भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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अ० १० ] १२ इन्द्रियस्थानम् १७७

भिद्येते वक्षणौ यस्य वातशूलैः समन्ततः ।
भिन्नं पुरीषं तृष्णा च सद्यः प्राणाञ्जहाति सः ॥ १३ ॥
आप्लुतं मारुतेनेह शरीरं यस्य केवलम् ।
भिन्नं पुरीषं तृष्णा च सद्यो जहात्स जीवितम् ॥ १४ ॥
शरीरं शोफितं यस्य वातशोफेन देहिनः ।
भिन्नं पुरीषं तृष्णा च सद्यो जहात्स जीवितम् ॥ १५ ॥
(४) शरीर में रक्त और मांस क्षीण हो जाये, वायु उर्ध्व गति करे, दोनों
मन्याएं (ग्रीवा की शिराये) एक समान हो तो वायु उस रोगी का जीवन
शीघ्र हर लेता है । (५) जिस निर्बल रोगी में वायु गुद द्वार से प्रवेश करके नाभि
प्रदेश में पहुँच कर वक्षण प्रदेश को पीड़ित करता है वह वायु रोगी का जीवन
शीघ्र ही हर लेता है । (६) जिस रोगी में वायु उरो-भाग (छाती) में पहुँच
कर पर्शुकाओं के अग्र भागों को दबाता है और रोगी स्तब्ध तथा आंखें फैलाये
हो, तो वायु उसके शीघ्र प्राण ले लेता है । (७) जिस निर्बल शरीर वाले रोगी
के हृदय और गुदा इन दोनों अवयवों में बलवान् वायु व्याप्त हो जाता है, वह
रोगी शीघ्र मर जाता है । (८) बलवान् वायु वक्षण और गुदा को पीड़ित
करके ऊर्ध्व श्वास उत्पन्न करदे तो रोगी के प्राणो को वायु शीघ्र ही हर लेता है ।
(६) वायु, नाभि, मूत्र, बस्ति, शिर और मल इनको बन्द करदे अथवा इन
स्थानों पर काटने के समान (छेदन के समान) शूल उत्पन्न कर दे तो वायु
उसके प्राणों को शीघ्र हर लेता है । (१०) वात-शूल के कारण जिस रोगी के
वक्षण प्रदेशों में सर्वत्र और भिन्न भिन्न प्रकार की वेदना होती रहती है, रोगी
को अतिसार और प्यास रहती हो तो वह प्राणों को शीघ्र छोड़ देता है । (११)
जिस रोगी के सम्पूर्ण शरीर में वायु व्याप्त हो जाये, अतिसार तथा प्यास हो वह
रोगी शीघ्र ही प्राण त्याग देता है । (१२) जिस रोगी का शरीर वायु के शोफ
के कारण सूज जाये, रोगी को अतिसार हो तथा प्यास रहे वह शीघ्र प्राणों
को छोड़ देता है ॥ ७-१५ ॥
आमाशयसमुत्थाना यस्य स्यात्परिकर्त्तिका ।
तृष्णा गुदग्रहश्चाग्रः सद्यो जहात्स जीवितम् ॥ १६ ॥
पक्वाशयमधितिष्ठाय हत्वा सञ्ज्ञां च मारुतः ।
कण्ठे घुर्घुरकं कृत्वा सद्यो हरति जीवितम् ॥ १७ ॥
दन्ताः कर्द्दमचूर्णाभा मुखं चूर्णकसंनिभम् ।
सिप्रायन्ते च गात्राणि लिङ्गं सद्यो मरिष्यतः ॥ १८ ॥