चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ
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१७६ चरकसंहिता [ अ० १०
सद्यस्तितिक्षतः प्राणांल्लक्षणानि पृथक् पृथक् ।
अग्निवेश प्रवक्ष्यामि सस्पृष्टो येर्न जीवति ॥ ३ ॥
वाताष्ठीला सुसंवृत्ता तिष्ठन्ती दारुणा हृदि ।
तृष्णयाऽभिपरीतस्य सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ ४ ॥
पिण्डिके शिथिलीकृत्य जिह्मीकृत्य च नासिकाम् ।
वायुः शरीरे विचरन् सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ ५ ॥
हे अग्निवेश ! शीघ्र प्राण छोड़ने वाले रोगी के लक्षणो को पृथक् पृथक्
कहता हू, जिनसे युक्त होने पर रोगी नहीं बचताछ । ( १ ) वाताष्ठीला कठोर
रूप से व्याप+ हाकर हृदय-प्रदेश मे आकर रुक जाये, रोगी को प्यास बहुत
लगती हो तो उस रोगी का जीवन बहुत शीघ्र हर लेती है । ( २ ) वायु
पिण्डलियों को शिथिल बना दे ओर नासिका का टेढ़ी कर दे तथा
सम्पूर्ण शरीर म वायु दौड़ता फिरे तो वह रोगी का जीवन हर लेता है ॥३-५॥
भ्रुवौ यस्य च्युते स्थानादन्तर्दाहश्च दारुणः ।
तस्य हिक्काकरो रोगः सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ ६ ॥
( ३ ) जिस रोगी का भोहे अपने स्थान से स्खलित हो जायें, शरीर मे
बहुत तीव्र, कष्टदायी दाह ( जलन ) हो, और उसका रोग हिचकियें पैदा कर
दे तो वह उसके प्राण को हर लेता है ॥ ६ ॥
क्षीणशोणितमांसस्य वायुरूध्वंगतिश्चरन् ।
उभे मन्ये समे यस्य सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ ७ ॥
अन्तरेण गुदं गच्छन्नाभि च सहसाऽनिलः ।
कृशस्य वंक्षणो गृह्णन् सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ ८ ॥
वितत्य पर्शुकाग्राणि गृहीत्वोरश्च मारुतः ।
स्तिमितस्यायताक्षस्य सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ ९ ॥
हृदयं च गुदं चोभे गृहीत्वा मारुतो बली ।
दुर्बलस्य विशेषेण सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ १० ॥
वंक्षणं च गुदं चोभे गृहीत्वा मारुतो बली ।
श्वासं संजनयञ्जन्तोः सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ ११ ॥
नाभिं मूत्रं बस्तिशीर्षं पुरीषं चापि मारुतः ।
विबध्य जनयञ्छूलं सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ १२ ॥
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❀ 'सद्यः' शब्द से कुछ तो सात दिन गिनते हैं और कुछ आचार्य तीन
दिन मानते हैं ।