाली, हीन, अथवा अधिक, नष्ट, पतली दो भागों में विभक्त बिगड़ी हुई, बिना शिरोभाग के दीखने वाली तथा अन्य निन्दित दूसरी सब प्रतिच्छाया मरने वालों की जाननी चाहिये बशर्ते ये प्रतिच्छाया किसी कारण से उत्पन्न न हुई हों ॥ ३-६ ॥ सस्थानेन प्रमाणेन वर्णेन प्रभया तथा । छाया विवर्तते यस्य स्वस्थोऽपि प्रेत एव सः ॥ ७ ॥ जिस स्वस्थ पुरुष की छाया, संस्थान (आकृति) प्रमाण (लम्बाई चौड़ाई) वर्ण (रंग) और प्रभा (कान्ति) में अन्य प्रकार की हो जाती है, वह पुरुष प्रेत के समान है ॥ ७ ॥ संस्थानमाकृतिर्ज्ञेया सुषमा विषमा च या । संस्थान—संस्थान का अर्थ है आकृति। वह आकृति दो प्रकार की होती है। (१) सुषमा और (२) विषमा। मध्यसल्पं महच्चोक्तं प्रमाणं त्रिविधं नृणाम् ॥ ८ ॥ प्रमाण तीन प्रकार का है। (१) मध्य, (२) अल्प और (३) महान् ॥८॥ प्रतिप्रमाणसस्थाना जलादर्शातपादिषु । छाया या सा प्रतिच्छाया- प्रतिच्छाया—प्रमाण और संस्थान के अनुकूल जो छाया जल, दर्पण या धूप आदि में दीखती है, उसको 'प्रतिच्छाया' कहते हैं। छाया वर्णप्रभाश्रया ॥ ९ ॥ खादीना पञ्च पञ्चानां छाया विविधलक्षणाः । नाभसी निर्मला नीला सस्नेहा सप्रभेव च ॥ १० ॥ रूक्षा श्यावाऽरुणा या तु वायवी सा हतप्रभा । विशुद्धरक्ता त्वाग्नेयी दीप्ताभा दर्शनप्रिया ॥ ११ ॥

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