भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 194, कुल 616 में से

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१८० चरकसंहिता [ अ० ११ का वीर्य, मूत्र और मल पानी में डूब जाता है, जो स्वबन्धुओं से द्वेष करता हो, वह व्यक्ति एक मास के भीतर मृत्यु के पानी में डूब जाता है । (१०) जिसके हाथ, पाव और मुख बिना दाह के शुष्क होने लगें वह एक मास से अधिक नहीं जीता ॥ १०-१२ ॥ ललाटे मूर्ध्नि बस्तौ च नीला यस्य प्रकाशते । राजी बालेन्दुकुटिला न स जीवितुमर्हति ॥ १३ ॥ प्रवालगुटिकाभासा यस्य गात्र मसूरिकाः । उत्पद्याशु विनश्यन्ति न चिरात्स विनश्यति ॥ १४ ॥ ग्रीवावमर्दो बलवाञ्जिह्वाश्वयथुरेव च । ब्रध्नास्यगलपाकश्च यस्य पक्व तमादिशेत् ॥ १५ ॥ संभ्रमोऽति प्रलापोऽति भेदोऽस्थ्नामतिदारुणः । कालपाशपरीतस्य त्रयमेतत्प्रवर्तते ॥ १६ ॥ (११) सद्योमरण के अरिष्ट—जिस रोगी के माथे, शिर और बस्ति मे मे नवीन चन्द्रमा के समान टेड़ी नीली रेखाये दीखती हैं उसकी मृत्यु निकट समझनी चाहिये । (१२) जिस रोगी के शरीर पर मूंगे के समान फुन्सिया (मसूरिका चेचक) निकल कर शीघ्र ही फिर नष्ट हो जायें वह शीघ्र ही मरता है । (१३) जिस रोगी की ग्रीवा में अकड़ान (दर्द) बहुत अधिक हो, जीभ पर सूजन हो जाये, गुदा, गला, और मुख पक जाये वह शीघ्र मर जाता है । (१४) भ्रम, प्रलाप और भयंकर रूप में अस्थियों का टूटना हो, काल के पाश में फसे मनुष्य में ये तीन लक्षण होने लगते हैं ॥ १३-१६ ॥ प्रमुह्य लुञ्चयेत्केशान् परिगृह्णात्यतीव च । नरः स्वस्थवदाहारमबलः कालचोदितः ॥ १७ ॥ समीपे चक्षुषोः कृत्वा मृगयेताङ्गुलीकरम् । स्मयतेऽपि च कालान्ध ऊर्ध्वगानिमिषेक्षणः ॥ १८ ॥ शयनादासनाद्गात्रात्काष्ठात्कुड्यात्तथापि वा । असन्मृगयते किंचित्स मुह्यन्कालचोदितः ॥ १९ ॥ अहास्यहासी समुह्यन् प्रलेढि दशनच्छदौ । शीतपादकरोच्छ्वासो यो नरो न स जीवति ॥ २० ॥ आह्वयन्तं समीपस्थं स्वजनं जनमेव वा । महामोहावृतमनाः पश्यन्नपि न पश्यति ॥ २१ ॥ (१४) जो रोगी बेसुध होकर बालों को खींचता तथा स्वस्थ पुरुष के समान भोजन करता है वह काल से प्रेरित होता है । (१५) जो मनुष्य आख